रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६८ रसतरङ्गिणी की वृद्धि करती है, अपानवायु की क्रिया को नियमित करने से अधोवायु तथा मलमूत्र के अवरोध को दूर करती है। आंतों की क्रिया को नियमित बनाती है। इसके अतिरिक्त यकृद्वृद्धि, प्लीहावृद्धि सहित पाण्डुरोग, अग्निमान्द्य, अजीर्णातिसार पुरातन नवीन आमवात, वृषणों में जलबृद्धि, श्लीपदरोग, उद- रस्थ छोटे २ कृमि, कफप्रधान श्वास, कास अर्श रोगों को रोगानुसार अनुपान से नष्ट करती है।
पुनर्नवामण्डूर
पुनर्नवा, निसोत, साँठ, मिर्च, पीपल, वायविडंग, देवदारु, कूठ, हल्दी, चित्रकमूल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, दन्तीमूल चव्य, इन्द्रजौ, कुटकी, पीपला- मूल, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, काला जीरा, अजवायन और कायफल, इन सब औषधियों का चूर्ण प्रत्येक समभाग लें। फिर सब चूर्ण परिमाण से दूनी मण्डूरभस्म लेकर इसको एक लोहे की कड़ाही में मण्डूर से आठ गुना गोमूत्र डालकर उसमें मण्डूर को पकायें। गोमूत्र चतुर्थांश शेष रहने पर उक्त औष- धियों का चूर्ण मिलाकर फिर पकायें। जब गोली बांधने योग्य हो जाय तो इसे उतारकर मटर के समान गोलियाँ बनाकर सुखा लें। मात्रा— २-४ गोली दिन में दो बार गुड़ के साथ दें। ऊपर से तक्र अथवा जल पिलायें। उपयोग— यह मण्डूर पाण्डुरोग में अतिलाभदायक औषधि है। पाण्डु अथवा कुम्भकामला के जीर्ण होने पर सर्वाङ्गशोथ में यह शीघ्र लाभ पहुँचाता है। शोथ के साथ अफारा, मन्दज्वर अरुचि, रक्ताणुओं की कमी, नैर्बल्यजन्य श्वासवृद्धि, प्लीहावृद्धि आदि उपद्रवों को भी यह दूर करता है। इसी तरह आंतों की निर्बलता, आंतों में मल खुश्क हो जाने के पश्चात् वातप्रकोप से होनेवाला शूल और सूक्ष्म कृमि भी नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवन से मल तथा मूत्र दोनों की शुद्धि होती है और रक्तसञ्चालन क्रिया नियमित तथा बलवती होती है जिससे यकृत् -वृद्धि, प्लीहावृद्धि से होनेवाले जलोदर, हृदयरोग भी मिट जाते हैं। यह मण्डूर नूतन अर्श तथा संग्रहणी में भी लाभकारी होता है।
कासीसाञ्जन
शुद्ध हीराकासीसचूर्ण एक भाग ताम्रभस्म चौथाई भाग लेकर दोनों को एकत्र खरल में तुलसी स्वरस की अच्छी तरह सात भावना देकर सुखा लें। यह कासीसाञ्जन तैय्यार हो गया। इस अञ्जन को सावधानीं से नेत्रों में आंजने से नेत्र पलकों के बालों का गिरना तथा पिल्लरोग में निश्चय लाभ होता है।