रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५०९ ) शिरोर्तिं नाशयत्याशु वज्रमुक्तमिवासुरम् । शिरोवज्ररसो नाम चन्द्रनाथेन भाषितः ॥ १० ॥ पारा १ पल, गंधक १ पल, लोहाभस्म १ पल, तांबाभस्म १ पल, गूगल ४ पल,त्रिफलेकी तीनों औषधियोंका मिला हुआ चूर्ण २ पल, मुलैठी, पीपल, सोंठ, गोखुरु, वायविडंग, बेलगिरी, सोनापाठा,कुंभेर- पाढल, अरणी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बडीकटेरी और गोखुरु यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर दशमूलके क्वाथमें सात भावना देवे । पश्चात् घृतमें मर्दन करके एक एक मासेकी गोली बना लेवे । इस औषधिको बकरीके दूध,सहत अथवा जलके साथ सेवन करनेसे वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातज शिरोरोग दूर होते हैं । इस शिरोवज्र रसको महादेवने कहा है ॥ ६-१० ॥ चन्द्रकान्त रस । मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं ताम्रं गन्धं समं समम् । स्नुहीक्षीरैर्दिनं मर्द्यं भक्षयेन्माषमात्रकम् ॥ ११ ॥ मधुना मर्दितं सेव्यं लौहपात्रे दिने दिने । सप्ताहात्सूर्यवर्त्तादीञ्छिरोरोगान्विनाशयेत् ॥ १२ ॥ रससिन्दूर, अभ्रकभस्म, तीक्ष्णलोहभस्म, तांबाभस्म और गन्धक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें खरल करके प्रतिदिन एक मासे औषधि लेकर लोहेके पात्रमें सहतके द्वारा पीसकर भक्षण करे । इसके सेवन करनेसे एक सप्ताहमें सूर्यावर्त्तादि शिरोरोग नष्ट होते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥ महालक्ष्मीविलास रस । लौहमभ्रं विषं मुस्तं फलत्रयकटुत्रयम् । धूर्त्तूरं वृद्धदारञ्च बीजमिन्द्राशनस्य च ॥ १३ ॥