भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 789

७६४ रसतरङ्गिणी यह रस पित्त की अम्लता तथा तीक्ष्णता को शान्त करता है। यह पित्त- शामक, हृद्य और संग्राही होने से आन्त्रसन्निपात, सूतिकारोग, क्षय की प्रथमा- वस्था और द्वितीयावस्था, पित्तातिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, पित्तजसंग्रहणी रोग में सेन्द्रिय विष को नष्ट करके मल को बाँधकर लाता है, दाह को कम करता है और ज्वर को शमन करता है। वातपित्तात्मक कास तथा पित्तप्रधान श्वास को भी शान्त करता है। यह रस मध्य कोष्ठ के भीतर पाचक अवयवसमुदाय पर शामक प्रभाव रखता है, जिससे इन अवयवों में होनेवाले वातविकार नष्ट होते हैं। कुमुदेश्वर रस ताम्रभस्म ४ तोला और वनौषधिमारित वंगभस्म २ तोला लेकर दोनों को एकत्र मिलाकर मुलेठी के क्वाथ की ७ भावना देकर १-१ रत्ती की गोलियाँ बनालें। मात्रा—१ से दो रत्ती तक दिन में तीन बार लेवें। इसके बाद निम्न- लिखित चन्दनादिक पिलावें। चन्दनादिक्वाथ – सफेद चन्दन, अनन्तमूल, नागरमोथा, छोटी इलायची बीज, नागकेशर, प्रत्येक १ तोला, और धान की खील (लाजा) ५ तोले मिला १६ गुने जल में पकाकर आधा अवशेष रख लें। इसे छानकर इसमें मिश्री और मधु मिलाकर थोड़ा पिलायें। यदि आमप्रकोप के कारण तृषा लगती हो तो इस रस को मुलेठी के क्वाथ के साथ देना चाहिए। यह रस पित्तप्रकोप, आम प्रकोप या मधुमेह आदि रोग अथवा अन्य किसी कारण से उत्पन्न तृषा को शान्त करता है। यदि वमन भी हो तो उसे भी शीघ्र शान्त कर देता है। यह रस न केवल उक्त रोगों के कारण उत्पन्न तृषा को ही शान्त करता है, बल्कि शीघ्रशुक्रस्खलन तथा स्वप्नप्रमेह में बहुत शीघ्र लाभ करता है। आरोग्यवर्द्धिनी गुटिका शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, अभ्रकभस्म ताम्रभस्म, १-१ तोला, त्रिफलाचूर्ण ६ तोले, शुद्ध शिलाजीत ३ तोले, शुद्ध गूगल ४ तोले, चित्रकमूल की छाल ४ तोले, कुटकीचूर्ण २२ तोले लें। पहिले पारद गन्धक की कज्जली करके उसमें शेष औषधियों का चूर्ण मिला नीम के पत्तों के रस में ३ दिन खरल करके मटर के समान गोलियाँ बनालें। मात्रा—१—३ गोली दिन में २ बार जल के साथ देवें।