रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७५१ कृष्णसर्पविषोपेतरसेषु तु विशेषतः । एष एव विधिः कार्यो रसतन्त्रविशारदैः ॥५६२॥ भा.टी.—यह सूचिकाभरण-रस सन्निपातज्वरनाशक, विसूचिकारोगहर और श्वासकृच्छ्रतानिवारक है। काले सर्प के काटनेपर होनेवाले विष लक्षणयुक्त अव- स्थाओं में वैद्य को इस रस का विशेष रूप से प्रयोग करना चाहिए । इस रस को अदरख के स्वरस के साथ देना चाहिए। यदि इस रस की एक वटी सन्निपात पीड़ित रोगी को देनेपर वह आधे घंटे में रक्तवर्णमुख, रक्तनेत्र तथा तीव्र तापयुक्त न हो तो इस रस की दूसरी गोली अदरख के साथ देनी चाहिए । इस रस के सेवन में रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए। यदि इस रस के प्रयोग से रोगी तीव्रताप, रक्तमुख तथा रक्तनेत्रयुक्त हो जाय तो पित्त को शान्त करने के लिये उसे ठण्डे पानी से स्नान कराना चाहिए । इसके सेवन से होनेवाली व्यथा तथा गरमी को शान्त करने के लिये रोगी के मस्तक पर ठण्डे जल में कपड़ा निचोड़कर बार-बार रखना चाहिए । इस रस के प्रयोग करने पर यदि कृष्ण- सर्पविष के लक्षण तीव्रताप, रक्तमुख, रक्तनेत्र आदि उदय हो जायँ तो फिर इस रस की मात्रा नहीं देनी चाहिए। इसी तरह कृष्णसर्पविषयुक्त अन्य रसों के प्रयोग में भी यही अनुपान पथ्य तथा शीत उपचार करना चाहिए ॥५५५-५६२॥ द्वितीयः सूचिकाभरणरसः विषं सर्पविषं शङ्खविषं माषमितं पृथक् । विशोधितं हिङ्गुलञ्च माषकत्रयसंमितम् ॥५६३॥ सम्पेथ्य पञ्चपित्तेन वटिकाः सर्षपोन्मिताः । निर्माय विनियुञ्जीत सावधानतया भिषक् ॥५६४॥ रसोऽयं तु समाख्यातः सूचिकाभरणाह्वयः । तत्तन्निर्दिष्टरोगेषु पूर्ववद् गुणकारकः ॥५६५॥ अथापरः सूचिकाभरणः—विषं वत्सनाभः, शङ्खविषं श्वेतमल्लविषम् । पञ्चपित्तेनेति। पञ्चपित्तं यथा—"वराहच्छागमहिषमत्स्यमायूरपित्तकम् । पञ्चपित्त- मिति ख्यातं सर्वेष्वेव हि कर्मसु” ॥५६३–५६५ ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभविष, सर्पविष, शुद्ध संखिया, प्रत्येक एक-एक मासा, शुद्ध हिंगुल तीन मासा लेवें । इन सब को एक खरल में डालकर पञ्च- पित्तों के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी सरसों के बराबर गोलियाँ बना लें। इस रस को सूचिकाभरण रस कहते