रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कर, अरुचिमें मिश्रीयुक्त भूनाधनियां अथवा मध मिला भैंसका दही, अथवा मधुके साथ यवोंका सत्तू पीवे । अथवा घृत और भात सेवन करे तथा उष्ण जल पान करे । दाह और अजीर्ण रोगमें गिलो- यका रस और हरड़का रस पान करे । कफाधिक्य रोगमें अदरक, सरसों, केलेकी फली और दालचीनी भक्षण करे । अन्यान्य उपद्रवोंको नष्ट करनेके लिये यथोक्त औषधियोंका सेवन करके बत्तीस दिनतक तिल और आंमलोंके रसके द्वारा स्नान करावे । शरीरमें बल आजानेपर यथायोग्य अनुपानके साथ भोजन करे और जो बल अल्प हो तो अल्पपरिमाण भोजन करे । इसको लोकेश्वर रस कहते हैं ॥५०-५५॥ स्वल्पमृगांक । रसभस्म हेमभस्म तुल्यं गुञ्जाद्वयं भजेत् । दोषं बुद्ध्वाऽनुपानेन मृगाङ्कोऽयं क्षयापहः ॥ ५६ ॥ रससिन्दूर १ भाग और सोनेकी भस्म १ भाग इन दोनोंको एकत्र करके यथोक्त अनुपानके साथ २ रत्ती प्रमाण सेवन करनेसे क्षय रोग नष्ट होता है । इसको स्वल्पमृगांक कहते हैं ॥ ५६ ॥ काञ्चनाभ्रक । काञ्चनं रससिन्दूरं मौक्तिकं लौहमभ्रकम् । विद्रुमञ्चाभया तारं कस्तूरी च मनःशिला ॥ ५७ ॥ प्रत्येकं बिन्दुमात्रन्तु सर्वं संमर्द्य यत्नतः । वारिणा वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः ॥ ५८ ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं यथादोषानुसारतः । क्षयं हन्ति तथा कासं श्लेष्मपित्तसमुद्भवम् ॥ ५९ ॥ प्रमेहं विविधञ्चैव दोषत्रयसमुत्थितम् । कफजान्वातजान् रोगान्नाशयेत्सद्य एव हि ॥ ६० ॥