रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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इनको बाह्य और आभ्यन्तर रूप में प्रयोग करने से आराम आता है । इनको उचित मात्रा में शुद्ध करके सेवन करने से शारीरिक बलवृद्धि होती है । गुञ्जा के पत्र शोथनाशक होते हैं । आमवात की शोथ में इनका लेप करने से शीघ्र ही शोथ और शूल में आराम आता है । आमवात के अतिरिक्त वातिक शूलों में इनका लेप करने से शूल शान्त हो जाता है । गुञ्जापत्र-स्वरस में मीठा तथा कुछ चरपरा होता है इसको थोड़ा-थोड़ा मुख में रखने से स्वरभेद, गलशोथ तथा कण्ठ ( गले ) की वेदना दूर होती है । गुञ्जा की जड़ स्वाद में अत्यन्त मीठी होती है । इसको मुख में रखकर चूसने से कफ पतला होकर निकलने लगता है और स्वरभेद शान्त होता है । तृष्णा तथा गलशोथ मिट जाता है । यदि मूत्र करने में कठिनाई हो तो इसके सेवन से आराम आ जाता है, साथ ही शरीर में बल तथा वर्ण की वृद्धि होती है । गुञ्जामूल, कासनाशक, शुक्रोत्पादक, रुचिकारक और विषनाशक है । इसके प्रयोग में उत्पादक अंगों को बल मिलता है, विशेषतः व्रणविकार शान्त होते हैं । गुञ्जा- मूल में मुलेठी के गुण-धर्म विशेष रूप से पाये जाते हैं, अतः आजकल मुलेठी के अभाव में गुञ्जामूल का प्रयोग किया जाने लगा है ॥४४६-४५२॥ शुद्धगुञ्जाबीजस्य मात्रा गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् । गुञ्जाबीजं सुविमलं प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥४५३॥ भा.टो.—गुञ्जाबीज चूर्ण की मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक शुद्धावस्था में प्रयोग करनी चाहिए ॥४५३॥ गुञ्जाया आमयिकः प्रयोगः गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा परिलेपितम् । निहन्त्युत्पिष्टसन्धिस्थां दारुणां शोथवेदनाम् ॥४५४॥ इन्द्रलुप्तं पक्षवधं तत्तदङ्गसमाश्रितम् । गृध्रसीं दारुणां चैव सुघोरमवबाहुकम् ॥४५५॥ गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा चित्रकान्वितम् । प्रलिप्तं शमयत्येव श्वित्रकुष्ठं विशेषतः ॥४५६॥ गुञ्जाया रोगयोग्यः प्रयोगः—प्रसारणाकुञ्चनविवर्तनाक्षेपणाशक्त्युग्ररुजत्व- स्पर्शासहत्वादिसन्धिमुक्तलक्षणैः सह समन्तात् श्वयथुगदान्, विशेषतो रात्रिरुजा- करश्चोत्पिष्टसन्धिर्भवति । इन्द्रलुप्तं केशभूमिजः क्षुद्ररोगविशेषः, “रोमकूपानुगं