भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लक्ष्मीविलास रस । शुद्धसूतं सतालञ्च तालाद्धं रसखर्परम् । वङ्गं ताम्रं घनं कान्तं कांस्यं गन्धं पलं पलम्॥१७॥ केशराजरसेनैव भावयेद्दिवसत्रयम् । कुलत्थस्य रसेनैव भावयेच्च पुनः पुनः ॥ १८ ॥ एलाजातीफलाख्यञ्च तेजपत्रं लवंगकम् । यमानीजीरकञ्चैव त्रिकटु त्रिफला समम् ॥ १९ ॥ भावयेच्च रसेनैव गोलयेत्सर्वमौषधम् । छायाशुष्का वटी कार्या चणकप्रमिता शुभा ॥२०॥ शीताम्बुना पिबेद्धीमान्सर्वकासनिवृत्तये । मत्स्यं मांसं तथा क्षीरंपथ्यंस्यात् स्निग्धभोजनम्२१ क्षयकासं तथा श्वासं सज्वरं वाथ विज्वरम् । हलीमकं पाण्डुरोगं शोथं शूलं प्रमेहकम् ॥ २२ ॥ अर्शोनाशं करोत्येव बलवृद्धिश्च कारयेत् । वर्जयेच्छाकमम्लञ्च भृष्टद्रव्यं हुताशनम् ॥ २३ ॥ शुद्ध पारा १ पल, हरिताल १ पल, खपरिया आधा पल, वंग- भस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, कान्तलोहभस्म, कांसा इनकी भस्म और गन्धक कह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे । सबको एकत्र पीसकर कुकुरभांगरेके रसमें तीन भावना देवे; तदनंतर कुलथीके रसमें तीन भावना देवे । फिर इलायची, जायफल, तेजपात, लौंग, अजवायन, जीरा औ त्रिकुटा तथा त्रिफला यह सब समान भाग लेकर क्वाथ बना लेवे, फिर उस क्वाथमें भावना देकर चनेकी बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा देवे । सर्व प्रकारकी खाँसीको दूर करनेके लिये शितल जलके साथ इस औषधिका सेवन करना चाहिये और