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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

भाषाटीकासहित । ( ३०३ ) कार्षिकं चूर्णमादाय दण्डेनामर्द्य भावयेत् । भेकपर्णी केशराजनिर्गुण्डी काकमाचिका ॥ १२ ॥ द्रोणपुष्पी शालपर्णी ग्रीष्मसुन्दरकं तथा । भार्गी हरीतकी वासा कार्षिकैः पत्रजै रसैः ॥१३॥ वटिकां कारयेद्वैद्यः पञ्चगुञ्जाप्रमाणतः । वातजं पैत्तिकं कासं श्लैष्मिकं चिरजं तथा ॥१४ ॥ श्रीमद्गहननाथेन काससंहारभैरवः । रसोऽयं निर्मितो यत्नाल्लोकरक्षणहेतवे ॥ १५ ॥ वासाशुण्ठीकण्टकारी-क्वाथेन पाययेद्बुधः । कासं नानाविधं हन्ति श्वासमुग्रमरोचकम् ॥ बलवर्णकरः श्रीदः पुष्टिदः कान्तिवर्द्धनः ॥ १६ ॥ पारा, गंधक, तांबा, अभ्रकभस्म, शंखकी भस्म, सुहागा, लोह इन सबकी भस्म, कालीमिरच, कूठ, तालीशपत्र, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परैमाण लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर मंडूकपर्णी, कुकुरभांगरा, सम्हालू, मकोय, गूमा, शालपर्णी, ग्रीष्मसुन्दर, भारंगी, हरड़ और अडूसा इन प्रत्येकका रस एक एक कर्ष परिमाण लेकर उसमें भावना देवे, पश्चात् उसकी पांच पांच रत्तीकी गोली बना लेवे । इसके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और बहुत दिनोंका पुराना कास रोग नष्ट होता है। इसको अडूसे, सोंठ और कटेरीके क्वाथके साथ सेवन करनेसे अनेक- प्रकारकी खाँसी, उग्र श्वास और अरुचि नष्ट होकर बल, वर्ण, लक्ष्मी, पुष्टि और कान्तिकी वृद्धि होती है । श्रीमान् गहनानन्दनाथने लोककी रक्षाके लिये यह औषधि कही है। इसको काससंहारभैरव रस कहते हैं ॥ ११-१६ ॥

( ३०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लक्ष्मीविलास रस । शुद्धसूतं सतालञ्च तालाद्धं रसखर्परम् । वङ्गं ताम्रं घनं कान्तं कांस्यं गन्धं पलं पलम्॥१७॥ केशराजरसेनैव भावयेद्दिवसत्रयम् । कुलत्थस्य रसेनैव भावयेच्च पुनः पुनः ॥ १८ ॥ एलाजातीफलाख्यञ्च तेजपत्रं लवंगकम् । यमानीजीरकञ्चैव त्रिकटु त्रिफला समम् ॥ १९ ॥ भावयेच्च रसेनैव गोलयेत्सर्वमौषधम् । छायाशुष्का वटी कार्या चणकप्रमिता शुभा ॥२०॥ शीताम्बुना पिबेद्धीमान्सर्वकासनिवृत्तये । मत्स्यं मांसं तथा क्षीरंपथ्यंस्यात् स्निग्धभोजनम्२१ क्षयकासं तथा श्वासं सज्वरं वाथ विज्वरम् । हलीमकं पाण्डुरोगं शोथं शूलं प्रमेहकम् ॥ २२ ॥ अर्शोनाशं करोत्येव बलवृद्धिश्च कारयेत् । वर्जयेच्छाकमम्लञ्च भृष्टद्रव्यं हुताशनम् ॥ २३ ॥ शुद्ध पारा १ पल, हरिताल १ पल, खपरिया आधा पल, वंग- भस्म, तांबाभस्म, अभ्रकभस्म, कान्तलोहभस्म, कांसा इनकी भस्म और गन्धक कह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे । सबको एकत्र पीसकर कुकुरभांगरेके रसमें तीन भावना देवे; तदनंतर कुलथीके रसमें तीन भावना देवे । फिर इलायची, जायफल, तेजपात, लौंग, अजवायन, जीरा औ त्रिकुटा तथा त्रिफला यह सब समान भाग लेकर क्वाथ बना लेवे, फिर उस क्वाथमें भावना देकर चनेकी बराबर गोली बनाकर छायामें सुखा देवे । सर्व प्रकारकी खाँसीको दूर करनेके लिये शितल जलके साथ इस औषधिका सेवन करना चाहिये और

भाषाटीकासहित । ( ३०५ ) ऊपरसे मछली, मांस, दूध और स्निग्ध अन्न पथ्य देवे । इससे क्षय, खाँसी, सज्ज्वर अथवा विगतज्वर श्वास, हलीमक, पांडु, शोथ, शूल, प्रमेह और अर्शरोग नष्ट होकर बलकी वृद्धि होती है । इस औषधिके सेवन करनेपर शाक, अम्ल और भुने हुए पदार्थ भक्षण न करे । तथा अग्निका सेवन त्याग देवे । इसको लक्ष्मीविलास रस कहते हैं ॥ १७-२३ ॥ सर्वेश्वर रस । रसगन्धकयोश्चूर्णमेकीकृत्याभ्रकं तथा । हेममिश्रं समं कृत्वा मर्दयेद्यामकद्वयम् ॥ २४ ॥ त्र्यूषणानि लवङ्गैला टंकणं हेमतुल्यकम् । कण्टकार्या रसैर्भाव्यमेकविंशतिवारकम् ॥ २५ ॥ शिग्रुबीजार्द्रकरसैः सप्तधा भावयेत्पृथक् । रसः सर्वेश्वरो नाम कासश्वासक्षयापहः ॥ अनुपानं प्रयोक्तव्यं विभीतकफलत्वचम् ॥ २६ ॥ पारा, गन्धक, अभ्रकभस्म, सोनाभस्म, त्रिकुटा, लौंग, इलायची और सुहागा यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेवे; सबको एकत्र कर २ प्रहर मर्दन करे; पश्चात् कटेरीके रसमें २१ वार, सहिंजनेके बीजोंके रसमें सात वार और अदरखके रसमें सात भावना देवे । बहे- डेकी त्वचाके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे खाँसी, श्वास और क्षयरोग नष्ट होते हैं । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ २४-२६ ॥ शृङ्गाराभ्र । शुद्धं कृष्णाभ्रचूर्णं द्विपलपरिमितं शाणमात्रं यद- न्यत्, कर्पूरं जातिकोषं सजलमिभकणा तेजपत्रं

( ३०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लवङ्गम् । मांसीतालीशचोचे गजकुसुमगदं धातंकी चेति तुल्यं, पथ्या धात्री विभीतं त्रिकटुरथ पृथक् चार्द्धशाणं द्विशाणम् ॥२७॥ एला जातीफलाख्यं क्षितितलविधिना शुद्धगन्धाश्मकोलं, कोलार्द्धं पारदस्य प्रतिपदविहितं सर्वमेकत्र मिश्रम् । पानी- येनैव कार्याः परिणतचणकस्विन्नतुल्याश्च वट्यः प्रातः खाद्याश्चतस्रस्तदनु च कतिचिच्छृङ्गवेर सपर्णम् ॥ २८ ॥ पानीयं पीतमन्ते ध्रुवमपहरति क्षिप्रमेतान्विकारान्, कोष्ठे दुष्टाग्निजातान् ज्वरं- मुदररुजो राजयक्ष्म क्षयं च । कासं श्वासं सशोथं नयनपरिभवं मेहमेदोविकारान्, छर्दिं शूलाम्लपित्तं तृषमपि महतीं गुल्मजालं विशालम् ॥ २९ ॥ पाण्डुत्वं रक्तपित्तं गरलभवगदान्पीनसं प्लीह- रोगान्, हन्यादामाशयोत्थान्कफपवनकृतान्पित्त- रोगानशेषान् । बल्यो वृष्यश्च योगस्तरुणतरकरः सर्वरोगे प्रशस्तः, पथ्यं मांसैश्च यूषैर्घृतपरिलुलितै- र्गव्यदुग्धैश्च भूयः ॥ ३० ॥ भोज्यं योज्यं यथेष्टं ललितललनया दीयमानं मुदा यच्छृङ्गाराभ्रेणकामी युवतिजनशता भोगयोगादतुष्टः । वर्ज्यं शाकाम्ल- मादौ दिनकतिपयचित्स्वेच्छया भोज्यमन्यद्दीर्घायुः काममूर्त्तिर्गतवलिपलितोमानवोऽस्य प्रसादात्॥३१॥ कृष्णाभ्रकभस्म दो पल, कपूर, जावित्री, सुगंधवाला, गज- पीपल, तेजपात, लौंग, बालछड, तालीशपत्र, दालचीनी, नागकेशर,

भाषाटीकासहित । ( ३०७ ) कूठ और धायके फूल यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे; हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच और पीपल यह प्रत्येक औषधि तीन तीन मासे, इलायची और जायफल यह प्रत्येक औषधि आठ आठ मासे, पाताल यंत्रमें शुद्ध किया हुआ गंधक ८ मासे और पारा ४ मासे लेवे; प्रथम पारे गंधककी कज्जली करे फिर सबको एकत्र जलमें पीसकर सीजे चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिको प्रातःकाल अदरख और पानके रसके द्वारा सेवन करके ऊपरसे जल पान करे; इसकी मात्रा ४ गोली तक है । इसके भक्षण करनेसे कोष्ठगत मंदाग्निजनित रोगसमूह, ज्वर, उदररोग, राजयक्ष्मा, क्षय, खांसी, श्वास, शोथ, नेत्ररोग, प्रमेह, मेदरोग, वमन, शूल, अम्लपित्त, तृषा, गुल्म, पांडुता, रक्तपित्त, विषमरोग, पीनस, प्लीहारोग, आमाशयजन्य समस्त रोग और कफ, वायु तथा समस्त पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं। यह औषधि बलकारक वीर्यवर्द्धक वृद्ध शरीरको नवीन करनेवाला और सर्व प्रकारके रोगोंमें उपयुक्त फलदायक है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें घृतमें पके हुए मांसका यूष, बहुतसा गायका दूध और सुन्दरी स्त्रीके द्वारा प्रदान किया हुआ यथेष्ट भोजन करे । कामी मनुष्य इस औषधिका सेवन करके सैकड़ों युवती स्त्रियोंके साथ सम्भोग करनेसे भी तृप्त नहीं होता है । इस औष- धिके सेवन करनेपर कुछ दिनोंतक अम्ल रसवाले पदार्थ और शाकको त्याग देवे । अन्यान्य खाद्य द्रव्योंको इच्छानुसार भोजन करे । मनुष्य इस औषधिके प्रभावसे वली और पलित रहित हो जाते हैं तथा कामदेवके समान रूपवान्, प्रभावयुक्त और दीर्घायु होते हैं । इसको शृंगाराभ्र कहते हैं ॥ २७-३१ ॥ सार्वभौम रस । जीर्णं सुवर्णं लौहं वा यद्यत्रैव प्रदीयते । तदायं सर्वरोगाणां सार्वभौमो न संशयः ॥ ३२ ॥

( ३०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शृंगाराभ्रकमें जो औषधि कही हैं उनमें यदि पारेकी बराबर सोनाभस्म अथवा लोहाभस्म मिला लिया जाय तो उसको सार्वभौम रस कहते हैं; यह सब रोगनाशक है ॥ ३२ ॥ तरुणानन्द रस । कर्षद्वयं रसेन्द्रस्य शुद्धस्य गन्धकस्य च । कज्जलीकृत्य यत्नेन शिलातलशुभे दृढे ॥ ३३ ॥ बिल्वाग्निमन्थः श्योनाकः काश्मरी पाटला बला । मुस्तं पुनर्नवा धात्री बृहती वृषपत्रकम् ॥ ३४ ॥ विदारी शतमूली च कर्षैरैषां पृथग्रसैः । मर्दयित्वा पुनर्वासास्वरसैर्दशतोलकैः ॥ ३५ ॥ मर्दयेत्तत्र शुद्धाभ्रं रसस्य द्विगुणं क्षिपेत् । रसस्यार्द्धञ्च कर्पूरं तत्रैव दापयेद्भिषक् ॥ ३६ ॥ जातीकोषफले मांसी तालीशैला लवंगकम् । चूर्णं कृत्वा प्रयत्नेन माषमात्रं क्षिपेत्पृथक् ॥३७॥ विदारीस्वरसेनैव वटिकां कारयेद्भिषक् । राजयक्ष्माणमत्युग्रं क्षयञ्चोग्रमुरःक्षतम् ॥ ३८ ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं स्वराघातमरोचकम् । कामलां पांडुरोगञ्च प्लीहानं सहलीमकम् ॥३९॥ जीर्णज्वरं तृषां गुल्मं ग्रहणीमामसंभवाम् । अतिसारञ्च शोथञ्च कुष्ठानि च भगन्दरम् ॥४०॥ नाशयेदेष विख्यातस्तरुणानन्दसंज्ञितः । रसायनवरो वृष्यश्चक्षुष्यः पुष्टिवर्द्धनः ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३०९ ) सहस्रं याति नारीणां भक्षणादस्य मानवः । क्षीणता न च शुक्रस्य न च बुद्धिबलक्षयम् ॥४२॥ द्विमाषमुपयोगेन निहन्ति कामलागदान् । शुक्रसन्दीपनं कृत्वा ज्वरं हन्ति न संशयः ॥ ४३॥ नारिकेलजलेनैव भक्ष्योऽयं च रसायनः ॥ क्षीरानुपानाद्वृष्योऽयं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ४४ ॥ शुद्ध पारा २ कर्ष और शुद्ध गंधक २ कर्ष लेवे, इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे । पश्चात् बेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, कुंभेर, पाठ, खिरेंटी, नागरमोथा, पुनर्नवा, आमले, कटेरी, अडूसेके पत्ते, विदारीकंद और सतावर इन प्रत्येकके एक एक कर्ष रसके द्वारा अच्छे प्रकारसे खरल करके पश्चात् दश तोले परिमाण अडूसेका रस लेकर उसमें खूब खरल करे । फिर इसमें अभ्रक ४ कर्ष, कपूर १ तोला, जावित्री १ मासा, जायफल १ मासा, बालछड़ १ मासा, तालीशपत्र १मासा, इलायची १ मासा और लौंग १ मासा लेकर सबको एकत्र विदारी- कंदके स्वरसमें पीसकर गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे अत्यन्त उग्र राजयक्ष्मा, क्षत, उरक्षत, पांच प्रकारकी खांसी, श्वास, स्वरभेद, अरुचि, कामला, पांडुरोग, प्लीहा, हलीमक, जीर्णज्वर, तृषा, गुल्म, आमजन्य संग्रहणी, अतिसार, शोथ, कुष्ठ और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं, यह औषधि उत्तम रसायन है । वीर्यको बढ़ानेवाली, नेत्रोंको हितकारी और पुष्टिको बढ़ानेवाली है। इसका सेवन करनेवाला मनुष्य सौ स्त्रियोंके साथ विषय करनेपर भी वीर्यक्षय नहीं होता तथा बुद्धि और बलकी कभी न्यूनता नहीं होती । इस औषधिको दो मासे परिमाण सेवन करनेसे कामला रोग नष्ट होता है; इससे शुक्रकी वृद्धि होकर ज्वर नष्ट होता है । इसको नारियलके जलके अनुपानके साथ सेवन करनेसे, दूधके अनुपानके साथ सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि होती है । इसको तरुणानन्द रस कहते हैं ॥ ३३-४४ ॥

( ३१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । महोदधि रस । सूतकं गन्धकं लौहं विषञ्चैव वराङ्गकम् । ताम्रकं वङ्गभस्मापि व्योमकञ्च समांशकम् ॥४५॥ त्रिकटु भद्रमुस्तञ्च विडङ्गं नागकेशरम् । रेणुकामलकञ्चैव पिप्पलीमूलमेव च ॥ ४६ ॥ एषाञ्च द्विगुणं भागं मर्दयित्वा प्रयत्नतः । भावना तत्र दातव्या गजपिप्पलिकाम्बुभिः ॥४७ ॥ चणमात्रा वटी कार्या संग्रहग्रहणीहिता । कासं हन्ति तथा श्वासमर्शांसि च भगन्दरम्॥४८॥ हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च कर्णरोगं कपालिकाम् । हरेत्संग्रहणीरोगानष्टौ च जाठराणि च ॥ प्रमेहान्विंशतिश्चैव चतुर्विधमजीर्णकम् ॥ ४९ ॥ न चान्नपाने परिहार्यमस्ति न शीतवातातपमैथुनेषु । यथेष्टचेष्टाभिरतः प्रयोगे नरो भवेत् काञ्चन- राशिगौरः ॥ ५० ॥ शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म, विष, दालचीनी, तांबाभस्म, वंग- भस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग,सोंठ,मिरच, पीपल,नागरमोथा, वायविडंग, नागकेशर, रेणुका, आमले और पीपला- मूल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र मर्दन करके गजपीपलके रसकी भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह गोली ग्रहणी रोगमें अत्यन्त हितकारी है । इस औषधिके सेवन करनेसे खांसी, श्वास, बवासीर, भगन्दर, हृदयशूल, पार्श्वशूल, कर्णरोग, कपालिका रोग, संग्रहणी, आठ प्रकारके उदर रोग, बीस प्रकारके प्रमेह और चारप्रकारका अजीर्ण रोग ये सब नष्ट होते हैं,

भाषाटीकासहित । ( ३११ ) इस औषधिके सेवन करनेपर पान और भोजनका कुछ नियम नहीं है । शीत पवन और सूर्यकी धूपका सेवन, स्त्रीप्रसंग आदिका कुछ परहेज नहीं है । इसपर यथेष्ट आहार और विहार करे । इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य सुवर्णके समान वर्णवाला हो जाता है । इसको महोदधि रस कहते हैं ॥ ४५-५० ॥ जया गुटिका । सूतकं गन्धकं लौहं विषं वत्सकमेव च । विडङ्गं केशरं मुस्तमेलाग्रन्थिकरेणुकम् ॥ ५१ ॥ त्रिकटु त्रिफला चित्रं शुद्धं जैपालबीजकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो गुड उच्यते ॥ ५२ ॥ तिन्तिडीबीजमानेन प्रातःकाले च भक्षयेत् । कासं श्वासं क्षयं गुल्मं प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५३ ॥ अजीर्णं ग्रहणीरोगं शूलं पाण्ड्वामयन्तथा । अपाने हृदये शूले वातरोगे गलग्रहे ॥ ५४ ॥ अरुचावतिसारे च सूतिकातङ्कपीड़िते । जयाख्या निर्मिता ह्येषा भक्षणीया सुरैरपि ॥ ५५ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, कुड़ेकी छाल, वायविडंग, नाग- केशर, नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, रेणुका, त्रिफला, त्रिकुटा, चीतेकी जड़ और शुद्ध जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर इमलीके बीजोंकी समान गोली बनाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करनेसे कास, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी, शूल और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिका गुह्यशूल, हृदयशूल, वातरोग, गलेकी पीड़ा, अरुचि, अतिसार और सूतिकारोगमें

( ३१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रयोग करे । यह औषधि देवतालोंकों भी सेवन करनी चाहिये । इसको जया गुटिका कहते हैं ॥ ५१-५५ ॥ विजया गुटिका । सूतकं गंधकं लौहं विषं चित्रकपत्रकम् । विडंगं रेणुका मुस्तमेलाकेशरग्रन्थिकम् ॥ ५६ ॥ फलत्रिकं त्रिकटुकं शुल्वभस्म तथैव च । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ५७ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे । सूतायां ग्रहणीरोगे शूले पाण्ड्वामये तथा ॥ हस्तपादादिदाहे च गुटिकेयं प्रशस्यते ॥ ५८ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, विष, चित्रकके पत्ते, वायविडंग, रेणुका, नागरमोथा, इलायची, नागकेशर, पीपलामूल, त्रिफला, त्रिकुटा और ताम्रभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सब चूर्णके बराबर पुराना गुड़ लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रा- नुसार सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, सूतिकारोग, ग्रहणी, शूल, पांडुरोग तथा हाथ और पावोंकी दाह दूर होती है । इसको विजया गुटिका कहते हैं ॥ ५६-५८ ॥ स्वच्छन्दभैरव रस । रसमेकं द्विधा गंधं गंधतुल्यञ्च सैन्धवम् । ज्वालामुखीरसैः पञ्च दिनानि परिमर्दयेत् ॥ ५९ ॥ मूषिकायां निरुध्याथ पुटेद्रात्रौ च मध्यमम् । सर्वं भस्म यदा याति वल्लमेनं प्रयोजयेत् ॥ ६० ॥ ग्रहण्यां संग्रहण्याञ्च कासे श्वासे विशेषतः । उग्रासु ज्वरतन्द्रासु निद्रास्वल्पासु योजयेत् ॥ ६१ ॥

भाषाटीकासहित । ( ३१३ ) अन्यरोगेषु तं दद्याद्रसं स्वच्छन्दभैरवम् । तुष्टिं पुष्टिमसौ कुर्यात्सौकुमार्यञ्च कारयेत् ॥ ६२ ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग इन दोनों औषधियोंको एकत्र खरल करके ज्वालामुखीके रसमें पांच दिन तक खरल करे । फिर मूषामें स्थापन करके रात्रिके समय मध्यम अग्निसे पुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर संग्रहणी, खांसी, श्वास, उन्मादयुक्त उग्र ज्वर और निद्राकी अल्पता आदि रोगोंमें प्रयोग करे । इसके अतिरिक्त अन्यान्य रोगोंमें भी यह औषधि प्रयुक्त करनी चाहिये । इससे तुष्टि, पुष्टि और शरीरमें कोमलता उत्पन्न होती है । इसको स्वच्छन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ५९-६२ ॥ रसगुटिका । रसभागो भवेदेको गन्धको द्विगुणो भवेत् । त्रिभागा पिप्पली पथ्या चतुर्भागा विभीतकः ॥६३॥ पञ्चभागस्त्वामलाश्च षड्गुणाः सप्तभागिका । भार्गी सर्वमिदं चूर्णं भाव्यं बब्बोलजैर्द्रवैः ॥ ६४ ॥ एकविंशतिवारञ्च मधुना गुटिका कृता । विभीतकप्रमाणेण प्रातरेकान्तु भक्षयेत् ॥ कासं श्वासं हरेत्क्षुद्राक्वाथन्तदनु कृष्णया ॥ ६५ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, पीपल ३ भाग, हरड़ ४ भाग, बहेड़ा ५ भाग,आमले ६ भाग और भारंगी ७ भाग लेवे, इन सबको एकत्र बबूरके रसमें २१ बार भावना देकर सहतमें खरल करके बहेड़ेकी समान गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक एक गोली प्रातःकाल सेवन करे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवनके अन्तमें पीपलके चूर्णके साथ कटेरीके रसको पान करे । इसको रसगुटिका कहते हैं ॥ ६३-६५ ॥

अम्लपित्तविनाशिनी ।" "वह्निसन्दीपनो श्रेष्ठा त्वरोचकविनाशिनी ॥ ६९ ॥" or "वह्निसन्दीपनौ"? Look at the image of that exact word: ह्नि न्दी नी Wait, look at the glyph for 'नी' in 'विनाशिनी': The right bar of 'नी' has an arch that goes over to the left bar of 'न'. Now look at वह्निसन्दीपनो: Wait, does it have 'ी'? Let's look at the top of the right bar: It has a slant going up and left. Wait, does it have a loop? Wait, could it be वह्निसन्दीपनो? Wait, look at त्वरोचकविनाशिनी: त्व - रो - च - क - वि - ना - शि - नी 1 2 3 4 5 6 7 8 = 8 syllables! Look at रो in त्वरोचक: The letter has a vertical bar to its right? No, with is just with an on top and an bar? In Devanagari, रो is + , where the vertical

भाषाटीकासहित । (३१५) इयं यदि सदा सेव्या तदा स्याद्योगवाहिका ॥ वृद्धोऽपि तरुणः शक्तः स्त्रीशतेषु वृषायते ॥७२॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कजली बनाकर उसमें त्रिकुटा ३ भाग और त्रिफला ३ भाग मिलावे । फिर बकरीके दूधकी भावना देकर गोली बनाकर अदरखके साथ सेवन करे और ऊपरसे थोड़ा शीतल जल पीवे । यह औषधि खाँसी और श्वासको हरनेवाली और अग्निको दीपन करनेवाली है । इस योगवाही औषधिको नित्य प्रातःकाल सेवन करनेसे वृद्ध मनुष्य भी तरुणके समान होजाता है तथा सौ स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है । इसको पुरन्दरवटी कहते हैं ॥ ७०-७२ ॥ कासांतक रस । सूतं गन्धं विषञ्चैव शालपर्णी च धान्यकम् । यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं मरीचकम् ॥ गुञ्जाचतुष्टयं खादेन्मधुना कासशान्तये ॥ ७३ ॥ पारा, गंधक, विष, शालिपर्णी और धनिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और कालीमिरचोंका चूर्ण पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर चार २ रत्ती परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे कासरोग नष्ट होता है । इसको कासान्तक रस कहते हैं ॥ ७३ ॥ कासकुठार रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं सव्योषं टंकणन्तथा । द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैः सन्निपातं सुदारुणम् ॥ कासं नानाविधं हन्ति शिरोरोगं विनाशयेत् ॥७४॥ हिंगुल, काली मिरच, गंधक, सोंठ, मिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सबको एकत्र बारीक खरल करके दो रत्ती परिमाण औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे

( ३१६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दारुण सन्निपातरोग नष्ट होता है । इससे अनेक प्रकारकी खांसी और शिरोरोग नष्ट होते हैं । इसको कासकुठार रस कहते हैं ॥ ७४ ॥ चन्द्रामृत लोह । त्रिकटु त्रिफला धान्यं चव्यं जीरकसैन्धवम् । दिव्यौषधिहतस्यापि तत्तुल्यमयसो रजः ॥७५॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥७६॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसाप्लुताम् । नीलोत्पलरसेनैव कुलत्थस्वरसेन च ॥ ७७ ॥ निहन्ति विविधं कासं दोषत्रयसमुद्भवम् । वातिकं पैत्तिकञ्चैव गरदोषसमुद्भवम् ॥ ७८ ॥ सरक्तमथ नीरक्तं ज्वरं श्वाससमन्वितम् । भ्रमतृड्दाहशूलघ्नं रुच्यं वह्निप्रदीपनम् ॥ ७९ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं जीर्णज्वरविनाशनम् । इदं चन्द्रामृतं लौहं चन्द्रनाथेन निर्मितम् ॥ ८० ॥ त्रिकुटा, त्रिफला, धनिया, चव्य, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, मैनशिलके द्वारा मारा हुआ लोहा दश भाग लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र जलमें खरल करके नौ नौ रत्तीक गोलियां बना लेवे । प्रातःकाल पवित्र होकर अमृतेश्वरीका ध्यान करके एक एक गोली लाल कमोदिनीके रसके द्वारा अथवा नीलोत्पलके रसके द्वारा, अथवा कुलथीके द्वारा सेवन करे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, त्रिदोषज कास, वातज कास, पित्तज कास, विषदोषोद्भव कास, रुधिरयुक्त कास, रक्तरहित कास, श्वास- युक्त ज्वर, भ्रम, तृषा, दाह और शूलरोग शमन होते हैं ।

भाषाटीकासहित । ( ३१७ ) यह औषधि अतीव रुचिकारक, अग्निप्रदीपक, बल, वर्ण और वीर्य्यको बढ़ानेवाली तथा जीर्णज्वरको हरनेवाली है । इस चन्द्रामृत लोहको महादेवने कहा है ॥ ७५-८० ॥ श्रीचन्द्रामृत रस । रसगन्धकलौहानां प्रत्येकं कार्षिकं क्षिपेत् । टंकणस्य पलं दत्त्वा मरिचस्य पलार्द्धकम् ॥ ८१॥ त्रिकटु त्रिफला चव्यं धान्यजीरकसैन्धवम् । प्रत्येकं तोलकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् ॥ ८२ ॥ नवगुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कारयेद्भिषक् । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा चिन्तयित्वाऽमृतेश्वरीम्॥८३॥ एकैकां वटिकां खादेद्रक्तोत्पलरसेन च । नीलोत्पलरसेनापि कुलत्थस्वरसेन च ॥ ८४ ॥ छागीक्षीरेण मण्डेन केशराजरसेन च । निहन्ति विविधं कासं वातरक्तसमुद्भवम् ॥ ८५ ॥ वातश्लेष्मज्वरं कासं पित्तश्लेष्मज्वरं तथा । वातिकं पैत्तिकं वापि गरदोषसमन्वितम् ॥ ८६ ॥ वासा गुडूचिका भार्ङ्गी मुस्तकं कण्टकारिका । समभागकृतं क्वाथं प्रत्यहं भक्षयेदनु ॥ ८७ ॥ पारा, गन्धक और लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण लेवे, सुहागा १ पल, काली मिरच आधा पल, त्रिकुटा, त्रिफला, चव्य, धनिया, जीरा और सेंधानमक यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे, सबको एकत्र खरल करके बकरीके दूधमें पीस- कर नौ नौ रत्तीकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल

( ३१८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मलमूत्रादिसे शुद्ध होकर और अमृतेश्वरी देवीका ध्यान करके एक एक गोली खाये । रक्तोत्पलका रस, नीलोत्पलका रस, कुथलीका क्वाथ, बकरीका दूध, मांड और कुकुरभांगरेका रस इनमेंसे एक किसी अनुपानके साथ सेवन करनेसे अनेक प्रकारकी खाँसी, वात- रक्तोत्पन्न खाँसी, वातश्लेष्म ज्वर, पित्तश्लेष्म ज्वर, वातिक ज्वर, पैत्तिक ज्वर और विषदोषसमन्वितज्वर यह सब नष्ट होते हैं । अड़ू- सा, गिलोय, भारंगी, नागरमोथा और कटेरी इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनाकर ऊपरसे पान करे ॥ ८०-८७ ॥ अमृतमञ्जरी । हिंगुलञ्च विषञ्चैव कणा मरिचटङ्कणम् । जातीकोषं समं सर्वं जम्बीररसमर्दितम् ॥ ८८ ॥ रक्तिमानां वटीं कुर्यादार्द्रकरससंयुताम् । वटीद्वयं त्रयं खादेत्सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ८९ ॥ अग्निमांद्यमजीर्णञ्च सामवातं सुदारुणम् । उष्णतोयानुपानेन सर्व व्याधिं नियच्छति ॥ ९० ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं सर्वाङ्गग्रहमेव च । जीर्णज्वरं क्षयं चैव हन्यादमृतमञ्जरी ॥ ९१ ॥ सिंग्रफ, विष, पीपल, काली मिरच, सुहागा और जावित्री इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर जम्भीरी नींबूके रसमें खरल करके एक एक रत्तीकी गोली बनाकर अदरखके रसके साथ दो अथवा तीन गोली सेवन करनेसे दारुण सन्निपात, मन्दाग्नि, अजीर्ण और आमवात रोग नष्ट होते हैं । गरम जलके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग शमन होते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी खांसी, श्वास, सर्वांगपीड़ा, जीर्णज्वर और क्षय दूर होते हैं । इसको अमृतमञ्जरी वटी कहते हैं ॥ ८८-९१॥

भाषाटीकासहित । ( ३१९ ) कासान्तक रस । त्रिफलाव्योषचूर्णञ्च समभागं प्रकल्पयेत् । मधुना सह पानात्तु दुष्टकासं नियच्छति ॥ ९२ ॥ त्रिफला और त्रिकुटा समान भाग लेकर दोनोंको एकत्र चूर्ण करके जलमें पीसकर यथोचित मात्रानुसार शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे दुष्ट खाँसी शांत होती है ॥ ९२ ॥ बृहच्छृङ्गाराभ्र । पारदं गन्धकञ्चैव टंकणं नागकेशरम् । कर्पूरं जातिकोषञ्च लवंगं तेजपत्रकम् ॥ ९३ ॥ सुवर्णं चापि प्रत्येकं कर्षमात्रं प्रकल्पयेत् । शुद्धकृष्णाभ्रचूर्णन्तु चतुःकर्षं प्रयोजयेत् ॥ ९४ ॥ तालीशं घनकुष्ठञ्च मांसीत्वग्धातृपुष्पिका । एलाबीजं त्रिकटुकं त्रिफला करिपिप्पली ॥९५॥ कर्षयोर्द्वयमेतेषां पिप्पलीक्वाथमर्दितम् । अनुपानं प्रयोक्तव्यं चोचं क्षौद्रसमायुतम् ॥ ९६ ॥ अग्निमान्द्यादिकान् रोगानरुचिं पाण्डुकामलाम् । औदराणि तथा शोथमानाहं ज्वरमेव च ॥ ९७ ॥ ग्रहणीं श्वासकासञ्च हन्याद्यक्ष्माणमेव च । नानारोगप्रशमनं बलवर्णाग्निकारकम् ॥ ९८ ॥ बृहच्छृंगाराभ्रनाम विष्णुना परिकीर्तितम् । एतस्याभ्यासमात्रेण निर्व्याधिर्जायते नरः ॥ ९९ ॥

( ३२० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुहागा, नागकेशर, कपूर, जावित्री, लौंग, तेजपात और सुवर्णकी भस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष, कृष्णाभ्रक भस्म ४ कर्ष, तालीशपत्र, नागरमोथा, कूठ, वालछड़, दारचीनी, धायके फूल, इलायची, त्रिकुटा, त्रिफला और गजपीपल यह प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष लेवे । सबको एकत्र पीसकर पीपलके क्वाथमें खरल करके दालचीनीके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करनेसे मन्दाग्नि, अरुचि, पांडु, कामला, उदररोग, शोथ, आनाह, ज्वर, संग्रहणी, श्वास, खाँसी और राजयक्ष्मारोग यह सब नष्ट होते हैं । इससे अनेक प्रकारके रोग दूर होकर बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि होती है । प्रतिदिन इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं । इसको बृहच्छृङ्गाराभ्र कहते हैं ॥ ९३-९९ ॥ नित्योदय रस । सुशुद्धं पारदं गन्धं प्रत्येकं शुक्तिसम्मितम् । ततः कज्जलिकां कृत्वा मर्दयेच्च पृथक्पृथक् ॥१००॥ बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मरी पाटला बला । मुस्तं पुनर्नवा धात्री बृहती वृषपत्रकम् ॥ १०१ ॥ विदारी बहुपुत्री च एषां कर्षै रसैर्भिषक् । सुवर्णं रजतं ताप्यं प्रत्येकं शाणमात्रकम् ॥ १०२ ॥ पलमात्रं तु कृष्णाभ्रं तदर्द्धन्तु सिताभ्रकम् । जातीकोषफले मांसी तालीशैलालवंगकम् ॥१०३॥ प्रत्येकं कोलमात्रन्तु वासानीरैर्विमर्दयेत् । शोषयित्वाऽऽतपे पश्चाद्विदार्याः पेषयेद्रसैः॥१०४॥ द्विगुंजां वटिकां कृत्वा पिप्पलीमधुना भजेत् । नाम्ना नित्योदयश्चायं रसो विष्णुविनिर्मितः॥१०५॥ १ सिताह्वयम्-इत्यपि केचित पठन्ति ।

पञ्च कासान्निहन्त्याशु चिरकालोद्भवानपि । राजयक्ष्माणमप्युग्रं जीर्णज्वरमरोचकम् ॥१०६॥ धातुस्थं विषमाख्यञ्च तृतीयकचतुर्थकौ । अर्शांसि कामलां पाण्डुमग्निमान्द्यं प्रमेहकम् । सेवनादस्य कन्दर्परूपो भवति मानवः ॥१०७॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कासाधिकारः । शुद्ध पारा ६ मासे और गन्धक ६ मासे दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर बेलकी जड़, अरणी, सोनापाठा, कुम्भीर, पाढल, खिरैंटी, नागरमोथा, पुनर्नवा, आमले, बड़ी कटेरी, अडूसेके पत्ते, विदारीकंद और सतावर इन प्रत्येकके एक एक कर्ष परिमाण रसके द्वारा अलग अलग खरल करे । पश्चात् इसमें सुवर्णकी भस्म ४ मासे, चांदीकी भस्म ४ मासे, सोनामाखीभस्म ४ मासे, कृष्णाभ्रकभस्म ४ तोले, कपूर २ तोले, जावित्री, जायफल, बालछड़, तालीशपत्र, इलायची और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला मिलाकर अडूसेके रसमें खरल करके धूपमें सुखा देवे । फिर दुवारा विदारीकंदके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे पांच प्रकारकी बहुत दिनोंकी पुरानी खाँसी, राजयक्ष्मा, जीर्ण- ज्वर, अरुचि, धातुगत विषमज्वर, तृतीयक और चातुर्थिक ज्वर, बवासीर, कामला, पांडु, मंदाग्नि और प्रमेह रोग नष्ट होते हैं। इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य कामदेवके समान रूपवान् हो जाता है । यह नित्योदय रस विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ १००-१०७ ॥ इति कासाधिकार समाप्त ।

( ३२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हिक्काश्वासाधिकार । सूर्यावर्त्त रस । सूतकं गन्धकं मर्द्यं यामैकं कन्यकाद्रवैः । द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं पूर्वकल्केन लेपयेत् ॥ १ ॥ दिनैकं हंडिकायन्त्रे पचेच्छीतं समुद्धरेत् । सूर्यावर्त्तरसो नाम द्विगुञ्जः श्वासकासनुत् ॥ २ ॥ इन्द्रवारुणिकामूलं देवदारु कटुत्रयम् । शर्करासहितं खादेदूर्ध्वश्वासनिवृत्तये ॥ ३ ॥ प्रथम पारे और गंधक दोनोंको घृतकुमारी ( घीकार ) के रसमें खरल करे, पश्चात् पारे और गंधक दोनोंकी बराबर तांबेके पत्र लेकर उनपर उक्त गंधक और पारेके कल्कका लेप कर देवे । फिर इन तांबेके पत्तोंको एक हांडीमें रखकर उसको सराव या अभ्रकसे ढककर बालूसे हांडीको भरकर एक दिन तक पकावे । पश्चात् शीतल होनेपर चूर्ण करके दोरत्ती परिमाण औषधि सेवन करनेसे श्वास और खांसी दूर होती है । इसको सूर्यावर्त्त रस कहते हैं । इन्द्रायणकी जड़, देव- दारु और त्रिकुटा इन सबको एकत्र पीसकर मिश्री मिलाकर सेवन करनेसे ऊर्ध्वश्वास दूर हो जाता है ॥ १-३ ॥ विजयवटी । सूतकं गन्धकं लौहं विषमभ्रकमेव च । विडङ्गं रेणुकं मुस्तमेला ग्रन्थिककेशरम् ॥ ४ ॥ त्रिकटु त्रिफला तालं शुल्वं जैपालचित्रकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ५ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे ।