भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ३८९ ) अनुपानं गवां क्षीरं नीरं वा नारिकेलजम् । सर्वशूलं निहन्त्याशु वातपित्तभवं तथा ॥ ३८ ॥ एकजं द्वन्द्वजञ्चैव तथैव सान्निपातिकम् । परिणामोद्भवं शूलमामवातोद्भवं तथा ॥ ३९ ॥ कार्श्यं वैवर्ण्यमालस्यं तन्द्रारुचिविनाशनम् । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ४० शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा, निसोथकी जड़, दन्तीकी जड़, चित्रककी जड़, मूसाकानी और पीपला- मूल यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण, कृष्णाभ्रकभस्म १ पल और लोहभस्म ४ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृत और सहतमें खरल करके बेरकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे गायका दूध अथवा नारियलका जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातपित्तज, एकदोषज, द्विदोपज, त्रिदोषज, परिणामजन्य और आमवातज शूल, कृशता, विवर्णता, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि और अन्यान्य समस्त साध्यासाध्य रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्ध- कारका समूह नष्ट होता है । इसको बृहद्विद्याधराभ्र कहते हैं ३५-४०॥ सर्वांगसुन्दर रस । शुद्धसूतं तथा ताम्रं शिलामाक्षिकतालकम् । रजतं स्वर्णवङ्गञ्च लौहमभ्रं सनागरम् ॥ ४१ ॥ चूर्णयेत्पञ्चलवणं देयं सर्वन्तु तुल्यकम् । गन्धकं मिश्रयेत्सर्वं रसैरेषां विभावयेत् ॥ ४२ ॥ शुण्ठीजयन्तीविजयामहाराष्ट्रिकधूर्तजैः । सर्वाङ्गसुन्दरो नाम्ना रसोऽयं विष्णुनिर्मितः ॥ ४३ ॥