भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह. अग्निमें पुट दे, ऐसे तीन पुट देनेसे निःसंदेह चांदीकी भस्म हो जाती है इसमें हरेक वार गंधक नीचे ऊपर संपुटमें डाल देना चाहिये॥७४॥७५॥ चांदीके गुण । शीतं कषायं मधुरमम्लं वातप्रकोपजित् । दीपनं बलकृत्स्निग्धं गुल्माजीर्णविनाशनम् । आयुष्यं दीर्घरोगघ्नं रजतं लेखनं स्मृतम् ॥ ७६ ॥ शुद्ध चांदी ( भस्म ) शीतल, कसैली, मधुर, अम्ल, वातप्रकोपको जीतनेवाली, दीपन, बलकारक, स्निग्ध, गुल्मनाशक, अजीर्णको दूर करनेवाली, आयुवर्धक, लेखन और दीर्घ रोगोंको दूर करनेवाली है॥७६॥ इति रौप्य मारण । अशुद्ध तांबेके दोष । न विषं विषमित्याहुस्ताम्रञ्च विषमुच्यते । एकदोषो विषे त्वष्टौ दोषास्ताम्रे प्रकीर्तिताः ॥ ७७॥ भ्रमो मूर्च्छा विदाहश्च उत्क्लेदः शोषवान्तयः । अरुचिश्चित्तसन्तापः एते दोषा विषोपमाः ॥ तस्माद्विशुद्धं ताम्रं हि ग्राह्यं रोगोपशान्तये ॥७८॥ विष इतना अवगुण नहीं करता किंतु तांबा विषसे भी अधिक हानिकारक है । क्योंकि विषमें केवल एक ही दोष है; ताम्रमें आठ दोष कहे हैं । अशुद्ध तांबेमें यह आठ दोष होते हैं जैसे-भ्रम, मूर्च्छा, विदाह, उत्क्लेद, शोष, वांति, अरुचि और चित्तको संतापित करना । इसलिये तांबेको शुद्ध करके ही रोगशांतिके लिये ग्रहण करना चाहिये ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ ताम्रके शोधनकी विधि । पटुना रविदुग्धेन ताम्रपत्राणि लेपयेत् । अग्नौ सन्ताप्य निर्गुण्डीरसे सिञ्चेत्पुनः पुनः॥७९॥