रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७५६ रसतरङ्गिणी ॥ परिशिष्ट ॥ वृश्चिकहारी गुटिका हरताल को समभाग हींग में मिला बिजौरानींबू के रस से मर्दन कर एक- एक मासे की बड़ी गोली बनाकर सुखा लें । इनमें से एक-एक गोली घिसकर बिच्छू के दंश स्थान पर लेप करने और रोगी की आँखों में अञ्जन करने से बिच्छू का जहर नष्ट हो जाता है । पञ्चामृतरस पारदभस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध वत्सनाभ, गिलोय और त्रिफलाक्वाथ से शुद्ध किया हुआ गूगल, और ताम्रभस्म, इन सब को समभाग में लेकर एकत्र खरल में जल के साथ घोटकर आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना लें । मात्रा—१ से २ गोली, वासावलेह, बकरी के दूध, शहद, पीपलचूर्ण, कालीमिर्चचूर्ण और घी अथवा जल के साथ दें । गुण—यह रसायन राजयक्ष्मा के ज्वर आदि विविध उपद्रवों को शान्त करता है । इस रस का उपयोग कीटाणुजन्य क्षय में ज्वरवेग तीव्र होने पर किया जाता है । प्रथमावस्था में ज्वर अल्प होने पर जहाँ तक हो नहीं करना चाहिए । द्वितीयावस्था में ज्वरवेग तीव्र होने पर इसका उपयोग अत्यन्त लाभकारी होता है । क्षय में धातुओं की क्षीणता पर बल-मांस क्षीण होने पर कफस्राव अधिक होने पर इसका सेवन अत्यन्त लाभकारी होता है । शुक्रक्षयजन्य शोषरोग में, दीर्घकालीन प्रदरजन्य क्षयरोग में इससे अच्छा लाभ होता है । प्रमेहरोग में भी इसका उपयोग उत्तम कार्य करता है । सदा मूत्र करने की शंका बनी रहना, बराबर मूत्र आना, रात्रि में अधिक मूत्र आने से निद्राभंग होना, क्षीण-कृश हो जाना, मुख में खुश्की रहना, सर्वांग में चिकना पसीना आना, सन्धिस्थानों में दुर्गन्ध आना—आदि लक्षण होने पर इसका उपयोग हितावह होता है । संक्षेप में यह रस धातुओं की क्षीणता कम करता है एवं यह धातुओं को साम्यावस्था में लाना और ज्वरघ्न, बल्य, तथा रसा- यन है और प्रमेह आदि को नष्ट करता है । स्मृतिसागर रस शुद्ध पारद, शुद्धगन्धक, शुद्धहरताल, शुद्धमैनसिल, ताम्रभस्म, इन सबको