भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७४२ रसतरङ्गिणी सूर्यभक्ताद्रवोपेतः सव्योषो लाङ्गलीद्रवः । विधाय वस्त्रपूतं तु योजयेत् कृमिकर्णके ॥५०७॥ पातयत्यचिरादेव कृमिकीटपिपीलिकाः । तथा कर्णजलौकाञ्च तथैवान्यान् कृमीनपि ॥५०८॥ कङ्कगोधावसोपेतं तुलसीलाङ्गलीद्रवैः । साधितं तैलमभ्यङ्गाद् हन्त्युन्मन्थं विशेषतः ॥५०६॥ लाङ्गल्या बाह्यप्रयोगाः—सूर्यभक्ता “हुरहुर” इति ख्याता। कङ्कः पक्षिविशेषः प्रसिद्धप्रायः । उभयोर्वसया युक्तम् । उन्मन्थः—“कर्णं बलाद् वर्धयतः पाल्यां वायुः प्रकुप्यति । कफं संगृह्य कुरुते शोथं स्तब्धमवेदनम्। उन्मन्थकः सकण्डूको विकारः कफवातजः” इत्युक्तलक्षणः कर्णपालीरोगः ॥५०४-५०६॥ भा.टी.—लांगलीमूल को अच्छी तरह धो साफ करके सिल पर जल के साथ पीसकर इसका नाभि तथा योनि प्रदेश के ऊपर लेप करने से प्रसव शीघ्र हो जाता है । कलिहारी को जल के साथ पीसकर इसका हाथ-पैरों में लेप करने से निश्चित रूप में अपरा निकल आती है । कान के अन्दर कान- खजूरा आदि किसी कीड़े के घुस जाने पर कलिहारीमूल जल से पीसकर इसको कान में डालने से कीड़े मर जाते हैं । कान के अन्दर कीड़े पड़ जाने या बाहरी कीड़ों के पहुँच जाने पर कलिहारीमूल स्वरस और हुलहुल के स्वरस में त्रिकुट चूर्ण घाटकर उसको कपड़े में छान लें । अब इस रस को कान में डालें तो सब कीड़े मरकर बाहर आ जाते हैं । यदि कोई जोंक आदि भीतर चिपकनेवाले कीड़े भी अन्दर गए हों तो वे भी मरकर बाहर आ जाते हैं । कंकपक्षी, गोह की चर्बी, तिलतैल, तुलसीस्वरस तथा लांगलीमूलस्वरस को एकत्र मिलाकर तैल पका लें । इस तैल की मालिश करने से उन्मन्थ (कान की पाली में कफ-वात-प्रकोपजन्य शोथ) रोग शीघ्र शान्त होता है ॥५०४-५०६॥ अथ अर्कक्षीरस्य नामानि अर्कक्षीरं रविीरं सूर्यक्षीरं तथैव च । अर्कदुग्धं सूर्यदुग्धं रविदुग्धं च तन्मतम् ॥५१०॥ भा.टी.—अर्कक्षीर, सूर्यक्षीर, अर्कदुग्ध, सूर्यदुग्ध, रविदुग्ध, ये सब नाम आक के दूध के हैं ॥५१०॥ अर्कक्षीरस्य गुणाः अर्कक्षीरं मतं स्निग्धं तिक्तोष्णं कुष्ठगुल्मनुत् ।