रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७४३ उदरापहमत्यन्तं रेचनं वान्तिकारकम् ॥५११॥ गुदांकुरप्रशमनं कृमिदन्तव्यथापहम् । क्षारकर्मकरं चैव त्वचि लिप्तं विशेषतः ॥५१२॥ भा.टी.-आक का दूध स्निग्ध, तिक्तरस, उष्णगुण होता है । इसके सेवन से कुष्ठ तथा गुल्म रोग नष्ट होता है और उदररोगों में लाभ करता है । इसके सेवन से अत्यन्त दस्त लगते हैं और वमन होती है । इसको बवासीर के मस्सों के दर्द में, दाँत में कीड़ा लगने से होनेवाले दर्द में प्रयोग किया जाता है । यदि इसको त्वचा पर लेप किया जाय तो यह वहाँ पर क्षार का काम करता है अर्थात् वहाँ पर जला देता है ॥५११, ५१२॥ अर्कक्षीरस्य बाह्यप्रयोगः सक्षौद्रे रविदुग्धे तु तूलमल्पं निषेचितम् । कृमिदन्तस्थरन्ध्रस्थं कृमिदन्तव्यथापहम् ॥५१३॥ त्रिगुणक्षौद्रसंयुक्तं रविदुग्धं प्रलेपितम् । मुखक्षतं शमयति द्रुतं नास्तीह संशयः ॥५१४॥ निशाशिरीषबीजाढ्यं सूर्यदुग्धं विलेपितम् । गुदांकुरान् पातयति चिरोत्थानप्यसंशयम् ॥५१५॥ अर्कक्षीरोपक्रमस्तत्र बाह्ये प्रयोगे—तूलं कार्पासखण्डम् । त्रिगुणेत्यादिलेपनोत्तरं मुखनिष्ठ्यूतं नान्तर्गिलनीयमित्यवधेयम् । निशा हरिद्रा । स्पष्टमन्यत् ॥५१५॥ भा.टी.-आक का दूध तथा मधु समभाग में लेकर एकत्र मिला इसमें एक छोटा-सा रुई का फाहा भिगोकर कीड़ेवाले दाँत के छेद में भर देने से कृमि- दन्त पीड़ा शान्त हो जाती है । आक का दूध एक भाग, शहद तीन भाग लेकर दोनों को एकत्र मिला लें, इसको मुखक्षत में भीतर लेप करने से शीघ्र ही मुख के क्षतों में निःसन्देह आराम आता है । बहुत से पुराने बवासीर के मस्सों को गिराने या निकालने के लिए आक के दूध में हरिद्राचूर्ण और सिरसबीजचूर्ण मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को मस्सों में लगाने से मस्से गिर जाते हैं ॥५१३-५१५॥ अथ स्नुहीक्षीरस्य नामानि स्नुहीक्षीरं सुधाक्षीरं सेहुण्डक्षीरकं तथा । स्नुहीदुग्धं सुधादुग्धं स्नुग्दुग्धं च मतन्तु तत् ॥५१६॥ भा.टी.—स्नुहीक्षीर, सुधाक्षीर, सेहुण्डक्षीर, स्नुहीदुग्ध, स्नुग्दुग्ध, ये सब नाम थोहर के दूध के कहे जाते हैं ॥५१६॥