भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्र्यहाद्रुचौ वा वान्ते वा लग्नः सूतो न चेत्पुनः । अष्टमेऽह्नि प्रदातव्यः पूर्ववत्कार्यसिद्धये ॥ ४५ ॥ कौडीकी भस्म १ पल, पारा और गंधक प्रत्येक दो दो तोले और सुहागा १ मासा लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र करके जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके मूशामें रखकर पुटपाककी विधिसे पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठके अतिरिक्त रक्तपित्तके अन्यान्य समस्त रोग नष्ट होकर शरीर पुष्ट, वीर्यकी वृद्धि, प्रसाद, ओज, कांति और लावण्यताकी वृद्धि होती है । इस औषधिको स्वयं महादेवजीने कहा है । संसारमें इसके समान अन्य कोई भी औषधि गुणकारक नहीं है । इस औषधिके सेवन करनेपर शालि चावलोंका भात, घी, दही, शाक और हींग भक्षण करे । इस औषधिका नित्य दो दो प्रहरमें तीन वार सेवन करे । इसके सेवन करनेसे अरुचि अथवा वमन हो जाये तो तीन दिन तक सेवन कराकर पश्चात् रोक देवे, फिर आठ दिनके पश्चात् औषधि सेवन करे ॥ ४१-४५ ॥ प्रथमे सप्तमे देया लावशूरणमुद्गकाः । द्वितीये माषगोधूमं भक्ष्यं पूर्वोदितञ्च यत् ॥ ४६ ॥ देयानि मत्स्यमांसानि तृतीये मर्दनादिकम् । तैलबिल्वारनालानि कोपस्त्रीस्वप्रजागरान् ॥ ४७ ॥ त्यजेत्कादीनि द्रव्याणि हृद्यं स्वादु च शीलयेत् । वायौ सेव्यं पयः कोष्णं पित्ते तु ससितं हितम्॥४८॥ अत्यग्नौ चोरबीजानि तिलेक्षुकदलीफलम् । खर्जूरं मांसमृद्वीका सितादि सकलं भजेत् ॥ वीर्यच्युतौ नारिकेलजलतालफलानि च ॥ ४९ ॥ इस औषधिके सेवन करते समय पहिले सप्ताहमें लवा पक्षीके मांसके साथ, जमीकंद और मूंगका यूष । दूसरे सप्ताहमें उडद, गेहूं,