रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६२ रसतरङ्गिणी का चूर्ण मिलाकर इसमें शहद, घृत तथा मक्खन मिलाकर तक्षक सर्प के काटने पर भी यदि विष तीव्र लक्षणयुक्त न हो तो इस योग के सेवन कराने से शीघ्र ही विष नष्ट हो जाता है । आखुविषहर योग विषैले चूहे के काटे हुए स्थान पर मंजीठ, हरिद्रा, घर का धुआँ और सैन्धानमक चूर्ण समभाग में लेकर एकत्र जल से पीसकर लेप करने से चूहे का जहर नष्ट हो जाता है । वरटीविषहर योग बर्रें, ततैया या हड्डा के तीव्र पीड़ा शोथादियुक्त विष को शान्त करने के लिए कालीमिर्च, सोंठ, सौचलनमक और सैन्धानमक को पान के पत्तों के रस में पीसकर लेप करने से शीघ्र ही विष शान्त हो जाता है । विडलवणादि नस्य विडलवण में सिरसबीज तथा अपामार्ग की जड़ का चूर्ण मिलाकर सूक्ष्म चूर्ण करलें । इस चूर्ण का नस्य लेने से अर्धावभेदक ( आधा सीसी का दर्द ) की पीड़ा शान्त हो जाती है । चतुर्मुख रस शुद्ध पारद शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म प्रत्येक ४ तोला; सुवर्ण- भस्म १ तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बनालें, फिर इसमें अन्य औषधियाँ मिला घीकुआर के रस से ७ दिन मर्दन करें। फिर इसमें सोंठ, हरड़ और पुनर्नवाक्वाथ, कौंचबीज और लौंग का क्वाथ, चित्रकमूल और पद्मकाष्ठ का क्वाथ; इन तीनों वर्गों का क्रमशः ३-३ भावना देकर खूब गाढ़ा करके एक गोला सा बनालें । अब इस गोले को एरण्ड के पत्ते में लपेटकर तीन दिन तक धान्यराशि में रख दें । पश्चात् गोले को निकाल चित्रकमूल और पद्मकाष्ठ क्वाथ में घोटकर आधी रत्ती की गोलियाँ बनालें । मात्रा—१-२ गोली दिन में दो बार त्रिफला और शहद के साथ दें । उपयोग—यह रस राजयक्ष्मा की उत्तम औषधि है । जब क्षय के कीटाणुओं से उत्पन्न सेन्द्रिय विष द्वारा लघु और वृहदन्त्र विकृत होकर यक्ष्मा आरम्भ हुआ हो तो यह रस उत्तम कार्य करता है । इस रस का मुख्य गुण शरीर में