रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५० रस्तरङ्गिणी भा.टी.- शुद्ध कृष्णसर्पविष दो मासा, शुद्ध पारद, नागभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध वत्सनाभ, दो-दो मासा लेवें । पहिले पारे और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली करलें । अब इसमें अन्य द्रव्यों को मिलाकर इसको बकरी के पित्त, मोर के पित्त, सूअर के पित्त तथा मछली के पित्त से पृथक्-पृथक् तीन घंटे मर्दन करें, अन्त में तीन घंटे अदरक के रस के साथ मर्दन करें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी बड़ी सावधानी से छोटी सरसों के बरा- बर गोलियाँ बनालें । इसको सूचिकाभरणरस कहते हैं । इस रस को महात्मा भैरव ने सन्निपातरोग पीड़ित सांसारिक लोगों के कष्टनिवारणार्थ आविष्कृत किया है । इस रस को घोटनेवाला तथा गोली बनानेवाला परिचारक (औषधिनिर्माता) बहुत समझदार होना चाहिए । उसके हाथों में कहीं भी किसी प्रकार का क्षत (घाव) नहीं होना चाहिए और इसके निर्माण के समय उसके नाखून बढ़े हुए न होने चाहिये । क्योंकि क्षत में सर्पविष पहुँचकर सर्पदंश के लक्षण उदय करके गोली बनानेवाले की मृत्यु कर सकता है । अतः गोली बनाने के बाद नाखूनों के भीतर लगे हुए इस रस को किसी सींक से अच्छी तरह निकालकर हाथों को अच्छी तरह साबुन से कई बार धोकर साफ कर लेना चाहिए ॥५४६-५५४॥ अस्य गुणाः सूचिकाभरणो ह्येष सन्निपातविनाशनः । विषूचिकाहरः कामं श्वासकृच्छ्रापहः परम् ॥५५५॥ कृष्णस्याहेर्विषगुणनिर्दिष्टेषु च लद्मसु । प्रयुञ्जीत विशेषेण रसतन्त्रात्रिचक्षणः ॥५५६॥ रसोऽयं खलु दातव्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा । आरक्तास्यश्च रक्ताक्षस्तीव्रतापयुतो यदि ॥५५७॥ न स्याद्रोगी तु होरार्द्धे वटीं दद्यात्ततोऽपराम् । दध्योदनं च दातव्यं पथ्यमत्र विजानता ॥५५८॥ आरक्ताक्षं रक्तवक्त्रं तीव्रतापसमन्वितम् । विज्ञाय रोगिणं वैद्यः स्नपयेच्छीतलाम्बुना ॥५५९॥ शीताम्बुसिक्तवस्त्रेण भूयो भूयः प्रयत्नतः । आच्छादयेन्मस्तकं तु व्यथादाहप्रणुत्तये ॥५६०॥ कृष्णसर्पविषशायत्र तीव्रतापादिकेषु तु । समुत्पन्नेषु चिह्नेषु न युञ्जीत पुन रसम् ॥५६१॥