रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ७१ ) लवणको आकके दूधमें रगड़कर तांबेके पत्रोंपर लेप करे, फिर इन पत्रोंको अग्निमें तपाकर संभालूके रसमें बार बार बुझाता रहे ( ऐसे २१ बार बुझानेसे तांबा शुद्ध होजाता है ) ॥ ७९ ॥ गोमूत्रेण पचेद्यामं ताम्रपत्रं दृढाग्निना । शुद्धयते नात्र सन्देहो मारणञ्चात्र कथ्यते ॥ २८०॥ अन्य प्रकार-तांबेके पत्रोंको गोमूत्रमें डालकर तीक्ष्णाग्निसे एक प्रहर पकावे तो तांबा अवश्य शुद्ध होजाता है । अब आगे मारणकी विधिको कहते हैं ॥ २८० ॥ तांबाके मारणकी विधि । सूतमेकं द्विधा गन्धं यामं मर्द्यं तु कन्यया । द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं लिप्त्वा स्थाल्यां निधापयेत् । सम्यक्शूरणजैः सार्द्धं पार्श्वे भस्म निधापयेत् । चतुर्यामं पचेच्चुल्यां पात्रपृष्ठे सगोमये । जलं पुनः पुनर्दयं स्वाङ्गशीतं विमर्दयेत् । म्रियते नात्र सन्देहः सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ८३ ॥ शुद्ध पारा दो तोले, शुद्ध गंधक चार तोले और शुद्ध तांबेके पत्र छः तोले लेवे । प्रथम पारे और गंधकको एक प्रहर रगड़कर घीकुमा- रका रस मिला फिर रगड़े तदनंतर इसको ताम्रपत्रोंपर लेप करे । इनको एक हांडीमें रख ( ऊपर एक छोटीसी शरावीसे ढक दे फिर इस शरावीके ऊपर ) जिमीकंदकी भस्म हांडीमें भर दे ऊपरसे शराव देकर गोबरसे संधी लेप करे और शरावके ऊपरले भागपर दो अंगुल मोटा गोबर चढ़ा दे, फिर इस हांडीको चूल्हेपर चढ़ा चार प्रहरकी तीक्ष्ण अग्नि देवे, हांडीके मुखपर गोबरपर पानीका पोचा देता रहे जिससे गोबर सूखकर तिड़ न जावे, चार प्रहरके बाद अग्नि बुझा दे, स्वांग- शीतल होनेपर युक्तिसे निकाल ले ताम्रपत्रोंकी भस्म हो जायेगी । इसे पीसकर सब रोगोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥