रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७४७ इस तरह करने से सीप में सर्प का विष सञ्चित पाया जायगा। इस विष को बड़ी सावधानी के साथ लेकर सुरक्षित कर लें ॥ ५३२-५३५ ॥ वक्तव्य—फण वाले या दर्वीकर सर्प की विषैली दाढ़ में से विष को निकाल कर सुखा लिया जाता है। इसके निकालने की क्रिया सपेरे या गारुड़िये या कञ्जर लोग अच्छी तरह जानते हैं। यह विषद्रव कुछ पीला भूरा-सा होता है। सुखाने पर इसमें से ५० या ७५% प्रतिशत जल का भाग उड़ जाता है और पहिले भूरे रंग का चूर्ण-सा रह जाता है जो कभी नहीं बिगड़ता है। कृष्णसर्पविषस्य शोधनम् तैलाक्तशुक्तिकामध्येसञ्चिते जङ्गमे विषे । पादांशं सार्षपं तैलं न्यस्य घर्मे विशोषयेत् ॥ ५३६ ॥ जायते पीतवर्णं तन्निदाघे परिशोषितम् । कृष्णसर्पविषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ५३७ ॥ भा.टी.—एक सीप में थोड़ा-सा तेल चुपड़कर उसमें उक्त प्रकार से सञ्चित सर्पविष डाल दें और उसमें सर्पविष के चतुर्थांश सरसों का तैल मिलाकर धूप में सूखने को रख दें। धूप में सूखने पर यह पीले रंग का हो जाता है। इसको सावधानी से रख लें। इस विधि से कृष्णसर्प का विष उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ५३६, ५३७ ॥ कृष्णसर्पविषस्य गुणाः कृष्णसर्पविषं तीक्ष्णं महोष्णमतिदारुणम् । पित्तप्रकोपणकरं तथा दाहकरं परम् ॥ ५३८ ॥ आसन्नमृत्युकालोत्थं संज्ञालोपप्रणाशनम् । श्वासकृच्छ्रप्रशमनं तथा श्लेष्मविशोषणम् ॥ ५३६ ॥ हृद्दौर्बल्यसमुद्भूतं महात्ययिक लक्षणम् । अवसादं निहन्त्याशु निश्चितं करणाश्रितम् ॥ ५४० ॥ प्रणश्यन्नाडिकां घोरां शीतपादकरान्विताम् । श्वासकृच्छादिसंयुक्तां विनिहन्ति विषूचिकाम् ॥ ५४१ ॥ निरुक्तलक्षणोपेतं सन्निपातं व्यपोहति । शीतांगसन्निपातोत्थं हृदुत्तेजनकृत्परम् ॥ ५४२ ॥ शीतगात्रश्वासकृच्छ्रप्रणाश्यन्नाडिकादिषु ।