रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७४१ लाङ्गलिकाया आभ्यन्तरप्रयोगे दोषाः शुष्का वार्द्रा लाङ्गलिनी स्वल्पापि परिशीलिता । करोति दारुणं दाहं मोहातीसारविभ्रमम् ॥५००॥ आ.टी.—कलिहारी के कन्द को सूखा या गीला किसी रूप में थोड़ी मात्रा में भी सेवन कराया जाय तो इससे भयंकर दाह, मोह, अतीसार तथा भ्रम उत्पन्न होता है ॥५००॥ लाङ्गलिकाया गुणाः लाङ्गली कटुका चोष्णा कफवातहरा सरा । अपरापातनी चैव सद्यःप्रसवकारिका ॥५०१॥ शोथापहा विशेषेण मता व्रणनिवारिणी । कुष्ठकृमिप्रशमनी विशेषात्परिकीर्त्तिता ॥५०२॥ आभ्यन्तरप्रयोगार्थं लाङ्गलीं न प्रयोजयेत् । बाह्यप्रयोगे युञ्जीत तत्तद्रोगोपनुत्तये ॥५०३॥ आ.टी.—कलिहारीकन्द कटुरस, उष्णगुण होने से वात-कफ के विकारों को नष्ट करता और सारण है। प्रसव के बाद अपरा (नाल) न निकलने पर इसको प्रसूता के शिर और हाथ-पैरों में लेप करने से वह शीघ्र निकल जाती है। विलम्ब-प्रसव में भी इसे स्त्री के हाथ-पैरों तथा शिर में लेप करने से प्रसव जल्दी होता है। शरीर के किसी बाह्य देश में शोथ होने पर इसके लेप से वह शान्त हो जाता है और व्रणों पर इसके योगों का लेप लगाने से वे अच्छे हो जाते हैं। यह विशेष रूप से कुष्ठ तथा कृमियों को मारने में काम आता है। कलिहारी को आभ्यन्तर प्रयोग के लिए काम में नहीं लाना चाहिए। अतः इसको तत्तत् रोगों को नष्ट करने के लिए बाह्यरूप से ही काम में लायें ॥५०१-५०३॥ लाङ्गलिकाया बाह्यप्रयोगाः सुधौतं लाङ्गलीमूलं वारिणा परिपेषितम् । नाभौ योनौ प्रलिप्तं वा सद्यःप्रसवकृन्मतम् ॥५०४॥ लाङ्गली वारिणा पिष्टा करपादप्रलेपिता । अपरां पातयत्याशु न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥५०५॥ लाङ्गलीमूलतोयं तु पूरितं कृमिकर्णके । निहन्त्यन्तःप्रविष्टांस्तु शतपाद्यादिकान् कृमीन् ॥५०६॥