भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७६० रसतरङ्गिणी कफनिःसारकवटी पिप्पली, वच, दालचीनी, काकड़ासिंगीचूर्ण; प्रत्येक एक-एक भाग छोटी कण्टकारीचूर्ण, मुलैठीचूर्ण दो-दो भाग, नौसादरचूर्ण आठ भाग लेकर सब को एकत्र खरल में डालकर वासा (अड़ूसा) क्वाथ की तीन भावना देकर मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर काँच की शीशी में रखकर बन्द कर लें। इसको वैद्य लोग कफ- निःसारक वटी कहते हैं। खाँसी के समय इसको मुख में रखकर इसका रस चूसते रहने से छाती और कण्ठ में चिपका हुआ कफ शीघ्र ही बाहर निकलने लगता है और इससे कास, श्वास, प्रतिश्याय तथा स्वरभेद आदि रोग नष्ट होते हैं। नवसादर चूर्ण नौसादरचूर्ण, कटुकीचूर्ण तथा हरीतकीचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। इसमें से ६ मासा मात्रा में आंवलों के रस के साथ सेवन करने से भयंकर कामला-रोग नष्ट होता है। सुधांशु द्रव पत्थर बालुका आदि रहित स्वच्छ सैन्धवचूर्ण आधी रत्ती लेकर एक काँच की साफ शीशी में डालकर उसमें सवा तोला परिश्रुत शुद्ध जल डाल दें और शीशी में डाट लगाकर इसको हिलायें, जिससे सैन्धानमक जल में अच्छी तरह घुल जाय। इस प्रकार बनाए हुए द्रव (लोशन) को सुधांशुद्रव कहा जाता है। अब इस द्रव में से बिन्दुक्षेपकयन्त्र (आइड़्रोपर) द्वारा कुकरे, नेत्रकण्डू, नेत्रप- ल्मशोथ युक्त आँखों को अच्छी तरह खोलकर प्रत्येक में दो या तीन बूंद डाल दें। इस द्रव को नेत्रों में डालने से तथा सोरकाम्लीय रजत आदि द्राव (Silver Nitrate) के लगाने से पलकों में होनेवाली लालिमा शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। लवणजल (उक्त प्रकार से निर्मित) को, नेत्रपलकों में रजतनत्रित् (Silver- Nitrate) लगाने के बाद इसके अतिप्रभाव को दूर करने के लिए, नेत्रप्रक्षा- लन के काम में लाया जाता है। नेत्रव्रण तथा नेत्राभिष्यन्द के कारण उत्पन्न नेत्रार्जुन, नेत्रपुष्प रोग में भी इस जल को नेत्रों में डाला जाता है। कुछ महीनों तक साधारण लवणजल को १० बूंद से १५ बूंद तक मात्रा में