भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुभेऽह्नि विष्णुं परिचिन्त्य कुर्यात् सम्यक्कुमारीवटुकार्च्चनं च । सुलोहपाषाणसमुद्भवेऽस्मिन् दृढे च वेदांगुलिगर्भमात्रे ॥ १८ ॥ सुतप्तखल्ले निजमन्त्रयुक्तां विधाय रक्षां स्थिरसारबुद्धिः । अनन्यचित्तः शिवभक्तियुक्तः समाचरेत्कर्म रसस्य तज्ज्ञः ॥ १९ ॥ शुभ दिन मुहूर्त्तमें विष्णु नारायणका स्मरण करके विधिवत् कुमारी और वटुकका पूजन करके चार अंगुल गहरा किसी उत्तम लोह या पत्थरका उत्तम खल्व लेकर उसमें पारद् डालकर “ अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते ऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः” इस मन्त्रको जपता हुआ शिवभक्तियुक्त हो स्थिर और टिकी हुई बुद्धिसे पारदकी रक्षा करता हुआ तप्त खल्वमें पारदका मर्दन करे, परन्तु खल्वमें । इतना पारद् डाले जितना डालनेसे खल्वका चार चार अंगुल किनारा चारों ओर ऊपरसे खाली रहे, ऐसा करनेसे पारद् मर्दन भी अच्छा होता है और बाहर भी नहीं गिरता ॥ १८ ॥ १९ ॥ तप्त खल्व विधान । अजांशकृत्तुषाग्निं च भूगर्ते त्रितयं क्षिपेत् । तस्योपरि स्थितं खल्लं तप्तखल्लमिति स्मृतम् ॥२०॥ पृथ्वीमें एक गढा खोदकर उसमें धानोंके तुष बकरीकी मेंगनी और अग्नि इन तीनोंको डालके उसके ऊपर खल्वको रक्खे इस खल्वमें पारदका मर्दन होता है, इसका नाम “ तप्तखल्व ” है ॥ २० ॥