भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

भाषाटीकासहित । ( ३०५ ) ऊपरसे मछली, मांस, दूध और स्निग्ध अन्न पथ्य देवे । इससे क्षय, खाँसी, सज्ज्वर अथवा विगतज्वर श्वास, हलीमक, पांडु, शोथ, शूल, प्रमेह और अर्शरोग नष्ट होकर बलकी वृद्धि होती है । इस औषधिके सेवन करनेपर शाक, अम्ल और भुने हुए पदार्थ भक्षण न करे । तथा अग्निका सेवन त्याग देवे । इसको लक्ष्मीविलास रस कहते हैं ॥ १७-२३ ॥ सर्वेश्वर रस । रसगन्धकयोश्चूर्णमेकीकृत्याभ्रकं तथा । हेममिश्रं समं कृत्वा मर्दयेद्यामकद्वयम् ॥ २४ ॥ त्र्यूषणानि लवङ्गैला टंकणं हेमतुल्यकम् । कण्टकार्या रसैर्भाव्यमेकविंशतिवारकम् ॥ २५ ॥ शिग्रुबीजार्द्रकरसैः सप्तधा भावयेत्पृथक् । रसः सर्वेश्वरो नाम कासश्वासक्षयापहः ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं विभीतकफलत्वचम् ॥ २६ ॥ पारा, गन्धक, अभ्रकभस्म, सोनाभस्म, त्रिकुटा, लौंग, इलायची और सुहागा यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेवे; सबको एकत्र कर २ प्रहर मर्दन करे; पश्चात् कटेरीके रसमें २१ वार, सहिंजनेके बीजोंके रसमें सात वार और अदरखके रसमें सात भावना देवे । बहे- डेकी त्वचाके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी, श्वास और क्षयरोग नष्ट होते हैं । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ २४-२६ ॥ शृङ्गाराभ्र । शुद्धं कृष्णाभ्रचूर्णं द्विपलपरिमितं शाणमात्रं यद- न्यत्, कर्पूरं जातिकोषं सजलमिभकणा तेजपत्रं