भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । खादेदेरण्डशुण्ठीभ्यां माषमात्रं दिने दिने । कफवातामयं हन्ति चानुपानं वदाम्यहम् ॥ ४४ ॥ व्योषं सौवर्चलं हिङ्गु करञ्जबीजसंयुतम् । पिबेदुष्णाम्बुना चानु सर्वशूलनिकृन्तनम् ॥ ४५ ॥ शुद्ध पारा, तांबाभस्म, मैनशिल, सोनामाखीभस्म, हरिताल- भस्म, चांदीकी भस्म, सोनाभस्म, वंगभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, सोंठ, पांचों लवण और गंधक यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर सोंठके क्वाथ, जयंतीके पत्तोंका रस और भांगके पत्तोंका रस, भारंगीकी जड़का रस और धतूरेके पत्तोंका रस इनमें अलग अलग सात भावना देकर एक एक मासेकी गोली बना लेवे । अंडीके तेल और सोंठके चूर्णके साथ इस औषधिके सेवन करनेसे कफज और वातज व्याधि शमन होती हैं । इसके सेवन करनेके अन्तमें त्रिकुटा, काला नमक, हींग और करंजके बीज इनको बराबर भाग लेकर गरम जलके साथ सेवन करनेसे सर्व प्रकारका शूल नष्ट होता है । इस सर्वांगसुन्दर रसको स्वयं विष्णु भगवान्ने कहा है ॥ ४१-४५ ॥ शूलवज्रिणी वटिका । रसगन्धकलोहानां पलार्द्धेन समन्वितम् । त्रिफला रामठं शुल्वं शटी त्रिकटु टङ्कणम् ॥४६॥ पत्रं त्वगेलातालीशजातीफललवङ्गकम् । यमानी जीरकं धान्यं प्रत्येकं तोलकं शुभम् ॥ ४७॥ माषैका वटिका कार्या छागीदुग्धेन वा पुनः। एकैका भक्षिता चेयं वटिका शूलवज्रिणी ॥ ४८॥ शूलमष्टविधं हन्ति प्लीहगुल्मोदरं तथा । अम्लपित्तामवातञ्च पाण्डुत्वं कामलां तथा ॥४९ ॥