रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३०७ ) कूठ और धायके फूल यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे; हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच और पीपल यह प्रत्येक औषधि तीन तीन मासे, इलायची और जायफल यह प्रत्येक औषधि आठ आठ मासे, पाताल यंत्रमें शुद्ध किया हुआ गंधक ८ मासे और पारा ४ मासे लेवे; प्रथम पारे गंधककी कज्जली करे फिर सबको एकत्र जलमें पीसकर सीजे चनेकी बराबर गोली बना लेवे । इस औषधिको प्रातःकाल अदरख और पानके रसके द्वारा सेवन करके ऊपरसे जल पान करे; इसकी मात्रा ४ गोली तक है । इसके भक्षण करनेसे कोष्ठगत मंदाग्निजनित रोगसमूह, ज्वर, उदररोग, राजयक्ष्मा, क्षय, खांसी, श्वास, शोथ, नेत्ररोग, प्रमेह, मेदरोग, वमन, शूल, अम्लपित्त, तृषा, गुल्म, पांडुता, रक्तपित्त, विषमरोग, पीनस, प्लीहारोग, आमाशयजन्य समस्त रोग और कफ, वायु तथा समस्त पित्तजनित रोग नष्ट होते हैं। यह औषधि बलकारक वीर्यवर्द्धक वृद्ध शरीरको नवीन करनेवाला और सर्व प्रकारके रोगोंमें उपयुक्त फलदायक है । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें घृतमें पके हुए मांसका यूष, बहुतसा गायका दूध और सुन्दरी स्त्रीके द्वारा प्रदान किया हुआ यथेष्ट भोजन करे । कामी मनुष्य इस औषधिका सेवन करके सैकड़ों युवती स्त्रियोंके साथ सम्भोग करनेसे भी तृप्त नहीं होता है । इस औष- धिके सेवन करनेपर कुछ दिनोंतक अम्ल रसवाले पदार्थ और शाकको त्याग देवे । अन्यान्य खाद्य द्रव्योंको इच्छानुसार भोजन करे । मनुष्य इस औषधिके प्रभावसे वली और पलित रहित हो जाते हैं तथा कामदेवके समान रूपवान्, प्रभावयुक्त और दीर्घायु होते हैं । इसको शृंगाराभ्र कहते हैं ॥ २७-३१ ॥ सार्वभौम रस । जीर्णं सुवर्णं लौहं वा यद्यत्रैव प्रदीयते । तदायं सर्वरोगाणां सार्वभौमो न संशयः ॥ ३२ ॥