भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२९१) लवाका मांस, जमीकंद और मूंगका यूष । तीसरे सप्ताहमें मछली और मांसको भक्षण करे तथा शरीरपर तेलका मर्दन करे । तेल, बेल, कांजी, क्रोध, स्त्रीसंग, दिनमें सोना, रात्रिमें जागना और ककारादि नामवाले पदार्थोंका त्याग कर देवे । इसपर हृदयको हितकारी और स्वादु पदार्थ सेवन करने चाहिये । वात रोगमें इस औषधिका सेवन कराकर ऊपरसे गरम दूध और पित्त रोगमें मिश्रीके साथ गरम दूध पान करना चाहिये । तीक्ष्णाग्नि रोगमें काला कचूर, तिल, ईख, केलेकी फली, खजूर, मांस, दाख और मिश्री आदि भक्षण करे। वीर्य- स्तम्भके लिये नारियलका जल और ताड़के फल सेवन करे ॥४६-४९॥ आनाहारुचिमूर्च्छार्तिधूमोद्गारविषूचिकाः । एतेषु लघुशाल्यन्नं केवलं सघृतं हितम् ॥ ५० ॥ अतिवान्तौ पिबेच्छिन्नारसं क्षौद्रेण संयुतम् । सक्षौद्रं वासकं रक्तपित्तेऽरुचिविपर्यये ॥ ५१ ॥ भृष्टधान्यं सितायुक्तमथवा क्षौद्रसंयुतम् । यवान्नं मधुसंयुक्तं पिबेद्वा माहिषं दधि ॥ ५२ ॥ घृतान्नं भक्षयेन्नित्यं सुखोष्णेन च वारिणा । च्छिन्नाम्बुसहितं देयं दाहेऽजीर्णे सुधाजलम् ॥५३॥ आर्द्रकं सर्षपं रम्भाफलं भृष्टं कफोल्बणे । अन्येऽप्युपद्रवा ये स्युस्तत्तच्छान्त्यै यथौषधम्॥५४॥ द्वात्रिंशदिवसे कार्यं स्नानमामलकैस्तिलैः । युक्तं सेव्यं बले जाते शनैरग्निबलादनु ॥ ५५ ॥ आनाह, अरुचि, मूर्च्छा, वेदना, धूमोद्गार और विषूचिका इन रोगोंमें घी मिलाकर शालि चावलोंका भात खाये । वमन रोगमें सहत मिलाकर गिलोय सेवन करे । रक्तपित्तमें सहतमें अडूसेका स्वरस मिला-