भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 765

७४० रसतरङ्गिणी भा.टी.—लांगली, हलिनी, सीरी, विशल्या, कलिहारिका, अग्निजिह्वा, स्वर्णपुष्पा, दीप्ता, नक्तेन्दुपुष्पिका, विद्युज्ज्याला, वह्निशिखा, लांगली, गर्भपातिनी, हली, लांगलिनी, ये सब नाम (कलिहारी) के कहे जाते हैं ॥ ४६६,४६७॥ वक्तव्य—संस्कृत में लांगल हलको कहते हैं। क्योंकि इसका कन्द हल के समान आकार का होता है, अतः इसे लांगली आदि नाम दिये जाते हैं। इसका कन्द भी सरलगामी नहीं होता, किन्तु वह भी भूमि में हल की भाँति कुंचित होता है। इसका कन्द श्वेतवर्ण, मृदु, मांसल और तिक्तरस होता है। क्षुप के शिखर पर ५-६ अंगुल लम्बे चौड़े पुष्प लगते हैं, जो पाकानुसार हरित पीत और रक्त हो जाते हैं। इन रक्तवर्ण पुष्पों के कारण ही इसको 'वह्निशिखा' आदि कहा जाता है। लांगली के क्षुप पञ्जाब के पर्वतों और हिमालय के अधस्तरों पर मिलते हैं, परन्तु वंग देश और दक्षिण में बहुतायत से पाये जाते हैं। इसका कन्द प्रायः वर्षार्ऋतु में फूटता है और झाड़ियों के सहारे कार्तिक मार्गशीर्ष तक हरा-भरा पाया जाता है। इसका कन्द दो प्रकार का होता है। १—गोलाकार, २—लम्बा और द्विभाग युक्त। पहिले प्रकार को स्त्री जाति की, दूसरे को पुष्प जाति की लांगली कहा जाता है। लाङ्गलिकायाः परिचयः लाङ्गली स्वर्णकुसुमा लता तु सुमनोहरा । सीरशूला विशेषेण मता नक्तेन्दुपुष्पिका ॥४६८॥ लाङ्गल्या मूलमेवेह मतं तूपविषाह्वयम् । तदेव च विशेषेण योगेषु विनियुज्यते ॥४६६॥ लाङ्गलिकापरिचयः—लता इति प्रायिकम् । क्वचित् दीर्घसरलोर्ध्वकाण्ड- क्षुपरूपेणापि दर्शनात् । एतस्या आभ्यन्तरप्रयोगो न कार्यः । अत्र यद्यपि लाङ्ग- लीशोधनमुपेक्षितं बाह्यप्रयोगैकयोग्यत्वात्, तथापि “लांगली शुद्धिमायाति दिनं गोमूत्रशोधिता” इति प्राचीनोक्तमनुसन्धेयम् ॥४६८, ४६६॥ भा.टी.—कलिहारी का क्षुप हरिद्राक्षुप से बहुत कुछ सादृश्य रखता है, परन्तु उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचा होता है और पत्ते बहुत कम चौड़े बाँस की तरह लम्बे काले रंग के होते हैं। इसका काण्ड सीधा नहीं जाता है, प्रत्युत कन्द से निकलते ही एक ओर को कुञ्चित (सिकुड़ता) ही जाता है, जिससे उसकी आकृति हलाकार बन जाती है ॥४६८,४६६॥