रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ह्के सूर्यकी समान प्रकाशवाला हो वह पारद् रसकर्ममें उत्तम माना गया है । जो पारद् धूम्रवर्ण हो या सर्वतः पाण्डुवर्ण हो अथवा चित्रित वर्णवाला हो वह रसकर्मके योग्य नहीं होता है ॥ ९ ॥ पारदमें स्वाभाविक दोष । नागो वङ्गो मलो वह्निश्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः । असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ १० ॥ व्रणं कुष्ठं तथा जाड्यं दाहं वीर्यस्य नाशनम् । मरणं जडतां स्फोटं कुर्वन्त्येते क्रमान्नृणाम् ॥ ११ ॥ नाग ( सीसा ) वंग ( कलई ), मल, वह्नि, चांचल्य, विष, गिरि और असह्याग्नि यह आठ महादोष पारदमें स्वभावसे स्थित रहते हैं । यदि इन दोषोंसे युक्त पारदको भक्षण किया जाय तो यह क्रमसे व्रण, कुष्ठ, बुद्धिकी जडता, दाह, वीर्यका नाश, मृत्यु, शरीरका जकड जाना और शरीरमें फोडे होना इन आठ प्रकारकी महाव्याधि- योंको करता है ॥ १० ॥ ११ ॥ शोधनकी आवश्यकता । तस्माद्रसस्य संशुद्धिं विदध्याद्भिषजां वरः । शुद्धोऽयममृतः साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १२ ॥ इस लिये वैद्यको चाहिये पहिले क्रमसे रस ( पारद् ) की शुद्धिको करे अर्थात् उपरोक्त सम्पूर्ण दोषोंको निकालकर पारदको शुद्ध करले क्योंकि शुद्ध किया हुआ पारद् साक्षात् अमृतके समान गुणकारी होता है । और अशुद्ध पारद विषके समान शरीरको कर डालता है ॥ १२ ॥ शुद्धाशुद्धके गुणदोष । दोषहीनो यदा सूतस्तदा मृत्युजरापहः । शुद्धोऽयममृतं साक्षाद्दोषयुक्तो रसो विषम् ॥ १३ ॥