भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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सन्निपातसमाकारलक्षणेषु भवत्सु तु ॥ ५४३ ॥ अन्येष्वपि च रोगेषु नूत्नेष्वात्ययिकेषु च । कारस्करसमायुक्तैः प्रयोगैर्विविधैस्तथा ॥ ५४४ ॥ कस्तूरीभैरवाद्यैश्च न सिद्ध्यन्ति गदा यदा । निष्फला स्याद् यदा चैव मृतसञ्जीवनी सुरा ॥ ५४५ ॥ तदैव कृष्णसर्पस्य विषं योगेषु योजितम् । प्रयुञ्जीत भिषग्वर्यः सावधानतया सदा ॥ ५४६ ॥ कृष्णसर्पविषगुणाः-आसन्ने मृत्युकाले समुत्थो यः संज्ञालोपः तस्य प्रणा- शनम् । करणाश्रितम् इन्द्रियाश्रयम्, निरुक्तलक्षणमिति संज्ञालोपश्वासकृच्छ्रेन्द्रि- यावसादप्रणाश्यन्नाडिकादिकम् । कस्तूरीभैरवस्तन्त्रान्तरेषु प्रसिद्धः । तदैवेति नियमः प्रयोगयोग्यकालनियमज्ञापनार्थ । शिष्टं निगदव्याख्यातम् ॥ ५३८-५४६ ॥ भा.टी.-कृष्णसर्प का विष अत्यन्त तेज और महान् उष्ण (गरम) होता है। यह अन्तःप्रयोग में पित्तप्रकोप तथा अत्यन्त दाहकारी होता है। मृत्यु के समय जब रोगी का संज्ञानाश (बेहोश) होने लगता है तो इसके प्रयोग से वह पुनः चैतन्य लाभ करता है। श्वास निकलने में होनेवाली कठिनाई को शान्त करता और बढ़े हुए कफ को सुखा देता है। हृदय की दुर्बलता के कारण उत्पन्न अत्यन्त भयानक इन्द्रियों के अवसाद (शिथिलता) अर्थात् हृदयकावरोध को वह शीघ्र ही दूर करता है। विसूचिका में जब नाड़ी नहीं चलती हो और हाथ- पैर बिलकुल ठंडे हो गये हों तथा श्वास बड़ी कठिनाई से आनेवाला हो तो इसके प्रयोग से सब उपद्रव नष्ट होकर रोगी बच जाता है। उक्त लक्षणयुक्त अर्थात्-संज्ञानाश, श्वासकृच्छ्रता, इन्द्रियशैथिल्य, नाड़ी-अवरोध आदि लक्षण- युक्त सन्निपात को या शीतांग सन्निपात को यह नष्ट करता है और नाड़ी की गति को उत्तेजित करता है। सन्निपातज्वरों के अतिरिक्त शीतांग, श्वासकष्ट, नाड़ीलोप आदि सन्निपात के जैसे लक्षणों से युक्त, अन्य महाभयंकर नूतन रोगों के होने पर इस विष को प्रयोग में लाने से शीघ्र लाभ होता है। इसी तरह उन रोगों में जिनमें कुचलायोग तथा कस्तूरी के योग जैसे कस्तूरीभैरव वृहत् कस्तूरीभैरव आदि योगों से कोई लाभ नहीं हुआ हो अथवा जहाँ पर मृतसञ्जी- वनी सुरा का प्रयोग भी निष्फल हो तो ऐसी अवस्थाओं में भी कृष्णसर्पविष को बड़ी सावधानी के साथ योगों में मिलाकर प्रयोगों में लाना चाहिए ॥५३८-५४६॥