रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ७६५ **उपयोग—**यह वटी कुष्ठ एवं सर्वज्वर हर है। यह दीपन, पाचन हृदय के लिए लाभदायक, मेदोहर, मलशुद्धिकर, अत्यन्त क्षुधावर्द्धक और सामान्यतः सब रोगों में लाभकारी है । यह वृहदन्त्र तथा लघु अन्त्र की विकृति को नष्ट करती है जिससे आन्त्रविषजन्य रक्त की विकृति दूर होने से कुष्ठ आदि रोग मिट जाते हैं । इससे पाचन रस की उत्पत्ति होती है और यकृत् बलवान् होता है, अतः पुराने अजीर्ण अग्निमान्य, यकृत्-दौर्बल्य में यह लाभकारी है । सर्वांगशोथ में पाये जानेवाले हृदयदौर्बल्य को यह मिटाती है और मूत्रमार्ग से जलांश को बाहर निकालने से शोथ कम करती है । पाचन-शक्ति को तीव्र करके धातुओं का समीकरण करने के कारण यह मेदोदोष में लाभदायक होती है । मलावरोध (जीर्ण) के लिए यह उत्तम औषधि है । तन्तुवर्ग (Pyorrhoea) में वात कफ की प्रधानता होने पर इसके सेवन से लाभ होता है । बालग्रैवेयक ग्रन्थि (Thymus Gland) के निर्बल होने से या विकृति होने से शरीर की वृद्धि रुक जाती है और शरीर पोला-सा निर्जीव-सा हो जाता है । इस तरह की शरीर प्रगति के अभाव में समय पर स्त्री और पुंस्त्व के चिह्न न उदय होने में इस वटी के निरन्तर प्रयोग से लाभ देखा गया है । यह जीर्ण वृक्कविकार में भी लाभ करती है । प्रमेह में अपच और कब्ज होने पर यह उत्तम लाभ करती है । इसी तरह इसके उपयोग से हिक्कारोग भी शीघ्र नष्ट होता देखा गया है । परन्तु इस वटी को गर्भिणी स्त्री, दाह, मोह, तृषा, भ्रम और पित्तप्रकोपयुक्त रोगी को नहीं देना चाहिए ।
सूर्याञ्जन
केवल गन्धक योग से बनायी हुई ताम्रभस्म, शुद्ध सौवीराञ्जन और शुद्ध हरताल, इन सबको समभाग में लेकर खरल में अच्छी तरह पीसकर अञ्जन तैयार कर लें । इसको सूर्याञ्जन कहा जाता है । इसकी एक शलाका प्रतिदिन एक बार आँखों में लगाने से पिल्लरोग तथा पलक के बालों के गिरने में आराम आता है ।
स्वप्नमेहन्तक वटी
वंगभस्म २ तोला, रीठे के बीजों की मज्जा ४ तोला, खांड ४ तोला लेकर सब को एकत्र जल के साथ ३ घंटे घोंटकर ३-३ रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखालें । **मात्रा—**३ से ६ गोली दिन में तीन बार शीतल जल के साथ ।