रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( ३८९ ) अनुपानं गवां क्षीरं नीरं वा नारिकेलजम् । सर्वशूलं निहन्त्याशु वातपित्तभवं तथा ॥ ३८ ॥ एकजं द्वन्द्वजञ्चैव तथैव सान्निपातिकम् । परिणामोद्भवं शूलमामवातोद्भवं तथा ॥ ३९ ॥ कार्श्यं वैवर्ण्यमालस्यं तन्द्रारुचिविनाशनम् । साध्यासाध्यं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ४० शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, त्रिफला, त्रिकुटा, वायविडंग, नागरमोथा, निसोथकी जड़, दन्तीकी जड़, चित्रककी जड़, मूसाकानी और पीपला- मूल यह प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण, कृष्णाभ्रकभस्म १ पल और लोहभस्म ४ पल लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र करके घृत और सहतमें खरल करके बेरकी बराबर गोली बना लेवे । प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे गायका दूध अथवा नारियलका जल पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातपित्तज, एकदोषज, द्विदोपज, त्रिदोषज, परिणामजन्य और आमवातज शूल, कृशता, विवर्णता, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि और अन्यान्य समस्त साध्यासाध्य रोग ऐसे नष्ट होते हैं जिसप्रकार सूर्योदयसे अन्ध- कारका समूह नष्ट होता है । इसको बृहद्विद्याधराभ्र कहते हैं ३५-४०॥ सर्वांगसुन्दर रस । शुद्धसूतं तथा ताम्रं शिलामाक्षिकतालकम् । रजतं स्वर्णवङ्गञ्च लौहमभ्रं सनागरम् ॥ ४१ ॥ चूर्णयेत्पञ्चलवणं देयं सर्वन्तु तुल्यकम् । गन्धकं मिश्रयेत्सर्वं रसैरेषां विभावयेत् ॥ ४२ ॥ शुण्ठीजयन्तीविजयामहाराष्ट्रिकधूर्तजैः । सर्वाङ्गसुन्दरो नाम्ना रसोऽयं विष्णुनिर्मितः ॥ ४३ ॥
( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । खादेदेरण्डशुण्ठीभ्यां माषमात्रं दिने दिने । कफवातामयं हन्ति चानुपानं वदाम्यहम् ॥ ४४ ॥ व्योषं सौवर्चलं हिङ्गु करञ्जबीजसंयुतम् । पिबेदुष्णाम्बुना चानु सर्वशूलनिकृन्तनम् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मैनशिल, सोनामाखीभस्म, हरिताल- भस्म, चांदीकी भस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, सोंठ, पांचों लवण और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सोंठके क्वाथ, जयंतीके पत्तोंका रस और भांगके पत्तोंका रस, भारंगीकी जड़का रस और धतूरेके पत्तोंका रस इनमें अलग अलग सात भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । अंडीके तेल और सोंठके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे कफज और वातज व्याधि शमन होती हैं । इसके सेवन करनेके अन्तमें त्रिकुटा, काला नमक, हींग और करंजके बीज इनको बराबर भाग लेकर गरम जलके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारका शूल नष्ट होता है । इस सर्वांगसुन्दर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ४१-४५ ॥ शूलवज्रिणी वटिका । रसगन्धकलोहानां पलार्द्धेन समन्वितम् । त्रिफला रामठं शुल्वं शटी त्रिकटु टङ्कणम् ॥४६॥ पत्रं त्वगेलातालीशजातीफललवङ्गकम् । यमानी जीरकं धान्यं प्रत्येकं तोलकं शुभम् ॥ ४७॥ माषैका वटिका कार्या छागीदुग्धेन वा पुनः। एकैका भक्षिता चेयं वटिका शूलवज्रिणी ॥ ४८॥ शूलमष्टविधं हन्ति प्लीहगुल्मोदरं तथा । अम्लपित्तामवातञ्च पाण्डुत्वं कामलां तथा ॥४९ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३९१) शोथं गलग्रहं वृद्धिं श्लीपदं सभगन्दरम् । वृद्धबालकरी चैव मन्दाग्नेरपि दीपनी ॥ ६० ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और लोहभस्म यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले; त्रिफला, हींग, ताम्रभस्म, कचूर, त्रिकुटा, सुहागा, तेजपात, दारचीना, इलायची, तालीशपत्र, जायफल, लौंग, अजवायन, जीरा और धनियां यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र बकरीके दूधमें पीसकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । बकरीके दूधके साथ इनमेंसे एक एक गोली सेवन करनेसे आठ प्रकारका शूल, प्लीहा, गुल्म, उदर, अम्लपित्त, आम- वात, पांडु, कामला, शोथ, गलग्रह, वृद्धि, श्लीपद और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं । यह औषधि वृद्धको बालकके समान करनेवाली और मन्दाग्निको दीपन करती है। इसे शूलवज्रिणीवटिका कहते हैं॥४६-६०॥ त्रिपुरभैरव रस । भागो रसस्याश्महेम्नो भागो ग्राह्योऽतियत्नतः । तयोर्द्वादश भागानि ताम्रपत्राणि लेपयेत् ॥ ६१ ॥ पचेच्छूलहरः सूतो भवेत्त्रिपुरभैरवः । माषो मध्वाज्यसंयुक्तो देयोऽस्य परिणामजे ॥ अन्ये त्वेरण्डतैलेन हिंगुत्रययुतो रसः ॥ ६२ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गंधक १ भाग दोनोंकी एकत्र कज्जली बनावे । फिर कज्जलीसे बारह गुने तांबेके पत्र लेकर उन पत्रोंपर उक्त कज्जलीका लेप करके मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । पश्चात् इसका चूर्ण बनाकर एक मासे परिमाण औषधि घृत और सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे परिणामशूल नष्ट होता है । कोई कोई वैद्य एरण्डीका तेल, हींग और त्रिकुटेके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेकी व्यवस्था करते हैं ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
( ३९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । रसबलिगगनाकं वेतसाम्लं विषं स्यात्, सवरमिह पृथक्स्याद्भावयेद्द्रसमेतैः । कनकभुजगवल्लीकण्टकारीजयाद्भिः, कमलसलिलवासामुष्टिवज्राम्बुपूरैः ॥ ५३ ॥ अरुणसदृशपाकैर्मातुलुङ्गश्च योज्यः, पटुगण इह तुल्यो भावयेदार्द्रकाद्भिः । दहनवदननाम्ना वल्लमात्रो निहन्ति, प्रबलसकलशूलं तद्विकारानशेषान् ॥ ५४ ॥ पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, अमलवेत, विष और त्रिफला यह सब औषधि समान भाग लेकर धतूरेके पत्ते, पान, कटेरी, भांग, कमल, सुगंधवाला, अडूसा, कुचिला, थूहर और बिजोरा नींबू इन प्रत्येकके रसके द्वारा एक एक भावना देकर फिर उसमें समान भाग लवणवर्ग मिलाकर अदरखके रसके द्वारा सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना ले
भाषाटीकासहित । (३९३) वचामरिचजं चूर्णं कर्षमुष्णजलैः पिबेत् । असाध्यं नाशयेच्छूलं श्रीशूलगजकेसरी ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और गंधक २ भाग दोनोंकी एकत्र कज्जली बना लेवे । पश्चात् तीन भाग तांबा लेकर उसका सम्पुट बनवाकर उसमें इस कज्जलीको भरकर पश्चात् एक हाँडीमें ४ तोले पिसा हुआ नमक बिछाकर उसमें इस मूसाको स्थापित करे और ऊपरसे एक पल परिमाण पिसा हुआ नमक बिछा देवे । पश्चात् गजपुटमें पकावे । जब स्वयं शीतल हो जाय तब मूसाको पीसकर बारीक चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे नित्य दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर पानके रसमें मिलाकर खाये । इस औषधिके भक्षण करनेके पश्चात् हींग, सोंठ, जीरा, वच और काली मिरच यह सब समान भाग लेकर बारीक चूर्ण करके एक कर्ष परिमाण गरम जलके साथ सेवन करे । इससे सर्व प्रका- रका असाध्य शूलरोग नष्ट होता है । इसको श्रीशूलगजकेसरी रस कहते हैं ॥ ५५-५८ ॥ त्रिगुणाख्य रस । टङ्कणं हारिणं शृङ्गं स्वर्णं गन्धं मृतं रसम् । दिनैकमार्द्रकद्रावैर्मर्द्यं रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ५९ ॥ त्रिगुणाख्यो रसो ह्यस्य माषैकं मधुसर्पिषा । सैन्धवं जीरकं हिंगु मध्वाज्याभ्यां लिहेदनु ॥ पक्तिशूलहरः ख्यातो याममात्रान्न संशयः ॥६०॥ शुद्ध सुहागा, हिरनके सींगकी भस्म, सोनाभस्म, गंधक और रससिन्दूर यह सब औषधि समान भाग लेकर अदरखके रसमें एक दिन तक खरल करके पश्चात् मूसामें रखकर और अच्छे प्रकार कप- र्रौटीसे बंद करके पुटपाक करे । इसमेंसे एक मासे परिमाण औषधि लेकर सहत और घृतमें मिलाकर भक्षण करे । सेंधानमक, जीरा और
( ३९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हींग इनको समान भाग लेकर सहत और घृतमें मिलाकर इस औष- धिके ऊपरसे भक्षण करे । इससे एक प्रहरमें परिणामशूल नष्ट होता है । इसको त्रिगुणाख्य रस कहते हैं ॥ ५९ ॥ ६० ॥ शूलहरणयोग । हरीतकी त्रिकटुकं कुचिला हिंगुसैन्धवम् । गन्धकञ्च समं सर्वं वटीं कुर्यात्सुखावहाम् ॥ ६१ ॥ लघुकोलप्रमाणान्तु शस्यते प्रातरेव हि । एकैका वटिका ग्राह्या गुल्मशूलविनाशिनी ॥ ६२ ॥ ग्रहण्यामतिसारे च सजीर्णे मन्दपावके । योजयेदुष्णपयसा सुखमाप्नोति निश्चितम् ॥ सुवर्णञ्च भवेद्देहं सदोत्साहयुतं नृणाम् ॥ ६३ ॥ हरड़, त्रिकुटा, कुचला, हींग, सेंधानमक और गंधक यह सब औषधि समान भाग लेकर जलमें पीसकर गोली बना लेवे । यह गोली छोटे बेरकी बराबर बनानी चाहिये । गुल्म और शूलरोग नष्ट करनेवाली यह गोली प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खाये । ग्रहणी, अतिसार, अजीर्ण और मंदाग्नि प्रभृति रोगोंमें इसको गरम जलके साथ सेवन करे तो अवश्य आरोग्यता प्राप्त होती है । इसके सेवन करनेसे शरीरमें सुवर्णकी समान कांति उत्पन्न होती है । बल और उत्साहकी वृद्धि होती है । इसको शूलहरण योग कहते हैं ॥ ६१-६३ ॥ शर्करालोह । त्रिफलायास्तथा धात्र्याश्चूर्णं वा काललौहजम् । शर्कराचूर्णसंयुक्तं सर्वशूलेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥ त्रिफलेका चूर्ण ३ भाग, आमलेका चूर्ण १ भाग, मिश्री १ भाग और लोहेका चूर्ण ५ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर सर्व- प्रकारके शूलरोगोंमें प्रयोग करे । इसको शर्करालोह कहते हैं ॥ ६४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३९५ ) शंखादि चूर्ण । शंखचूर्णस्य च पलं पञ्चैव लवणानि च । क्षारं टंकणकं जाती शतपुष्पा यमानिका ॥ ६५ ॥ हिंगु त्रिकटुकञ्चैव सर्वमेकत्र चूर्णयेत् । आमवातं यकृच्छूलं परिणामसमुद्भवम् ॥ अन्नद्रवकृतं शूलं शूलञ्चैव त्रिदोषजम् ॥ ६६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे शूलरोगाधिकारः । शंखका चूर्ण १पल, पांचों लवण ५ भाग, सुहागा १ पल, आम- लोंका चूर्ण १ पल, सौंफका चूर्ण १ पल, अजवायनका चूर्ण १ पल, हींग १ पल और त्रिकुटेका चूर्ण ३ पल लेवे। इन सबको एकत्र पीस- कर सेवन करनेसे आमवात, यकृत्, परिणाम शूल, अन्नद्रवशूल और त्रिदोषजशूल रोग नष्ट होते हैं। इसे शंखादि चूर्ण कहते हैं॥६५॥६६॥ इति शूलाधिकार समाप्त । अथ उदावर्त्तानाहरोगधिकार । वैद्यनाथवटी । पथ्या त्रिकटु सूतञ्च द्विगुणं कनकं तथा । थानकुनीर सैरम्ललोलिकाया रसैः कृता ॥ १ ॥ गुटिकोदरगुल्मादिपाण्ड्वामयविनाशिनी । क्रिमिकुष्ठगात्रकण्डूपिडिकाश्च निहन्ति च ॥ वटी सिद्धफला चेयं वैद्यनाथेन भाषिता ॥ २ ॥ अब उदावर्त और आनाह रोगकी चिकित्सा कहते हैं । हरड़, त्रिकुटा, रससिन्दूर यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे २ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र गोरखमुण्डीके
( ३९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पत्तोंके रस और नोनियाके पत्तोंके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे उदर, गुल्म, पांडु, क्रिमि, कुष्ठ, गात्रकण्डू और पिड़िकारोग प्रभृति नष्ट होते हैं। इस वैद्यनाथवटीको स्वयं महादेवने कहा है ॥ १ ॥ २ ॥ बृहदिच्छाभेदी रस । शुद्धं पारदटंकणं समरिचं गन्धाश्मतुल्यं त्रिवृद्, विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । खल्वे दण्डयुगं विमर्द्य विधिना चार्कस्य पत्रे ततः, स्वेदं गोमयवह्निना च मृदुना स्वेच्छावशाद्भेदकः॥३॥ गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचये- द्यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च. दध्योदनम् । आमं सर्वभवं सुजीर्णमुदरं गुल्मं विशालं हरे- द्देहदीप्तिकरो बलासहरणः सर्वामयध्वंसनः ॥ ४ ॥ शुद्ध पारा, सुहागा, काली मिरच, गन्धक और निसोथकी जड़, यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सोंठ २ भाग लेवे और जमालगोटेका चूर्ण नव ९ भाग, इन सब औषधियोंको दो दण्ड ( एक दण्डके २४ मिनट ) पर्यन्त मर्दन करके आकके पत्तोंमें लपेट मूषामें रखकर जंगली उपलोंकी अग्निसे धीरे २ पकावे । जब अपने आप शीतल होजाय तब एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण कर ले । इसमेंसे एक रत्ती परिमाण औषधि लेकर शीतल जलके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेपर जबतक गरम जल नहीं पीवे तबतक बराबर दस्त होते रहते हैं । इस औषधिको भक्षण करके ऊपरसे दहीके साथ भात खावे । इस औषधिके सेवन करनेसे आमदोष, त्रिदोषज उदररोग और गुल्मरोग नष्ट होते हैं। यह अत्यंत अग्निप्रदीपक, कफनाशक और सर्व रोगोंका हरनेवाला है । इसको बृहत्- इच्छाभेदी रस कहते हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥
भाषाटीकासहित । ( ३९७ ) योगवाहिरसान्सर्व्वान् रेचके कथितानपि । प्लीहाधिकारे कथितं रसेन्द्रं वारिशोषणम् । उदावर्त्ते तथानाहे प्रयुञ्जीतानुपानतः ॥ ५ ॥ रेचनकारक योगवाही संपूर्ण रसोंको तथा प्लीहारोगोक्त वारि- शोषण रसको यथायोग्य अनुपानाेंके साथ उदावर्त्त और आनाह रोगमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ पुटितं भावितं लौहं त्रिवृत्क्वाथैरनेकंशः । उदावर्त्तहरं युंज्यात्ससितं वा यथाबलम् ॥ उदावर्त्ते प्रयोक्तव्या उदरोक्ता रसाः खलु ॥ ६ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे उदावर्त्तानाहाधिकारः । निसोथके रसकी भावना देकर भस्म किये हुए लोहेको निसोथकी जड़के क्वाथमें सात वार भावना देकर मिश्रीके साथ उदावर्त्तरोगमें यथोचित मात्रानुसार सेवन करे । उदावर्त्त रोगमें समस्त उदररोगाधिकारोक्त औषधि प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ इति उदावर्त्तानाहरोगचिकित्सा । अथ गुल्मरोगचिकित्सा । महानाराच रस । ताम्रं सूतं समं गन्धं जैपालञ्च फलत्रिकम् । कटुकं पेषयेत्क्षारैर्निष्कं गुल्महरं पिबेत् ॥ उष्णोदकं पिबेच्चानु नाराचोऽयं महारसः ॥ १ ॥ तांबेकी भस्म, पारा, गन्धक, जमालमोटा, त्रिफला, कुटकी और क्षारत्रय यह सब औषधि समान भाग लेकर पीसकर तीन तीन मासेकी गोली बना लेवे । एक गोली एक वार खाय तो गुल्मरोग अवश्य नष्ट होजाता है । इसके सेवन करनेके अंतमें गरमजल पान करे । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १ ॥ ॰१४
( ३९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पञ्चानन रस । पारदं शिखितुत्थञ्च गन्धं जैपालपिप्पली । आरग्वधफलान्मज्जा वज्रीक्षीरेण पेषयेत् ॥ २ ॥ धात्रीरसयुतं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । चिञ्चाफलरसञ्चानु पथ्यं दध्योदनं हितम् ॥ ३ ॥ पारा, तूतिया, गन्धक, जमालगोटे, पीपल और अमलतासका गूदा इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके उपरोक्त मात्रानुसार आमलोंक रसके साथ सेवन करनेसे अंतमें इमलीके रसको पीवे । तथा दहीके साथ भात खावे । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥ गुल्मवज्रिणी रस । रसगन्धकताम्रञ्च कांस्यं टङ्कणतालकम् । प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं मर्दयेदतियत्नतः ॥ ४ ॥ तद्यथाग्निबलं खादेद्रक्तगुल्मप्रशान्तये । निर्मिता नित्यनाथेन वटिका गुल्मवज्रिणी ॥ ५ ॥ गुल्मप्लीहोदराष्ठीलायकृदानाहनाशिनी । कामलापाण्डुरोगघ्नी ज्वरशूलविनाशिनी ॥ ६ ॥ पारा, तांवाभस्म, कांसाभस्म, सुहागा, हरितालभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके अग्निके बलानुसार मात्रा सेवन करनेसे रक्तगुल्मरोग नष्ट होता है । इस औषधिके सेवन करनेसे गुल्म, प्लीहा, उदर, अष्ठीला, यकृत, आनाह, कामला, पांडु, ज्वर और शूलरोग नष्ट होते हैं । श्रीमन्नित्यनाथ सिद्धने इस गुल्मवज्रिणी वटिकाको कहा है ॥ ४-६॥
भाषाटीकासहित । ( ३९९ ) गुल्मलानल रस । सूतकं लौहकं ताम्रं तालकं गन्धकं समम् । तोलद्वयमितं भागं यवक्षारञ्च तत्समम् ॥ ७ ॥ मुस्तकं मरिचं शुण्ठी पिप्पली गजपिप्पली । हरीतकी वचा कुष्ठं तोलैकं चूर्णयेद् बुधः ॥ ८ ॥ सर्वमेकीकृतं पात्रे क्रियन्ते भावनास्ततः । पर्पटं मुस्तकं शुंठ्यपामार्गं पापचेलिकम् ॥ ९ ॥ तत्पुनश्चूर्णयेत्पश्चात्सर्वगुल्मनिवारणम् । गुञ्जाचतुष्टयं खादेद्धरीतक्यनुपानतः ॥ १० ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं तथा चैव त्रिदोषजम् । द्वन्द्वजं श्लैष्मिकं हन्ति वातगुल्मं विशेषतः ॥ गुल्मकालानलो नाम सर्वगुल्मकुलान्तकृत् ॥ ११ ॥ पारा, लोहभस्म, तांबाभस्म, हरितालभस्म और गन्धक यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले और जौखार १० तोले लेवे । तथा नागर- मोथा, कालीमिरच, सोंठ, पीपल, गजपीपल, हरड़, वच और कूठ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर पित्तपापड़ा, नागरमोथा, सोंठ, चिरचिटा और पाठा इन प्रत्येकके रसकी सात सात भावना देकर चूर्ण कर लेवे । हरड़के चूर्णके साथ अथवा हरड़के काथके साथ चार रत्ती परिमाण औष- धिके सेवन करनेसे वातज, पित्तज, त्रिदोषज, द्विदोषज और कफज प्रभृति सर्वगुल्म रोग नष्ट होते हैं । इसको गुल्मकालानल रस कहते हैं ॥ ७-११ ॥ वडवानल रस । पारदं गन्धकं ताप्यं यवक्षारार्कमभ्रकम् । अग्न्यम्बुनाहिपत्रेण समर्द्याथ द्विगुञ्जकम् ॥ १२ ॥
( ४०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भक्षयेत्पर्णखण्डेन हिंगुसिन्धुसुवर्चलैः । दाडिमञ्च तथा बिल्वं कार्षिकं भृङ्गजैर्द्रवैः ॥ १३ ॥ पिष्ट्वा तु सुरया युक्तं देयं स्यादनुपानकम् । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु शूलञ्च परिणामजम् ॥ १४ ॥ पारा, गन्धक, सोनामाखीभस्म, जवाखार, तांबाभस्म और अभ्रक- भस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर चीतेकी जड़के क्वाथ और आकके पत्तोंके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे; इसको पानमें रखकर खावे । इस औषधिके सेवन करनेके अन्तमें हींग, सेंधानमक, कालानमक, अनार और बेलगिरी इन सबको एक एक कर्ष परिमाण लेकर भांगरेके रसमें खरल करके मदिराके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके गुल्म और परिणामशूल नष्ट होते हैं । इसको वडवानल रस कहते हैं ॥ १३-१४ ॥ महानाराच रस । सूतटङ्कणतुल्यांशं मरिचं सूततुल्यकम् । गन्धकं पिप्पली शुण्ठी द्वौ द्वौ भागौ विमिश्रयेत् १५ सर्वतुल्यं क्षिपेद्दन्तीबीजं निस्तुषमेव च । द्विगुञ्जं रेचनं सिद्धं नाराचाख्यो महारसः ॥ १६ ॥ पारा, सुहागा और कालीमिरच यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग; गंधक, पीपल और सोंठ यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग और दंतीके बीज ( जमालगोटे ) नव ९ भाग इन सब औषधियोंको एकत्र पीस- कर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे विरेचन होजाता है । इसको महानाराच रस कहते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ विद्याधर रस । पारदं गन्धकं तालं ताप्यं स्वर्णं मनःशिलाम् । कृष्णाक्वाथैः स्नुहीक्षीरैर्दिनैकं मर्दयेत्सुधीः ॥१७॥
भाषाटीकासहित । ( ४०१ ) निष्कार्द्धं श्लैष्मिकं गुल्मं हन्ति मूत्रानुपानतः । रसो विद्याधरो नाम गोदुग्धञ्च पिबेदनु ॥१७८॥ पारा, गंधक, हरितालभस्म, सोनामाखीभस्म, सोनाभस्म और मनशिल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर पीपलके काथ और थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करके दो दो मासेकी गोली बनाकर गोमूत्रके साथ सेवन करे और ऊपरसे गायका दूध पीवे तो कफजन्य गुल्म रोग नष्ट होता है । इसे विद्याधररस कहते हैं॥१७॥१८॥ महागुल्मकालानल रस । गन्धकं तालकं ताम्रं तथैव तीक्ष्णलोहकम् । समांशं मर्दयेद् गाढं कन्यानीरेण यत्नतः ॥ १९ ॥ संपुटं कारयेत्पश्चात्सन्धिलेपञ्च कारयेत् । ततो गजपुटं दत्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ २० ॥ द्विगुञ्जं भक्षयेद् गुल्मी शृंगवेरानुपानतः । सर्वगुल्मं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥२१॥ गंधक, हरितालभस्म, तांबाभस्म, तीक्ष्णलोहभस्म यह सब औषधि समान भाग लेकर घीकारके रसमें अच्छे प्रकारसे गोला बना लेवे । पश्चात् इस औषधिके पिंडको मूषामें रखकर उसके जोड़ोंको अच्छे प्रकारसे बंद करके गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर औषधिको चूर्ण करके दो रत्ती परिमाण लेकर अदरखके रसके साथ सेवन करे । जिस प्रकार सूर्योदयसे अंधकारका समूह नष्ट होता है उसी प्रकार इस औष- धिके सेवन करनेसे सर्व प्रकारका गुल्म नष्ट होता है । इसको महा- गुल्मकालानल रस कहते हैं ॥ १९-२१.॥ अभया वटी । अभया मरिचं कृष्णा टंकणञ्च समांशकम् । सर्वचूर्णसमञ्चैव दद्यात्कानकजं फलम् ॥ २२ ॥
( ४०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । स्नुहीक्षीरैर्वटी कार्या यथा स्विन्नकलायवत् । वटीद्वयं शिवामेकां पिष्ट्वा चोष्णाम्बुना पिबेत् २३॥ उष्णाद्विरेचयेदेषा शीते स्वास्थ्यमुपैति च । जीर्णज्वरं पाण्डुरोगं प्लीहाष्ठीलोदराणि च ॥ रक्तपित्ताम्लपित्तादिसर्वाजीर्णं विनाशयेत् ॥ २४ ॥ हरड़, कालीमिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और जमालगोटे ४ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर थूहरके दूधमें खरल करके सीजे हुए मटरके दानेकी बराबर गोली बना लेवे । इन गोलियोंमेंसे दो गोली और एक हरड़को एकत्र पीसकर गरम जलके साथ सेवन करे । इस औषधिका सेवन करके उष्ण क्रिया आचरण करे तो दस्त बराबर होते रहते हैं और शीतल क्रिया व्यवहार करनेसे दस्त बंद होजाते हैं । इस औष- धिके सेवन करनेसे जीर्णज्वर, पांडुरोग, प्लीहा, अष्ठीला, उदररोग, रक्तपित्त, अम्लपित्त और सर्व प्रकारके अजीर्णरोग नष्ट होते हैं । इसको अभयावटी कहते हैं ॥ २३-२४ ॥ गोपीजल । जैपालाष्टौ द्विको गन्धं शुण्ठी मरिचचित्रकम् । एकः सूतः ससौभाग्यो गोपीजल इति स्मृतः २५॥ शूलव्याध्याश्रयान्गुल्मान्कोष्ठादौ दश पैत्तिकान् । भगन्दरादिहृद्रोगान्नाशयेदेव भक्षणात् ॥ २६ ॥ जमालगोटे ८ भाग, गंधक २ भाग, सोंठ, मिरच, चित्रककी जड़, पारा और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन करनेसे शूलाश्रित गुल्म, भगन्दर और हृदयरोग नष्ट होते हैं । इसको गोपीजल कहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥
भाषाटीकासहित । ( ४०३ ) काङ्कायन गुटिका । शटीं पुष्करमूलञ्च दन्तीं चित्रकमाढकीम् । शृङ्गवेरं वचाञ्चैव पलिकानि समाहरेत् ॥ २७ ॥ त्रिवृतायाः पलञ्चैकं कुर्यात्त्रीणि च हिंगुनः । यवक्षारात्पले द्वे च द्वे पले चाम्लवेतसात् ॥ २८ ॥ यमान्यजाजीमरिचधान्यकञ्च त्रिकार्षिकम् । उपकुंच्याजमोदाभ्यां पृथगर्द्धपलं भवेत् ॥ २९ ॥ मातुलुङ्गरसेनैव गुटिकां कारयेद्भिषक् । तासामेकां पिबेद्द्वे वा तिस्रो वाथ सुखाम्बुना॥३०॥ अम्लैर्मद्यैश्च यूषैश्च घृतेन पयसाथवा । एषा कांकायनेनोक्ता गुटिका गुल्मनाशिनी ॥ ३१ ॥ अर्शोहृद्रोगशमनी क्रिमीणाञ्च विनाशिनी । गोमूत्रयुक्ता शमयेत्कफगुल्मं चिरोत्थितम् ॥ ३२ ॥ क्षीरेण पित्तरोगञ्च मद्यैरम्लैश्च वातिकम् । त्रिफलारसमूत्रैश्च नियच्छेत्सान्निपातिकम् ॥ रक्तगुल्मेषु नारीणामुष्ट्रीक्षीरेण पाययेत् ॥ ३३ ॥ कचूर, कूठ, दंतीकी जड़, चीतेकी जड़, अरहर, सोंठ, वच और निसोधकी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक पल लेवे, हींग ३ पल, जवारखार २ पल, अमलवेत २ पल, अजमोद, जीरा, कालीमिरच और धनिया यह प्रत्येक औषधि तीन तीन कर्ष परिणाम लेवे, काला- जीरा और अजवायन यह प्रत्येक औषधि दो दो तोले इन सब औष- धियोंको एकत्र करके बिजौरे नींबूके रसमें खरल करके गोली बना लेवे । इसमेंसे एक या दो अथवा तीन गोली किंचित् गरम जल, कांजी, मदिरा, यूष, घृत अथवा दूधके साथ सेवन करे तो गुल्म,
( ४०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बवासीर, हृदयरोग और क्रिमिरोग नष्ट होते हैं । गोमूत्रके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे बहुत दिनोंका कफजनित गुल्म रोग नष्ट होता है। दूधके साथ सेवन करनेसे पित्तरोग, मद्य और अम्लके साथ सेवन करनेसे वातरोग, त्रिफलेके रस और गोमूत्रके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषज रोग शांत होता है । स्त्रियोंके गुल्मरोगमें इसको ऊंटनीके दूधके साथ सेवन करावे । इसको कांकायन मुनिने कहा है ॥२७-३३॥ गुल्मशार्दूल रस । रसं गन्धं शुद्धलौहं गुग्गुलोः पिप्पलं पलम् । त्रिवृता पिप्पली शुण्ठी शटी धान्यकजीरकम्॥३४ प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं पलार्द्धं कानकं फलम् । संचूर्ण्य वटिका कार्या घृतेन वल्लमानतः ॥ ३५ ॥ वटीद्वयं भक्षयेच्चार्द्रकोष्णाम्बु पिबेदनु । हन्ति प्लीहयकृद्गुल्मकामलोदरशोथकम् ॥ ३६ ॥ वातिकं पैत्तिकं गुल्मं श्लैष्मिकं रौधिरं तथा । गहनानन्दनाथोक्तरसोऽयं गुल्मशार्दुलः ॥ ३७ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, गूगल, सुगन्धवाला, निसोथकी जड़, पीपल, सोंठ, कचूर, धनियां और जीरा यह प्रत्येक औषधि एक एक पल, जमाल गोटे २ तोले लेवे इन सब औषधियोंको एकत्र करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । घीके साथ इसकी दो गोली खाकर ऊपरसे अदरखका रस और गरम जल पीवे । इसके सेवन करनेसे प्लीहा, यकृत, गुल्म, कामला, उदरशोथ और वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और रक्तज गुल्मरोग नष्ट होते हैं । इस गुल्मशार्दूल रसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३४-३७ ॥ प्राणवल्लभ रस । लौहं ताम्रं वराटञ्च तुत्थं हिंगु फलत्रिकम् । स्नुहीमूलं यवक्षारं जैपालं टङ्कणं त्रिवृत् ॥ ३८ ॥ !
भाषाटीकासहित । (४०५) प्रत्येकं पलिकं ग्राह्यं छागीदुग्धेन पेषयेत् । चतुर्गुञ्जां वटीं खादेद्वारिणा मधुनापि वा ॥ ३९ ॥ प्राणवल्लभनामायं गहनानन्दभाषितः । निहन्ति कामलां पाण्डुं मेहं हिक्कां विशेषतः॥४०॥ असाध्यं सन्निपातञ्च गुल्मं रुधिरसम्भवम् । वातरक्तञ्च कुष्ठञ्च कण्डूविस्फोटकापचीम् ॥ ४१ ॥ लोहाभस्म, तांवाभस्म, कौड़ीकी भस्म, तूतिया, हींग, त्रिफला, थूहरकी मूल, जवाखार, जमालगोटे, सुहागा और निसोध यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेकर बकरीके दूधमें पीसकर चार चार रत्तीकी गोली बना लेवे । इस औषधिको सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे कामला, पांडु, प्रमेह, हिक्का, असाध्य सन्निपात, रक्तज गुल्म, वातरक्त, कुष्ठ, कण्डू, विस्फोट क और अपची रोग नष्ट होते हैं । इस प्राणवल्लभ रसको गहनानन्दनाथने कहा है ॥ ३८-४१ ॥ सर्वेश्वर रस । ताम्रं दशगुणं स्वर्णात्स्वर्णपादं कटुत्रिकम् । त्रिकटु त्रिफला तुल्या त्रिफलार्द्धमयोरजः ॥ ४२ ॥ अयसोऽर्द्धं विषञ्चैव सर्वं संमर्द्य यत्नतः । सर्वेश्वररसो नाम रौधिरगुल्मनाशनः ॥ ४३ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे गुल्मरोगचिकित्सा । तांबाभस्म १० भाग, सोनाभस्म १ भाग, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड़, बहेड़ा और आमले यह प्रत्येक औषधि सोनेसे चौथाई भाग, लोहेका चूर्ण त्रिफलेसे आधा भाग और लोहेसे आधा भाग विष लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके सेवन करनेसे रक्तजगुल्म रोग नष्ट होता है । इसको सर्वेश्वर रस कहते हैं ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ इति गुल्मरोगचिकित्सा ।
( ४०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ हृद्रोगाधिकार । हृदयार्णव रस । शुद्धसूतं समं गन्धं मृतताम्रं तयोः समम् । मर्दयेत्त्रिफलाक्वाथैः काकमाचीद्रवैर्दिनम् ॥ १ ॥ चणमात्रां वटीं खादेद्रसोऽयं हृदयार्णवः । काकमाचीफलं कर्षं त्रिफलाफलसंयुतम् ॥ २ ॥ द्वात्रिंशत्तोलकं तोयं क्वाथमष्टावशेषितम् । अनुपानं पिबेच्चात्र हृद्रोगे च कफोत्थिते ॥ ३ ॥ पारा १ भाग, गंधक १ भाग, तांबाभस्म २ भाग इन सब औषधि- योंको एकत्र करके त्रिफलेके क्वाथमें और मकोयके रसमें एक दिन- तक खरल करे। पश्चात् चनेकी बराबर गोली बना लेवे। इस औष- धिके सेवन करनेके पश्चात् एक तोला मकोय और १ तोले त्रिफ- लेको बत्तीस तोले जलमें पकावे; जब पकते पकते जल आठवां भाग बाकी रह जाय तब उतारकर छानके पान करे । इस औषधिके सेवन करनेसे कफजन्य हृदयरोग दूर होता है । इसको हृदयार्णव रस कहते हैं ॥ १-३ ॥ नागार्जुनाभ्रक । सहस्रपुटनैः शुद्धं वज्राभ्रमर्जुनत्वचः । सत्त्वैर्विमर्दितः सप्तदिनं खल्ले विशोषितम् ॥ ४ ॥ छायाशुष्का वटी कार्या नाम्नेदमर्जुनाह्वयम् । हद्रोगं सर्वशूलार्शोहल्लासच्छर्द्यरोचकान् ॥ ५ ॥ अतीसारमग्निमान्द्यं रक्तपित्तं क्षतक्षयम् । शोथोदराम्लपित्तञ्च विषमज्वरमेव च ॥ हन्त्यन्यान्यपि रोगाणि बल्यं वृष्यं रसायनम् ॥६॥
सहस्र पुटसे शुरू किया हुआ वज्राभ्रक लेकर अर्जुनकी छालके क्वाथमें सात भावना देकर गोली बनाकर छायामें सुखा लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे हृदयरोग, सर्व प्रकारका शूल, बवासीर, हल्लास, वमन, अरुचि, अतिसार, मंदाग्नि, रक्तपित्त, क्षतक्षय, शोथ, उदररोग,अम्लपित्त और विषमज्वर नष्ट होते हैं। इसके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके रोग नष्ट होकर बल, वीर्य और रसकी वृद्धि होती है । इसको नागार्जुनाभ्रक कहते हैं ॥ ४-६ ॥ पञ्चानन रस । सूतगन्धौ द्रवैर्धात्र्या मर्दयेद् गोस्तनीद्रवैः । यष्टिखर्जूरसलिलैर्दिनं च परिमर्दयेत् ॥ धात्रीचूर्णं सिताञ्चानु पिबेद्ध्रद्रोगशान्तये ॥ ७ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे हृद्रोगाधिकार । पारे और गंधक दोनोंकी एकत्र कज्जली बनाकर आमलोंके रस, दाख, मुलैठीके रस और खजूरके क्वाथमें पृथक् पृथक् खरल करके चूर्ण बनावे, इसको उचित मात्रासे आमलेके चूर्ण और मिसरीके साथ सेवन करे तो हृद्रोग दूर होता है । इसको पञ्चानन रस कहते हैं ॥ ७ ॥ इति हृद्रोगाधिकार संपूर्ण । अथ मूत्रकृच्छ्राधिकार । त्रिनेत्राख्य रस । वङ्गं सूतं गन्धकं भावयित्वा लौहे पात्रे मर्दयेदेक- घस्रम् । दूर्वायष्टीगोक्षुरैः शाल्मलीभिर्मूषामध्ये भूधरे पाचयित्वा ॥ १ ॥ तत्तद्भावैर्भावयित्वास्य वल्लं दद्याच्छीतं पायसं वक्ष्यमाणम् । दूर्वायष्टी- शाल्मलीतोयदुग्धैस्तुल्यैः कुर्यात्पायसं तद्ददीत ।
( ४०८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रातःकाले शीतपानीयपानान्मूत्रे जाते स्यात्सुखी च क्रमेण ॥ २ ॥ वंगभस्म, पारा और गंधक इन तीनों औषधियोंको समान भाग लेकर लोहेके पात्रमें दूर्वा, मुलैठी, गोखरू और सेमलकी जड़के रसमें अलग अलग खरल करके मूषामें रखकर भूधरयंत्रमें पकावे । पश्चात् उपरोक्त दूब आदिके रसमें सात सात भावना देकर दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे । पश्चात् दूब,मुलैठी और सेमलकी जड़का काथ और दूध यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर खीर बनाकर औषधि सेवन करनेके पश्चात् सेवन करे और प्रातःकाल शीतल जलको पीवे । इसके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे खुलकर साफ पेशाब होता है और रोगी अच्छे प्रकारसे चलने फिरनेको समर्थ होता है । इसको त्रिनेत्राख्य रस कहते हैं ॥ १ ॥ २ ॥ वरुणाद्य लौह । द्विपलं वरुणं धात्र्यास्तदर्द्धं धातृपुष्पकम् । हरीतक्याः पलार्द्धञ्च पृश्निपर्णी तदर्द्धकम् ॥ ३ ॥ कर्षमानञ्च लौहाभ्रं चूर्णमेकत्र कारयेत् । भक्षयेत्प्रातरुत्थाय शाणमानं विधानवित् ॥ ४ ॥ मूत्राघातं तथा घोरं मूत्रकृच्छ्रञ्च दारुणम् । अश्मरीं विनिहंत्याशु प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५ ॥ बलपुष्टिकरञ्चैव वृष्यमायुष्यमेव च । वरुणाद्यमिदं लौहं चरकेण विनिर्मितम् ॥ ६ ॥ बरनेकी छाल २ पल, आमले २ पल, धायके फूल १ पल, हरड़ २ तोले, पृश्निपर्णी, लोहाभस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक कर्ष परिमाण लेवे, इन सब औषधियोंको एकत्र खरल करके प्रतिदिन प्रातःकाल चार मासे परिमाण भक्षण करे । इस