रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अमृतार्णव रस । पारदं गन्धकं शुद्धं मृतलौहञ्च टंकणम् । रास्नाविडंगत्रिफला देवदारु च चित्रकम् ॥ ७ ॥ अमृता पद्मकं क्षौद्रं विषञ्चैव विमर्दयेत् । द्विगुञ्जं वातकासार्त्तः सेवयेदमृतार्णवम् ॥ ८ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, लोहभस्म, सुहागा, रास्ना, वायविडंग, ।त्रिफला, देवदारु, ।चित्रककी जड़, गिलोय, पद्माख, सहत और विष इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । प्रातःकाल इस औषधिके सेवन करनेसे वातज खांसी दूर होती है । इसको अमृतार्णव रस कहते हैं । ( कोई कोई शहदको अनुपानमें ही लेते हैं शहदसे गोली नहीं बनाते हैं ) ॥ ७ ॥ ८ ॥ पित्तकासान्तक रस । भस्मताम्राभ्रकान्तानां कासमर्दत्वचो रसैः । मुनिजैर्वेतसाम्लैश्च दिनं मर्द्यं सुपिण्डितम् ॥ ९ ॥ निष्कार्द्धं पित्तकासार्त्तो भक्षयेच्च दिनत्रयम् । कासश्वासाग्निमान्द्यञ्च क्षयञ्चापि निहन्त्यलम् १०॥ कान्तलोहभस्म, तांबाभस्म और अभ्रकभस्म यह सब औषधिसमान भाग लेकर कसौंदीके रसमें, अगस्सियाके रसमें और अमलवेतके रसमें खरल करके चार रत्ती परिमाण औषधि पित्तकाससे पीड़ित रोगीको तीन दिन तक सेवन करावे । इससे खांसी, इवास, मंदाग्नि और क्षय- रोग नष्ट होते हैं । इसको पित्तकासान्तक रस कहते हैं ॥ ९ ॥ १० ॥ काससंहारभैरव रस । रसगन्धकताम्राभ्रशंखटंकणलौहकम् । मरिचं कुष्ठतालीशजातीफललवंगकम् ॥ ११ ॥