रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 792, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ७६७ नपुंसकता, स्मृतिनाश, निद्रानाश, वीर्य का पतलापन, इन्द्रिय की शिथिलता, स्त्रियों के बीजकोष ( Ovaries ) का विकास न होने से होनेवाला बाँझपन, उपदंश अथवा सुजाक के विकार से गर्भाशय दूषित होकर होनेवाला योनिस्राव, स्त्रियों का अस्थिक्षय, शुक्रमेह, लालामेह, अथवा प्रमेह के कारण होनेवाली नपुंसकता आदि रोगों को दूर करनेवाली औषधि में पुष्पधन्वरस प्रथम श्रेणी का माना जाता है । गुल्मकुठार रस शीशभस्म, वंगभस्म, अभ्रकभस्म और लोहभस्म, प्रत्येक पाँच तोले, ताम्र- भस्म २० तोले लेकर सबको एकत्र जम्बीरीनींबू के रस में ३ दिन तक ख़रल कर १-१ रत्ती की गोलियाँ बना लें । मात्रा— १ से २ गोली दिन में दो बार शहद, अदरखरस, जवाखार और सज्जीखार के साथ दें। रक्तगुल्म तथा पित्तज गुल्म में चतुर्जातक्क्वाथ के साथ दें । प्रयोग—यह रसायन सब प्रकार के गुल्म, अजीर्ण आमविकार, पित्तज अम्लपित्त, हृदयशूल, पार्श्वशूल, उदरशूल आदि रोगों को दूर करता है। इस रसायन का उपयोग जीर्णरोग में तथा क्षीण रोगियों के लिए होता है। जिन रोगियों को उवाक या बेचैनी हो उनको आँवले या नींबूरस का अनुपान देना चाहिए। इस रस का अधिक मात्रा में उपयोग नहीं करना चाहिए। शूलवज्रिणी वटी शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, प्रत्येक दो तोला, ताम्रभस्म, सुहागा, भुनी हींग, सौंठ, कालीमिर्च, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, कचूर, दालचीनी, इलायचीबीज, तेजपात, तालीसपत्र, जायफल, लौंग, अजवायन, जीरा, धनिया, प्रत्येक एक तोला लेकर बारीक चूर्ण करलें। पहिले पारदगन्धक की पृथक् अच्छी तरह कजली करके फिर उसमें अन्य चीजों का चूर्ण मिलावें। अन्त में इसको बकरी के दूध में चार पहर अच्छी तरह मर्दन करके २-२ रत्ती की गोलियाँ बना लें । मात्रा-१ से ४ गोली दिन में ३ वार बकरी के दूध या जल के साथ देवें । प्रयोग-पेट की विकृति के लिए यह उत्तम औषध है। यह वटी वातिक, श्लैष्मिक, पैत्तिक, और कफपित्तज, पक्तिशूल (परिणामशूल ), आमशूल, पार्श्वशूल, हृदयशूल शिरःशूल, तथा अन्य रोगों के उपद्रव रूप शूलों को शान्त करती है और पाचनक्रिया को नियमित करती है। पित्तशुद्धि करके रक्तकणों