रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४६ रसतरङ्गिणी स्यात् तावत् प्रतितृतीयमहः ईषद्गाढतरीक्रियते ॥५२७-५३०॥ भा.टी.—थोहर के दूध में कपड़छन हल्दी का चूर्ण मिलाकर इसमें एक दृढ़ सूत्र (तागा) भिगोकर छाया में सुखा लें, जब अच्छी तरह सूख जाय तो इसे फिर उक्त हरिद्राचूर्ण युक्त थोहर के दूध से लेप करके छाया में सुखा लें। इस प्रकार सात बार लेपकर सुखा लें। इसे क्षारसूत्र के नाम से कहा जाता है। बवासीर के मस्सों को काटने के लिए यह अचूक साधन है। इसी को भगन्दर के छेदन करने के लिए भी काम में लाया जाता है। परन्तु इसके प्रयोग में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए ॥५२७-५३०॥ अथ कृष्णसर्पविषस्य नामानि कृष्णसर्पविषं चैव गरलं दारदं तथा। जङ्गमविष इत्येते नामख्याता भिषग्वरैः ॥५३१॥ भा.टी.—कृष्णसर्पविष, गरल, दारद तथा जंगमविष, ये सब नाम साँप के विष के कहे जाते हैं ॥५३१॥ कृष्णसर्पविषस्य आहरणविधिः शुक्तिकां तालपत्रेण खर्जूरस्य दलेन वा। आच्छाद्य सर्वतो दीर्घयष्टिकायां तु बन्धयेत् ॥५३२॥ कृष्णसर्पो यथा रोषात् तालपत्रे दशेत्तथा। विदध्यात् कृष्णसर्पस्य सन्मुखं यष्टिकामिमाम् ॥५३३॥ निदध्यात्तावदेवं तु बहुवारं दशेद्यथा। शुक्तिकासञ्चितं सर्पविषं त्वथ समाहरेत् ॥५३४॥ पुनः पुनः कृष्णसर्पं रोषयन् भिषजां वरः। समाहरेद्विषं त्वेवं सावधानतया सदा ॥५३५॥ विषाहरणप्रकारः शिष्यबुद्धिवैशद्याय। वाग्भटस्तु प्रकारान्तरमामम्नौ। तत्तु बहुलमनुपयुक्तत्वात् उपेक्षितम्। नवीनोद्भावितञ्च बहुगुणसुलभं प्रकटितमिति ॥५३२-५३५॥ भा.टी. - एक शुक्ति (सीप) को ताड़ के पत्ते अथवा खजूर के पत्ते से अच्छी तरह चारों तरफ से ढक कर बाँध लें। अब इस सीप को एक लम्बी लाठी या बाँस में बाँध लें। इस शुक्तिका युक्त लाठी के सामने आने और बँधी हुई सीप को देखने से काला साँप जैसे क्रोध में आवे उसी तरह इस लाठी को साँप के मुख के आगे कर दें। इस तरह जितनी बार काला साँप क्रोध में आकर इस सीप के ऊपर अपना डंक मारे उतनी ही बार इसको उसके आगे कर देना चाहिए।