भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( २ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जिस प्रकार संस्कारविशेषसे शुद्ध, बद्ध और मृत अर्थात् भस्म किये गये पारदके यथाविधि सेवनसे शरीरस्थ जरा ( बुढापा ) और व्याधि- योंका निःशेष ( समूल ) नाश होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जरा व्याधियोंके नाश करनेवाले योगसाधन ( योगगम्य ) जगद्गुरु शंकर अर्थात् समस्त संसारका कल्याण करनेवाले महादेवको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥ नत्वा गुरुपदद्वन्द्वं दृष्ट्वा तन्त्राण्यनेकंशः । श्रिया गोपालकृष्णेन क्रियते रससंग्रहः ॥ २ ॥ अपने गुरुजीके दोनों चरणोंको प्रणाम करके अनेक तन्त्रोंको देखकर मैं श्रीगोपालकृष्णभट्ट इस रसेन्द्रसारसंग्रह नामक ग्रन्थको बनाता हूं ॥ २ ॥ सिद्धयोगाश्च ये केचित् कृतिसाध्या भवन्ति हि । एकीकृत्य तु ते सर्वे लिख्यन्ते यत्नतो मया ॥ ३ ॥ जो सिद्ध अर्थात् प्रत्यक्ष फल देनेवाले योग मनुष्योंसे बन सकते हैं या मनुष्य जिन सिद्ध योगोंको बना सकते हैं उनको अनेक तंत्रोसे यत्नपूर्वक इकट्ठे करके मैं इस ग्रन्थमें लिखता हूं ॥ ३ ॥ रसकी प्रधानता । अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः । क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥ ४ ॥ पारदकी बहुत थोड़ी मात्रा ( खुराक ) होती है, और उस अल्प मात्रासे ही बहुत गुण होजाता है, एवं इसके सेवनमें अरुचिभी नहीं होती तथा शीघ्रही आरोग्यता ( तंदुरुस्ती ) प्राप्त होती है, इस लिये सम्पूर्ण औषधिमात्रमें पारद सबसे श्रेष्ठ कहा है ॥ ४ ॥ साध्येषु भेषजं सर्वमीरितं तत्त्ववेदिना । असाध्येष्वपि दातव्यो रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ५ ॥