भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

भाषाटीकासहित । ( ३०३ ) कार्षिकं चूर्णमादाय दण्डेनामर्द्य भावयेत् । भेकपर्णी केशराजनिर्गुण्डी काकमाचिका ॥ १२ ॥ द्रोणपुष्पी शालपर्णी ग्रीष्मसुन्दरकं तथा । भार्गी हरीतकी वासा कार्षिकैः पत्रजै रसैः ॥१३॥ वटिकां कारयेद्वैद्यः पञ्चगुञ्जाप्रमाणतः । वातजं पैत्तिकं कासं श्लैष्मिकं चिरजं तथा ॥१४ ॥ श्रीमद्गहननाथेन काससंहारभैरवः । रसोऽयं निर्मितो यत्नाल्लोकरक्षणहेतवे ॥ १५ ॥ वासाशुण्ठीकण्टकारी-क्वाथेन पाययेद्बुधः । कासं नानाविधं हन्ति श्वासमुग्रमरोचकम् ॥ बलवर्णकरः श्रीदः पुष्टिदः कान्तिवर्द्धनः ॥ १६ ॥ पारा, गंधक, तांबा, अभ्रकभस्म, शंखकी भस्म, सुहागा, लोह इन सबकी भस्म, कालीमिरच, कूठ, तालीशपत्र, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परैमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर मंडूकपर्णी, कुकुरभांगरा, सम्हालू, मकोय, गूमा, शालपर्णी, ग्रीष्मसुन्दर, भारंगी, हरड़ और अडूसा इन प्रत्येकका रस एक एक कर्ष परिमाण लेकर उसमें भावना देवे, पश्चात् उसकी पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और बहुत दिनोंका पुराना कास रोग नष्ट होता है। इसको अडूसे, सोंठ और कटेरीके क्वाथके साथ सेवन करनेसे अनेक- प्रकारकी खाँसी, उग्र श्वास और अरुचि नष्ट होकर बल, वर्ण, लक्ष्मी, पुष्टि और कान्तिकी वृद्धि होती है । श्रीमान् गहनानन्दनाथने लोककी रक्षाके लिये यह औषधि कही है। इसको काससंहारभैरव रस कहते हैं ॥ ११-१६ ॥