भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ५ ) जैसे कहा है-जब यह पारद दोषरहित होजाता है तो जरा और मृत्युके हरनेवाला होता है । शुद्ध पारद साक्षात् अमृत ही हो जाता है । परन्तु दोषयुक्त पारद साक्षात् विष समझना चाहिये ॥ १३ ॥ रसशोधनप्रकार । अथातः संप्रवक्ष्यामि पारदस्य विशोधनम् ॥ रसो ग्राह्यः सुनक्षत्रे पलानां शतमात्रकम् ॥ १४ ॥ पञ्चाशत्पञ्चविंशद्वा दश पञ्चैकमेव वा । पलाद्धीनं न कर्त्तव्यं रससंस्कारमुत्तमम् ॥ १५ ॥ अब हम पारद शोधनकी विधिको कहते हैं-प्रथम किसी शुभ नक्षत्र मुहूर्तमें १०० सौ पल पारद लेवे अथवा पचास ५० पल लेवे या २५ पल लेवे, अथवा १० पल या ५ पल अथवा १ पल लेवे । १ पलसे कम पारदका संस्कार नहीं करना चाहिये ॥१४॥१५॥ शतं पञ्चाशतं वापि पञ्चविंशद्दशैव च । पञ्चैकं वा पलञ्चैव पलार्द्धं कर्षमेव वा ॥ १६ ॥ कर्षान्न्यूनो न कर्तव्यो रससंस्कार उत्तमः । प्रयोगेषु च सर्वेषु यथालाभं प्रकल्पयेत् ॥ १७ ॥ किसीके मतमें-सौ १०० पल, या ५० पल, अथवा २५ पल, या १० पल, वा ५ पल, या १ पल या आधा पल, अथवा १ कर्ष पारद् लेकर संस्कार करे, एक कर्षसे कम पारदका उत्तम संस्कार होही नहीं सकता. इसलिये बहुत थोडे पारदका संस्कार आरंभ न करे ! जितना अधिक मिलसके उतना लेकर सब प्रकारके शोधन प्रयोगोंको करे । ( ग्रंथांतरमें लिखा है, पारदकी शुद्धि दो प्रकारकी होती है । एक रसायनके लिये, दूसरी व्याधिनाशनाथं । जो व्याधि हरनेके लिये शुद्धि है वह रसायनमें काम नहीं आसकती । परन्तु रसायन कर्मकी रोगनाशक होसकती है ) ॥ १६ ॥ १७ ॥