भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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परिशिष्ट ७६१ सूचीवेध द्वारा नेत्र के रक्त पटल में प्रवेश करने से नेत्रपुष्प अच्छा हो जाता है । चिरस्थायी प्रतिश्याय तथा अन्य साधारण नासारोगों (शोथादि) में लव- णोदक से प्रक्षालन करने पर शोथ आदि शान्त हो जाते हैं । हिक्का को बन्द करने के लिए लवणोदक का नस्य दिया जाता है । गला तथा कण्ठ के शोथ में उष्णलवणोदक के गण्डूष से लाभ होता है । विसूचिका रोग के कारण अथवा किसी कारण अतिरक्तस्राव होने पर शरीर के रक्त में द्रवभाव के कम हो जाने पर इसे (द्रवभाग) पूरा करने के लिए साधारण लवणजल को त्वचा द्वारा, किसी शिरा द्वारा या गुदा द्वारा शरीर में प्रवेश किया जाता है (इसी को सेलाइन इंजेक्शन भी कहते हैं) उक्त कार्य के लिए एक से तीन पाइण्ट तक (डेढ़ सेर तक) लवणजल शरीर में प्रवेश कराना चाहिए । इस क्रिया से रक्त का परिमाण बढ़ जाता है और मूत्र अधिक मात्रा में आने लगता है, जिससे रोगी की दशा अच्छी होने लगती है । उदराध्मानशूल, गुदकृमि तथा अपस्मार के वेगों को रोकने के लिए भी लवणोदक की वस्ति दी जाती है । कर्णपाकज वेदनाहर योग स्वच्छ सैन्धवचूर्ण को बकरे के मूत्र में घोलकर इसको कान में डालने से कर्णनाड़ी में पाक होने के कारण होनेवाली भयंकर वेदना निःसन्देह शीघ्र ही दूर हो जाती है । सैन्धवादि नस्य सैन्धानमक, कूठ, सफेद सरसों, सहंजने के बीज, इन सब को समभाग में लेकर एकत्र अच्छी तरह चूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को बकरी के मूत्र की तीन भावना देकर सुखा करके रख लें । इसको सैन्धवादि नस्य कहते हैं । यह नस्य त्रिदोषप्रकोपजन्य तन्द्रा की अवस्था में नासिका द्वारा सुंघाने से तन्द्रा को हटा देता है । खर्जूरविषहर योग सन्धानमक के चूर्ण को चांगेरीस्वरस में मिलाकर कानखजूरे के काटे हुए या चिपके हुए स्थान पर रगड़ने से उसका विष शीघ्र नष्ट हो जाता है । सर्पविषहर योग एक मासा सैन्धानमक के चूर्ण में समभाग कालीमिर्च, पिप्पली तथा सोंठ