भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ७० ) रसेन्द्रसारसंग्रह. अग्निमें पुट दे, ऐसे तीन पुट देनेसे निःसंदेह चांदीकी भस्म हो जाती है इसमें हरेक वार गंधक नीचे ऊपर संपुटमें डाल देना चाहिये॥७४॥७५॥ चांदीके गुण । शीतं कषायं मधुरमम्लं वातप्रकोपजित् । दीपनं बलकृत्स्निग्धं गुल्माजीर्णविनाशनम् । आयुष्यं दीर्घरोगघ्नं रजतं लेखनं स्मृतम् ॥ ७६ ॥ शुद्ध चांदी ( भस्म ) शीतल, कसैली, मधुर, अम्ल, वातप्रकोपको जीतनेवाली, दीपन, बलकारक, स्निग्ध, गुल्मनाशक, अजीर्णको दूर करनेवाली, आयुवर्धक, लेखन और दीर्घ रोगोंको दूर करनेवाली है॥७६॥ इति रौप्य मारण । अशुद्ध तांबेके दोष । न विषं विषमित्याहुस्ताम्रञ्च विषमुच्यते । एकदोषो विषे त्वष्टौ दोषास्ताम्रे प्रकीर्तिताः ॥ ७७॥ भ्रमो मूर्च्छा विदाहश्च उत्क्लेदः शोषवान्तयः । अरुचिश्चित्तसन्तापः एते दोषा विषोपमाः ॥ तस्माद्विशुद्धं ताम्रं हि ग्राह्यं रोगोपशान्तये ॥७८॥ विष इतना अवगुण नहीं करता किंतु तांबा विषसे भी अधिक हानिकारक है । क्योंकि विषमें केवल एक ही दोष है; ताम्रमें आठ दोष कहे हैं । अशुद्ध तांबेमें यह आठ दोष होते हैं जैसे-भ्रम, मूर्च्छा, विदाह, उत्क्लेद, शोष, वांति, अरुचि और चित्तको संतापित करना । इसलिये तांबेको शुद्ध करके ही रोगशांतिके लिये ग्रहण करना चाहिये ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ ताम्रके शोधनकी विधि । पटुना रविदुग्धेन ताम्रपत्राणि लेपयेत् । अग्नौ सन्ताप्य निर्गुण्डीरसे सिञ्चेत्पुनः पुनः॥७९॥

भाषाटीकासहित । ( ७१ ) लवणको आकके दूधमें रगड़कर तांबेके पत्रोंपर लेप करे, फिर इन पत्रोंको अग्निमें तपाकर संभालूके रसमें बार बार बुझाता रहे ( ऐसे २१ बार बुझानेसे तांबा शुद्ध होजाता है ) ॥ ७९ ॥ गोमूत्रेण पचेद्यामं ताम्रपत्रं दृढाग्निना । शुद्धयते नात्र सन्देहो मारणञ्चात्र कथ्यते ॥ २८०॥ अन्य प्रकार-तांबेके पत्रोंको गोमूत्रमें डालकर तीक्ष्णाग्निसे एक प्रहर पकावे तो तांबा अवश्य शुद्ध होजाता है । अब आगे मारणकी विधिको कहते हैं ॥ २८० ॥ तांबाके मारणकी विधि । सूतमेकं द्विधा गन्धं यामं मर्द्यं तु कन्यया । द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं लिप्त्वा स्थाल्यां निधापयेत् । सम्यक्शूरणजैः सार्द्धं पार्श्वे भस्म निधापयेत् । चतुर्यामं पचेच्चुल्यां पात्रपृष्ठे सगोमये । जलं पुनः पुनर्दयं स्वाङ्गशीतं विमर्दयेत् । म्रियते नात्र सन्देहः सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ८३ ॥ शुद्ध पारा दो तोले, शुद्ध गंधक चार तोले और शुद्ध तांबेके पत्र छः तोले लेवे । प्रथम पारे और गंधकको एक प्रहर रगड़कर घीकुमा- रका रस मिला फिर रगड़े तदनंतर इसको ताम्रपत्रोंपर लेप करे । इनको एक हांडीमें रख ( ऊपर एक छोटीसी शरावीसे ढक दे फिर इस शरावीके ऊपर ) जिमीकंदकी भस्म हांडीमें भर दे ऊपरसे शराव देकर गोबरसे संधी लेप करे और शरावके ऊपरले भागपर दो अंगुल मोटा गोबर चढ़ा दे, फिर इस हांडीको चूल्हेपर चढ़ा चार प्रहरकी तीक्ष्ण अग्नि देवे, हांडीके मुखपर गोबरपर पानीका पोचा देता रहे जिससे गोबर सूखकर तिड़ न जावे, चार प्रहरके बाद अग्नि बुझा दे, स्वांग- शीतल होनेपर युक्तिसे निकाल ले ताम्रपत्रोंकी भस्म हो जायेगी । इसे पीसकर सब रोगोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ ८१-८३ ॥

( ७२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जम्ब्वम्भसा सैन्धवसंयुतेन सगन्धकं स्थापय शुल्वपत्रम् । पक्वायमानं पुटयेत्सुयुक्त्या वातादिकं यावदुपैति शांतिम् ॥ ८४ ॥ दूसरी विधि—सेंधानमक ४ तोले गंधक ४ तोले इन दोनोंको जामु- नके रसमें खरल कर तांबेके बारीक पत्रोंपर लेप करे, इन पत्रोंको एक चौड़े मुखकी हांडीमें रख इन पत्रोंको पतलीसी शरावीसे ढककर सन्धी लेप करे । फिर इस हांडीको बालूरेतसे भर चूल्हे पर चढ़ा बारह घंटेकी तीक्ष्ण अग्नि जलावे फिर स्वांगशीतल होनेपर युक्ति- पूर्वक निकालकर पंचगव्य ( घृत, दूध, दही, गोमूत्र, गोबरका रस ) में रगड़कर शरावसंपुटमें रख तीन पुटें दे तो वमनादि दुर्गुण रहित उत्तम भस्म होजायेगी ॥ ८४ ॥ शुद्धं ताम्रदलं विमर्द्य पटुना क्षारेण जम्बीरजै- नीरैर्घस्रमिदं स्नुगर्कपयसा लिप्तं धमेत्सप्तधा । निर्गुण्ड्यंबुहिमं रसेन्द्रकलितं दुग्धाज्यगन्धेनतत् तुल्येनाथ मृतं भवेत्सपुटितं पञ्चामृतेन त्रिधा८५॥ वांतिभ्रांतिविवर्जितं क्षयरुजाकुष्ठानि पाण्ड्वामयं, शूलं मेहगुदांकुरानिलगदानुक्तानुपानैर्जयेत् । गुञ्जामात्रमिदं ततो द्विगुणितं तच्छुद्धकायेन चेत्, भुक्तं स्थौल्यजरापमृत्युशमनं पथ्याशिनावत्सरात्॥ तीसरी विधि—शुद्ध ताम्र पत्रोंमें सेंधानमक और सुहागा मिलाकर जम्बीरीके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर इन पत्रोंपर थोहरका दूध लेप कर अग्निमें तपा संभालूके रसमें बुझावे, ऐसे सात वार थोहरके दूधसे लेप करके बुझावे और सात वार आकका दूध लेप कर अग्निमें तपा संभालूके रसमें बुझावे । इस प्रकार बुझानेसे संभालूके

भाषाटीकासहित । ( ७३ ) रसमें तांबेके बारीक २ पत्र गेरूके चूर्ण समान वर्णवाले नीचे बैठ जायँगे, ठंडा होनेपर संभालूका रस ऊपरसे युक्तिपूर्वक नितार कर गेर दे, नीचेसे तांबेका चूरा लेकर उस चूरेके बराबर पारा गंधक मिला खरल करे इसमें दूध और घी डालकर पीठोसी बना ले फिर शराव- संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । स्वांगशीतल होनेपर निकालकर पञ्चामृत ( दूध, दही, शहद, घी, मिश्री ) में रगड तीन पुटें देवे तो वांति, भ्रांति आदि दोषरहित उत्तम भस्म हो जायगी । इस भस्मको एक रत्ती प्रमाण उचित अनुपानसे सेवन करावे तो क्षयरोग, सब प्रकारके कुष्ठ, पाण्डुरोग, शूल, प्रमेह, बवासीर और वातरोग यह सब रोग नष्ट होते हैं । यदि शुद्ध कायावाला मनुष्य दो रत्ती प्रमाण एक वर्ष पर्यंत नित्य सेवन करे और पथ्य भोजन करता रहे तो मेदरोग, बुढ़ापा और अकालमृत्यु भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ८५॥ ८६॥ तांबेके गुण । ताम्रमुष्णं गरहरं यकृत्प्लीहोदरापहम् । क्रिमिशूलामवातघ्नं ग्रहण्यार्शोऽम्लपित्तजित् ॥ ८७ ॥ शुद्ध ताम्रभस्म-उष्ण है, गरनाशक, यकृत्रोग, प्लीहरोग, उदररोग, क्रिमिरोग, शूल, आमवात, ग्रहणीरोग, अर्शरोग और अम्लपित्त इन सब रोगोंको दूर करती है ॥ ८७ ॥ इति ताम्र मारण । पित्तल और कांसीका मारण व शोधन । पित्तलञ्च तथा कांस्यं ताम्रवन्मारयेत्पृथक् । ताम्रवच्छोधनं तेषां ताम्रवद्गुणकारकम् ॥८८॥ पित्तल या कांसी इनमेंसे जिसकी भस्म करना हो उसको तांबेके समान शोधन और तांबेकी भस्मके समान ही इनकी भस्म हो सकती है, एवं तांबेके समान ही यह दोनों गुणकारी हैं ॥ ८८ ॥ इति पित्तल कांस्य मारण ।

( ७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नागा ( सिक्का ) वंग ( कली ) शोधन । नागवङ्गे च गलिते रविदुग्धेन सेचिते । त्रिवाराच्छुद्धिमायांतः सच्छिद्रे हण्डिकांतरे॥ ८९ ॥ एक हाण्डीमें आकका दूध डालकर उस हाण्डीके मुखपर छिद्रयुक्त शराव ढक दे, फिर नाग या वंग जो शोधन करना हो उसको पिघ- लाकर उस छिद्रवाले शरावमें डाले जिससे यह पिघला हुआ धातु छिद्रद्वारा हाण्डीमें गिरकर आकके दूधमें डूब जावे, इस प्रकार तीन बार पिघला २ कर बुझानेसे नाग और वंग शुद्ध हो जाते हैं ॥ ८९ ॥ वङ्गं चूर्णोदके स्विन्नं यामार्डेन विशुद्ध्यति॥२९०॥ अन्य प्रकार-वंग ( कली ) के बारीक बारीक पत्रोंको छोटे छोटे बना पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा चूनेके पानीमें चार घडी पकावे तो वंग शुद्ध हो जाती है ॥ २९० ॥ इति नाग-वंग-शोधन । नाग ( सिक्का ) मारण । भुजंगममगस्त्यं च पिष्ट्वा पत्रं प्रलेपयेत् । तत्र संविद्रुते नागे वासापामार्गसंभवम् ॥ ९१ ॥ क्षारं विमिश्रयेत्तत्र चतुर्थांशं गुरूक्तितः । प्रहरं पाचयेच्चुल्ल्यां वासादर्या च चालयेत् ॥९२॥ तत उद्धृत्य तच्चूर्णं वासानीरेण मर्दयेत् । एवं सप्तपुटैर्नागं सिन्दूरं जायते ध्रुवम् ॥ ९३ ॥ सीसे ( सिक्के ) के बारीक पत्रोंपर अगस्तिये वृक्षके फूलों ( और नागरवेलके पत्रों ) को रगड़कर लेप करे, फिर इन पत्रोंको मट्टीके तौले ( कटाहका पात्र ) में डाल चूलहे पर चढ़ा नीचे अग्निको जलावे, जब सीसा पिघल जाये तो वांसे और अपामार्गका क्षार सीसेके तोलसे चौथा भाग ले थोडा थोडा बुरकाता जाये और वांसा ( अडूसे ) की

भाषाटीकासहित । ( ७५ ) मोटी लकड़ीसे रगड़ता रहे, इस प्रकार एक प्रहर मर्दन करे तो यह भस्माकार होजायेगा । फिर इसको वांसेके पत्तोंके रसमें रगड़कर शराव- संपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार सात पुट देनेसे सिंदूरके समान वर्णवाली उत्तम नाग ( सीसा ) की भस्म होजायगी ॥ ९१-९३ ॥ त्रिभिः कुम्भपुटैर्नागो वासारसविमर्दितः । सशिलो भस्मतामेति तद्रजः सर्वमेहजित् ॥ ९४ ॥ दूसरी विधि-सिकेमें मनसिल मिलाकर वांसेका रस डाल खूब रगडे पीठीसी बन जानेपर शरावसंपुटमें रख गजपुटमें फूंके, इस प्रकार तीन पुट देनेसे उत्तम भस्म होजायगी । यह भस्म संपूर्ण प्रमेहोंको जीतती है ॥ ९४ ॥ नाग भस्मके गुण । दशनाबलं धत्ते वीर्यायुःकांतिवर्द्धनम् । मेहान् हंति हतं नागं सेव्यं वंगं च तद्गुणम् ॥९५॥ यह नागभस्म मनुष्योंके शरीरमें दश हाथीके समान बल देने- वाली है तथा वीर्य, आयु और कांतिको बढ़ाती है एवं संपूर्ण प्रमे- होंको नष्ट करती है। वंगभस्म भी विधिवत् सेवन की जाय तो इन्हीं गुणोंको करती है ॥ ९५ ॥ तारस्य रंजनो नागो वातपित्तकफापहः । ग्रहणीकुष्ठगुल्मार्शः शोषव्रणविषापहः ॥ ९६ ॥ शुद्ध सीसाभस्म चांदीको रञ्जन करती ( रंग देती ) है; वात, पित्त और कफको दूर करती है; एवं ग्रहणी, कुष्ठ, गुल्म, अर्श, शोष और विषके विकारको दूर करती है ॥ ९६ ॥ इति नागमारण विधि ॥ वंगभस्म विधि । वङ्गं सतालमर्कस्य पिष्ट्वा दुग्धेन संपुटैत् । शुष्काश्वत्थभवैर्वल्कैः सप्तधा भस्मतां नयेत् ॥९७॥

( ७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध वंग और शुद्ध हरितालको आकके दूधमें रगडे ( पहिले वंगको पिघला उसमें आधा भाग पारा डाल उतारकर खरलमें डाले फिर हरिताल मिला रगडे ) इसकी चौडीसी टिकिया बना इसको अश्वत्थ ( पीपलवृक्ष ) के सूखे छिलकोंके चूर्णमें रख कपडमट्टी कर पुटमें फूंक दे, इस प्रकार सात पुटें दे तो उत्तम वंगभस्म हो जायेगी। (कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि हरितालको आकके दूधमें रगडकर वंगके कंटकवेधी पत्रोंपर लेपकर पीपलके छिलकोंसे सात बार लपेट पुट देवे तो एक पुटमें ही भस्म हो जायगी । परंतु यह असंगत है, क्योंकि सूखे अश्वत्थ छिलकोंसे सप्तधा वेष्टित कैसे हो सकता है ? किंतु ऐसा आम लोग करते हैं कि वंगके छोटे २ पत्र कर अश्वत्थके छिलकोंके चूर्णपर चावलसे जमाकर ऊपरसे और अश्वत्थके छिलकोंका चूर्ण डाल नीचे' ऊपर उपले लगा आग लगा देते हैं तो शीतल होनेपर खीलोंके समान फूले हुए भस्मके टुकडे मिलेंगे । परंतु इससे उपरोक्त सात- पुटी भस्म गुणमें उत्तम होती है ) ॥ ९७ ॥ विशुद्धवंगपत्राणि द्रावयेद्धाण्डिकान्तरे । अपामार्गोद्भवं चूर्णं तत्तुल्यं तत्र मेलयेत् ॥ ९८ ॥ स्थूलाग्रया लोहदर्व्या शनैस्तदभिमर्दयेत् । यावद्भस्मत्वमाप्नोति तावन्मर्द्यन्तु पूर्ववत् ॥ ९९ ॥ ततस्त्वेकीकृतं चूर्णं कृत्वा चांगारवर्जितम् । नूतनेन शरावेण रोधयेच्च भिषग्वरः । पश्चात्तीव्राग्निना पक्वं वंगभस्म भवेद् ध्रुवम् ॥३००॥ दूसरी विधि-शुद्ध वंगको एक तौलेमें डाल चूल्हेपर चढ़ावे नीचे अग्नि जलावे जब पिघल जावे तो इसमें वंगके बराबर अपामार्गका चूर्ण बुर्की २ कर एक बडे मुखकी लोहेकी कडछीसे धीरे २ रगडता रहे जबतक वंगकी उस पात्रमें ही भस्म न होजाये तबतक थोडा थोडा अपामार्गका चूर्ण मिला रगडता ही रहे। जब भस्माकार बन जाय तो

भाषाटीकासहित । ( ७७ ) इसमेंसे अंगारी आदि निकाल इस भस्मको उसी तौलेमें एकत्र कर ऊपरसे औंधा शराव रख भस्मको ढक दे नीचे तीव्र अग्नि जलावे । अथवा इसको उतार शीतल होनेपर पानी डालकर अपामार्गकी भस्मको धोकर अलग कर दे और नीचेसे स्वच्छ वंगभस्म लेकर धूपमें सुखा इसमें आकका दूध मिला नवीन दो शरावोंमें बंद कर तीक्ष्णाग्निसे पकावे तो वंगकी भस्म हो जायगी ॥ ९८-३०० ॥ वङ्गं खर्परके कृत्वा चुल्ल्यां संस्थापयेत्सुधीः । द्रवीभूते पुनस्तस्मिंश्चूर्णान्येतानि दापयेत् ॥ १ ॥ प्रथमं रजनीचूर्णं द्वितीये च यमानिका । तृतीये जीरकञ्चैव ततश्चिञ्चात्वगुद्भवम् ॥ २ ॥ अश्वत्थवल्कलोत्थञ्च चूर्णं तत्र विनिःक्षिपेत् । एवं विधानतो वङ्गं म्रियते नात्र संशयः ॥ ३ ॥ तीसरी विधि-वंगको मृत्कपाल ( तौले ) में डाल चूल्हे पर चढावे जब वंग पिघल जावे तो इसमें नीचे लिखे द्रव्योंके चूर्णोंका प्रक्षेप करे। पहिले तो बराबरका हल्दीका चूर्ण डाले जब हल्दीका चूर्ण डाले कुछ देरके बाद इमली वृक्षके छिलकेका चूर्ण डाले तदनंतर पीपलवृक्षके छिलकेका चूर्ण डाले नीचे ( चार प्रहरकी ) तीक्ष्ण अग्नि दे तो वंग भस्म हो जायेगी ( कोई इस भस्मको स्वच्छ कर हरिताल और घीकुमारका गूदा मिला संपुटकर फिर गजपुटमें फूंकते हैं तो अति उत्तम होजाती है ) ॥ १-३ ॥ वंगभस्मके गुण । वङ्गं तिक्ताम्लकं रूक्षं किञ्चिद्वातप्रकोपनम् । मेदःश्लेष्मामयघ्नञ्च क्रिमिघ्नं मेहनाशनम् ॥ ४ ॥ वंगभस्म-तिक्त है, अम्ल है, रूक्ष है, किंचित् वातकारक है । एवं मेदरोगनाश, कफरोगनाश, क्रिमिघ्न और प्रमेहोंको जीतनेवाली है ॥४॥ ४

( ७८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । लोहशोधन विधि । तप्तानि सर्वलोहानि कदलीमूलवारिणि । सप्तधा त्वभिषिक्तानि शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम्॥५॥ लोहेके पत्र बनाकर तीक्ष्ण अग्निमें तपाकर लाल होनेपर केलाकंदके रसमें बुझावे, ऐसे तपा तपा कर सात वार बुझानेसे सब प्रकारके लोहे अनुपम ( जिसकी बराबर और शुद्धि नहीं ऐसे ) शुद्ध होजाते हैं॥५॥ त्रिफलाष्टगुणे तोये त्रिफला षोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ ६ ॥ कृत्वा च तप्तपत्राणि सप्तवारं निषेचयेत् । एवं प्रलीयते दोषो गिरिजे लोहसम्भवः ॥ ७ ॥ दूसरी विधि—सोलह सोलह पल त्रिफला लेकर उसमें आठ आठ गुना पानी डालकर पकावे, जब चौथा भाग शेष रहे तो उतारकर छान ले इस क्वाथमें पांच पल लोहपत्रोंको तपा तपा कर सात वार बुझावे तो खानसे उत्पन्न होनेका सब दोष दूर होकर लोहा शुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥ ७ ॥ लोहमारणविधि । भानुपाकात्तथा स्थालीपाकाच्च पुटपाकतः । निरुत्थो जायते लोहो यथोक्तफलदो भवेत् ॥ ८ ॥ आगे लिखे भानुपाक, स्थालीपाक और पुटपाक करनेसे लोहकी निरुत्थ भस्म होजाती है,यह भस्म उत्तम फलके देनेवाली होती है ॥८॥ भानुपाकविधि । लौहे दृषदि लोहञ्च मुद्गरेण हतं मुहुः । कृत्वा तु गलितं शुद्धं जलेन त्रैफलेन च ॥ ९ ॥ क्षालयेद्बहुशः पश्चात्कृत्वा द्रव्यान्तरं पृथक् । शोषितं भानुभिर्भानोर्भानुपाके प्रयोजयेत् ॥३१०॥

भाषाटीकासहित । ( ७९ ) त्रिफलेके क्वाथमें पूर्वोक्त विधानसे शुद्ध किये हुए कान्तलोहको लोहेके हमामदस्तमें कूटकर चूर्ण बनावे । ( त्रिफलेके क्वाथमें बार बार लाल करके बुझानेसे लोहा कूटकर चूर्ण बनाने योग्य होजाता है ) इस चूर्णको वस्त्रमें छान ले फिर त्रिफलेके क्वाथमें बार बार धोकर स्वच्छ कर सूर्यकी तीक्ष्ण धूपमें सुखा लेवे । ( तदनन्तर आगे लिखे लोहमारक गणकी औषधियोंके रसमें भिगोकर धूपमें सुखावे ) ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ क्षालने भानुपाके तु लोहतुल्यं फलत्रिकम् । जलं द्विगुणितं दत्त्वा चतुर्भागावशेषयेत् ॥ ११ ॥ एवमुक्तं फलक्वाथं जलं दत्त्वा पुनःपुनः । शोषयेत्सूर्यतेजोभिर्निरन्तरमहस्त्रयम् ॥ १२ ॥ अथवा तत्र तत्क्वाथे दत्त्वा दत्त्वा भिषग्वरः । सप्तसप्तविधैरेव सप्तवारान् विशोषयेत् ॥ १३ ॥ भानुपाकमें लोहेके बराबर त्रिफला लेकर उस त्रिफलेको दोगुणे जलमें पकावे, जब चौथा भाग जल रहे तो उतारकर छान ले । यह क्वाथ बार बार लोहचूर्णमें डालकर सूर्यकी तेज धूपमें निरन्तर तीन दिन- तक सुखावे । अथवा त्रिफला या आगे कहे “लोहमारक गणकी” औषधियोंका पृथक् पृथक् सात सात वार सातवां सातवां भाग क्वाथ या स्वरस डालकर सुखाता रहे और त्रिफलेके जलसे धोता रहे, इस- प्रकार तेज धूपमें सुखानेकों 'भानुपाक' कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ स्थालीपाकविधि । इत्थमादित्यपाकान्ते स्थाल्यां पाकमुपाचरेत् । स्थालीपाके फलं ग्राह्यमयसस्त्रिगुणीकृतम् ॥ १४ ॥ तस्य षोडशिकं तोयमष्टभागावशेषितम् । मृदुमध्यकठोराणामन्येषामयसा समम् ॥ १५ ॥

( ८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्वथनीयं समादाय चतुरष्टौ च षोडशम् । गुणानां स्थाप्यते तोयं शेषयेदयसा समम् ॥ १६ ॥ स्वरसस्यापि लोहेन स्थालीपाके समानता । स्थाल्यां क्वाथादिकं दत्त्वा यथाविधि विनिर्मितम् । पाकेन क्षीयते यस्मात्स्थालीपाक इति स्मृतः॥१७॥ इस प्रकार भानुपाक करनेके अनन्तर स्थालीपाक करना चाहिये, स्थालीपाकमें त्रिफला लोहेसे तीन गुणा लेकर सोलह गुने पानीमें पकावे आठवां भाग बाकी रहे तो उतारकर छान ले, यह काथ स्थाली- पाकमें प्रयुक्त करे, यह त्रिफलेके काथका परिमाण है । त्रिफलेके सिवाय और सब प्रकारके द्रव्य लोहेके बराबरही लेने चाहिये परन्तु त्रिफला तीनगुणा ही लेकर काथ करे । ( यह स्थालीपाकके काथका परिमाण है ) और जो मृदुद्रव्यका काथ डालना हो तो लोहके बराबर ( भृंगराज आदि ) मृदुद्रव्य लेकर चारगुने जलमें पकावे । यदि पलाश आदि द्रव्य हो तो आठगुने जलमें पकावे । हरड आदि कठोर पदार्थको सोलह गुने जलमें पकावे । जब उसी द्रव्यके बराबर जल रहे तो उतार कर छान ले । यह काथ ऊपर कहे लोहचूर्णमें डालकर किसी पात्रमें चूल्हेपर चढ़ा नीचे अग्नि जलावे और जिस द्रव्यका स्वरस इसमें डालना हो वह भी लोहेके बराबर डालना चाहिये । इस प्रकार स्थाली ( पात्र ) में काथ या स्वरस डालकर अग्निद्वारा पकाकर रस सुखानेको स्थालीपाक कहते हैं, क्योंकि स्थालीद्वारा ही पकाया जाता है इसलिये इसका नाम 'स्थालीपाक' है ॥ १४--१७ ॥ स्थालीपाकमें डालनेके द्रव्य । हस्तिकर्णपलाशस्य मूलं च शतमूलिका । भृङ्गराजाख्यराजानामेषां निजरसैः सह ॥ १८ ॥ मिलित्वा वा विधातव्यं स्थालीपाके फलादनु । यथा दोषौषधेनापि स्थालीपाको विधीयते ॥ १९॥

भाषाटीकासहित । ( ८१ ) स्थालीपाकमें पहिले त्रिफलेका काथ डालकर पकावे उस काथके सूखनेपर हस्तिकर्ण, पलाशकी जड़का रस, जिमीकन्दका रस, शतावरका रस, भांगरेका रस और जामुनके फलोंका रस, अमलतासका रस क्रम- पूर्वक डालकर सुखावे । अथवा जिस दोषकी शांतिके लिये लोहभस्म सेवन करना हो उस दोषको नाश करनेवाले द्रव्यके स्वरसमेंभी स्थाली- पाक करना हितकारक है ॥ १८ ॥ १९ ॥ पुटपाकविधि । स्थालीपाके सुसंपक्वं प्रक्षाल्य स्वच्छवारिणा । शुष्कं संचूर्ण्य यत्नेन पुटपाके प्रयोजयेत् ॥ पुटाद्दोषविनाशः स्यात्पुटादेव गुणोदयः ॥३२०॥ म्रियते च पुटालोहः पुटं तस्मात् समाचरेत् । यथा यथा प्रदीयन्ते पुटाः सुबहुशो यदि ॥२१॥ तथा तथा प्रकुर्वन्ति गुणानेव सहस्रशः । पुटपाकेन पक्वन्तु शस्यते रसकर्मसु ॥ २२ ॥ स्थालीपाकमें पके हुए लोहको स्वच्छ जलसे धोकर ऊपर नितरे हुए जलको फेंक दे और लोहको सुखाकर बारीक चूर्ण करे । ( फिर इस चूर्णमें आगे लिखे मारकद्रव्योंका रस डालकर रगड़े सूखनेपर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे ) इस प्रकार पुट देनेसे लोहके सब दोष दूर होजाते हैं और बहुतसे गुण इससे प्रगट होजाते हैं एवं पुट देनेसेही लोहकी उत्तम भस्म होती है । जैसे२ लोहको बहुतसी पुटें दी जावें वैसे २ ही लोह सहस्रोंगुणोंके करनेवाला होता जाता है। पुटपाकसे भस्म हुआ लोहाही रसकर्म और रसायनकर्ममें प्रशंसनीय होता है ॥ ३२०-२२ ॥ पुटोंकी संख्या । दशादिशतपर्यन्तो गदे पुटविधिर्मतः ।

( ८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शतादिस्तु सहस्रान्तः पुटो देयो रसायने ॥ वाजीकर्मणि विज्ञेयो दशादिशतपंचकः ॥ २३ ॥ रोगनाशके लिये लोहभस्म बनाना हो तो दशसे सौ तक पुटें देनी चाहिये । दश पुटसे कम अग्निसे बनाया लोह उत्तम गुणकारी नहीं होता । रसायन कर्ममें सौ पुटसे सहस्र पुटतक दिया हुआ लोहभस्म अच्छा होता है। वाजीकर्ममें (स्त्रीगमनकी शक्ति बढ़ानेको) दशसे पांचसौतक पुट दिया हुआ गुणकारी होता है ॥ २३ ॥ सामान्य पुटोंका नियम । तावदेव पुटेल्लोहं यावच्चूर्णीकृतं जले । निस्तरंगे लघुत्वेन समुत्तरति हंसवत् ॥ २४ ॥ लोहको तबतक पुटें देकर चूर्ण करता जाय जबतक वह भस्म बन- कर स्वच्छ टिके हुए जलपर हंसके समान तैरने न लगे, जब जलपर तैरते हुए लोहकी भस्ममेंसे जलमें कोई सूक्ष्म कण भी डूबता हुआ दिखाई न दे तो लोहको भस्म हुआ जानना ॥ २४ ॥ पुटपाकमें औषधियोंका प्रयोग । पुटपाकौषधस्यापि क्वाथो वा स्वरसोऽपिवा । वक्ष्यमाणप्रमाणे कर्त्तव्यो भिषजां वरैः ॥२५॥ पुटपाकमें आगे कहे हुए द्रव्योंमेंसे जिसका स्वरस या क्वाथ डालना हो वह आगे कहे विधानसे डालकर श्रेष्ठ वैद्य विधिवत् पुटें देवे ॥ २५॥ रसाभावे तु सर्वेषां क्वाथो ग्राह्यो मनीषिभिः । अभावे स्वरसस्यापि क्वाथ एव फलत्रिकात् ॥२६॥ जिस द्रव्यका स्वरस न मिल सके उसका क्वाथ बनाकर डाले, यदि त्रिफलेका स्वरस न मिले तो वैद्यको उचित है कि त्रिफलेका भी क्वाथ ही डाले ॥ २६ ॥

भाषाटीकासहित । ( ८३ ) त्रिफलादिगण । त्रिफलात्रिवृतादन्तीकटुकीतालमूलिकाः । वृद्धदारकवृश्चीरवृषपत्रकचित्रकाः ॥ २७ ॥ शृंगवेरविडङ्गौ च भृंगभल्लातकौषधम् । दाडिमस्य च पत्राणि शतपत्री पुनर्नवा ॥ २८ ॥ कुठेरक्रामुकौ कन्दः तन्त्रीभेकस्य पर्णिका । हस्तिकर्णः पलाशश्च कुलिशः केशराजकः ॥ २९ ॥ माणः खण्डितकर्णश्च गोजिह्वालोहमारकः । गिरिशान्तनकः प्रोक्तस्त्रिफलादिरयं गणः ॥३०॥ सामान्यपुटपाकार्थमेतानिच्छन्ति सूरयः ॥ ३१ ॥ त्रिफला, निशोथ, दंती, कुटकी, तालमूली ( मुसली ), विधायरा, श्वेतपुनर्नवा, अडूसा, पत्रज, चित्रक, अदरख, वायविडंग, भांगरा, भिलावे, सोंठ, दाडिमके पत्र, शतावरी, लालपुनर्नवा, कुठेर ( तुलसी ), सुपारीकी जड, जिमीकंद, तंत्री ( गिलोय ), मण्डूकपर्णी, हस्तिकर्ण- पालाश, ( बड़ेपत्तेका ढाक), हडसंहारी, भांगरा, मानकंद, खंडितकर्ण, ( सकरकंदके समान कंद ), गोजियाघास और अपराजिता यह लोह- मारकगण हैं, इसीको त्रिफलादिगण भी कहते हैं । सामान्यतासे सर्व- रोग नाशार्थ लोहपुटपाक करनेके लिये इस मारणगणको बुद्धिमान् वैद्योंने श्रेष्ठ माना है ॥ २७-३१ ॥ वातनाशक एरंडादिगण । विशेषपुटपाकाय गणानन्याञ्छृणूदितान् । एरण्डशारिवाद्राक्षाशिरीषाश्च प्रसारणी ॥ ३२ ॥ १ कोई 'वृषपत्रक' शब्दको इकट्ठा लेकर छागलांत्री नामक वनौषधी अर्थ करते हैं । यदि वृषपत्रकका छागलांत्री अर्थ करे तो लोहमारकका शांतिशाक अर्थ कर लेना चाहिये ।

( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । माषमुद्गाख्यपर्पिन्त्यौ विदारीकन्दकेतकी । एरण्डादिगणो ह्येष सर्ववातविकारनुत् ॥ ३३ ॥ अब वातादि दोष विशेषपर पुटपाकके लिये कहे हुए इन गणोंको श्रवण करो । एरण्डकी जड, शारिवा, द्राक्षा, शिरीष, प्रसारणी, माष- पर्णी, मुद्गपर्णी, विदारीकंद और केतकी यह एरण्डादि गण संपूर्ण वातविकारोंको नष्ट करता है । ( यदि वातविकार शांतिके लिये लोह- भस्म करना हो तो इस एरण्डादि गणसे पुट देना चाहिये ) ॥ ३२-३३ ॥ किरातादि गण । किरातममृतानिम्बकुस्तुम्बुरुशतावरी । पटोलं चन्दनं पद्मं शाल्मल्यौडुम्बुरी जटा । पैत्तिकामयहन्ताऽयं किरातादिगणो मतः ॥ ३४ ॥ चिरायता, गिलोय, नीम, धनियाँ, शतावर, पटोल, चंदन, पद्म, सेमलकी जड और गूंलरंकी जड यह किरातादि गण पित्तविकारोंको नष्ट करनेमें श्रेष्ठ है । ( इसलिये पित्तरोग दूर करनेको इसकी पुटें देना चाहिये ) ॥ ३४ ॥ शृंगवेरादि गण । शृङ्गवेरस्य मूलानि निर्गुण्डीकौटजं फलम् । करञ्जद्वितयं मूर्वा शोभाञ्जनशिरीषकौ ॥ ३५ ॥ वरुणश्चार्कपर्णञ्च पटोलं कण्टकारिका । शृङ्गवेरादिको ह्येष गणः श्लेष्मगदापहः ॥ ३६ ॥ अदरख, संभालू, इंद्रजौ, करंज, पूतिकरंज, मूर्वा, सुहांजना, शिरीष, वरुणवृक्ष, आकके पत्र, पटोलपत्र और कटेली यह शृंगवेरादि गण कफके विकारोंको दूर करता है । ( कफके रोग दूर करनेकी लिये लोहमें इसकी पुटें देनी चाहिये ) ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ गोक्षुरादि गण । गोक्षुरक्षुरकौ व्याघ्री सिंहपुच्छीद्वयं स्थिरा । गोक्षुरादिरिति प्रोक्तो वातश्लेष्महरो गणः ॥ ३७ ॥

inदोषत्रयहरो! Look at the word ह्येष: +with! * In line 15: ह्येषhaswith! * Look at कुम्हेर? No, it's . Let's just output what is visually there: कुम्भीर? No, कुम्भार? No, कुम्हेर? * Wait, let's look at the word: "कुम्हेर" is the actual Hindi name of Kashmari! But why does it look like ? * Wait, does कुम्हेरexist in Hindi? YES, Kumher (कुम्हेर) is the Hindi name for Gambhari! But wait, isकुम्भीरalso used? No, Gambhari is called "कुम्हार" or "खम्भार" or "कुम्हेर". If someone spelled "Kumbher", in Devanagari it is कुम्भीर? No, कुम्हेर or कुम्भीर! If spelled with, it's कुम्भीर? No, with andit is कु-म्-भे-र. * Wait, let's look at the image: is it? * Look at inमाषपर्णी(line 2):thenप` then

( ८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गण वाजीकरणमें श्रेष्ठ है । ( यदि नपुंसकता दूर करने या कामशक्ति बढ़ानेको लोह भस्म करना हो तो इस गणसे पुटें दे ) ॥ ४१ ॥ विदारीकंदादि गण। विदारीकन्दपिण्डाह्वभृङ्गराजशतावरी । क्षीरकञ्चुकभल्लातामृतकाचित्रकैस्तथा ॥ ४२ ॥ करिकर्णपलाशैश्च मूसलीमधुकैरपि । मुण्डिरीकेशराजैश्च पुटो देयो रसायने ॥ ४३ ॥ विदारीकंद, पिण्डाह्व ( शिलारस ), आंगरा, शतावरी, क्षीरकञ्चुकी, भिलावे, गिलोय, चित्रक, बड़ेपत्रका ढाक, मुसली, मुलैठी, गोरख- मुण्डी और केशराज इसको विदारीकंदादि गण कहते हैं । रसायनार्थ इन द्रव्योंसे पुट देना चाहिये ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ सामान्ये च विशेषे च पुटे यद्यत्प्रकीर्तितम् । मिलितैरेकशो वा तैर्यथेष्टं पुटयेत्ततः । पुटपाके फलादीनामयसा ग्रहणं समम् ॥ ४४ ॥ ऊपर कहे सामान्य (त्रिफलादि) गणकी या विशेष एरण्डादि गणकी जिस जिसकी पुट देनी हो उस गणकी सब औषधियोंको इकट्ठाकर वा अलग अलग लेकर जैसा उचित हो वैसे द्रव्योंका स्वरस या काथ लोहचूर्णके बराबर डालकर खरल कर सुखाले,फिर संपुटमें रख कपड- मिट्टीसे संधान कर पुटमें फूंक दे,पुटपाकमें त्रिफलादि जो द्रव्य मिलाने हों लोहचूर्णके समान मिलाने चाहिये ॥ ४४ ॥ पुटपाकविधान । हस्तमात्रमिते गर्ते करीषेणार्द्धपूरिते । अथवा तुषकाष्ठाभ्यां पूरितेऽर्द्धे निधापयेत् ॥ ४५ ॥ लोहमग्निं ततो दत्त्वा तथैवोर्द्धं प्रपूरयेत् ।

भाषाटीकासहित । ( ८७ ) दिवा वा यदि वा रात्रौ विधिनानेन पाचकः । चतुर्भिः प्रहरैरेवं पुटपाकेन मारयेत् ॥ ४६ ॥ एक हाथका गहरा, चौड़ा, गोल गढ़ा खोदे; उसमें आधे भाग- तक एरने उपले अथवा तुष और काष्ठ भर दे फिर लोहेके चूर्णका संपुट रख अग्नि गेरे और ऊपरले आधे भागको भी पूर्ववत् उपलोंसे या काष्ठादिसे भर दे । इसप्रकार रात्रिको अथवा दिनमें पुट देवे, चार प्रहरतक इसी तरह रहने दे फिर स्वांग शीतल होनेपर निकाल ले । ( संपुट खोलकर बीचमेंसे लोह निकाल जिस द्रव्यकी पुट देनी हो उसके रसमें रगड़कर सुखा ले फिर इसी प्रकार पुट दे ) ॥४५॥४६॥ पुटमें दोष । पुटपाके क्षणादूर्ध्वं स्थितो भवति भस्मसात् । अधस्तादपकृष्टस्तु मन्दो भवति वीर्यतः ॥ ४७ ॥ कुण्डस्थो भस्मनाच्छन्न आक्रष्टव्यः सुशीतलः । समाकृष्टस्य तप्तस्य गुणहानिः प्रजायते ॥ ४८ ॥ यदि पुटको पहले ही भरकर ऊपर संपुट रक्खे तो संपुटमें जो द्रव्य हो उसकी शीघ्र ही निस्सारभस्म होजाती है ( या द्रव्य उड़ जाता है ) और पुटमें नीचे ही संपुटको रख देनेसे मन्द वीर्य हो जाता है इसलिये संपुटको पुटके मध्यमें रखना चाहिये । जब पुट स्वांग शीतल होजाये तो निकाल ले गरमको न निकाले, गरम निकालनेसे गुण नष्ट होजाता है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ अन्य प्रकारसे लोह मारण । शुद्धस्य सूतराजस्य भागो भागद्वयं बलेः । द्वयोः समं लोहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ४९ ॥ यामद्वयं ततो गोलं स्थापयेत्ताम्रभाजने । आच्छाद्यैरण्डजैः पत्रैरुष्णो यामद्वयाद्भवेत्॥३५०॥

( ८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्रिरात्रं धान्यराशिस्थं तत्ततो मर्दयेद्दृढम् । रजस्तद्वस्त्रगलितं नीरे तरति हंसवत् ॥ तीक्ष्णं मुण्डं कान्तलोहं निरुत्थं जायते मृतम्॥५१॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध आमलासार गंधक दो भाग इन दोनोंके बराबर उपरोक्त विधिसे शुद्ध किया लोह चूर्ण ले, पहिले पारे गंधकको रगड़कर कजली करे फिर इसमें लोहचूर्ण मिला घीकुमारके रसमें दो पहर रगड़कर गोला बनावे इस गोलेको तांबेके पात्रमें रख दो पहरकी अग्नि देवे ( इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा कर नीचे दो पहर तीक्ष्ण अग्नि जलावे । कोई इसको पुटमें फूंकना मानते हैं परन्तु मूलपाठसे पुटमें फूंकनेका अर्थ नहीं निकलता, कोई कोई पुरुष तीक्ष्ण धूपमें दो पहर रखना ऐसा अर्थ करते हैं, हमारी रायमें दो पहरकी अग्नि देना ठीक है अथवा दो पहर घीकुमारमें रगड़कर पुट देना भी ठीक है ) फिर शीतल होनेपर पात्रमेंसे लोहचूर्णके गोलेको निकाल एरंडके पत्रोंसे लपेट धान्योंकी राशिमें तीन दिन पर्यन्त दबाये रक्खे चौथे दिन निकालकर खरलमें डाल बारीक चूर्ण करे और वस्त्रद्वारा छानकर पानीपर तैरावे ( जबतक पानीपर तैरनेवाली उत्तम भस्म न बने तब- तक इसी विधानसे पारे गंधकके संयोगसे गोला बनाकर दो प्रहरकी अग्नि या पुट दे धान्यके ढेरमें दबाकर चूर्ण करता रहे, जब हंसके समान तैरनेवाली होजाय तो शुद्ध भस्म जाने ) इस प्रकार तीक्ष्णलोह वा मुण्डलोह, या कांतलोह इनमेंसे कोई भी लोह हो उसकी उत्तम निरुत्थ भस्म होजाती है ॥ ४९-५१ ॥ द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णस्य मेलयेत् । कन्यानीरेण संमर्द्य यामयुग्मञ्च संपुटेत् । एवं सप्तपुटे मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥ अन्य प्रकार—शुद्ध लोहचूर्णमें बारहवां भाग सिंगरफ मिलाकर दो पहर तक घीकुमारके रसमें खूब रगड़े फिर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे इसप्रकार सात पुटें देनेसे लोहेकी उत्तम भस्म होजाती है ॥ ५२ ॥

भाषाटीकासहित । ( ८९ ) निरुत्थ भस्मकी परीक्षा । सर्वमेतन्मृतं लोहं पक्तव्यं मित्रपञ्चकैः । यद्येवं स्यान्निरुत्थञ्च सेव्यं रक्तिचतुष्टयम् ॥ ५३ ॥ सब प्रकारके मृत लोहोंको मित्रपंचकमें मिलाकर कोयलोंकी अग्निमें तपावे यदि इस प्रकार तीक्ष्णाग्नि देनेसे भस्म जैसी डाली थी वैसाही रहे तो निरुत्थ भस्म जाने, निरुत्थ भस्म हो तो इसको चार रत्ती मात्रा तक सेवन कर सकते हैं (यदि वही धातु जी जावे तो उसे न खावे फिर पूर्ववत् पुटें देवे जब निरुत्थ हो जाये तो सेवन करे) ५३॥ मित्रपंचक । मधु सर्पिस्तथा गुञ्जा टंकणं गुग्गुलुस्तथा । मित्रपञ्चकमेतच्च गदितं धातुमेलने ॥ ५४ ॥ शहद, घी, रत्तकें, सुहागा और गुग्गुल इन पांच द्रव्योंको मित्रपञ्चक कहते हैं, इस मित्रपञ्चकमें मिलाकर धमानेसे जो धातु फूंकनेमें कच्ची रहगई हो वह जी उठती है अर्थात् फिर वैसी ही बन जाती है ॥ ५४ ॥ अन्य प्रकारसे परीक्षा । गोघृतं गन्धकं लोहं तप्तखल्ले विमर्दयेत् । दिनैकं कन्यकाद्रावै रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ इत्येवं सर्वलोहानां कर्त्तव्यं स्यान्निरुत्थितम् ॥५५॥ गोघृत, गंधक और लोहभस्म इनको घीकुमारके रससे तप्त खल्वमें एक दिन मर्दन कर संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । शीतल होनेपर निकाले यदि निरुत्थ भस्म हो तो सेवन करे । इस प्रकार सब प्रकारके लोहोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ घृतमधुगुञ्जाटंकणैःसमं लोहभस्म मर्दयेच्च विचक्षणः। धमेद्बह्नौ पुनर्लोहं तदा योज्यं रसायने ॥ ५६ ॥