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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१६४ रसखान-ग्रन्थावली मारने के लिए अवतार ले रहा है तो वह बहुत अप्रसन्न हुआ । आकाशवाणी के अनुसार ही भादो की कृष्णाष्टमी को आनन्द सागर महाप्रभु कृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया । कस के भय से भयभीत होकर वसुदेव उस नवजात शिशु को अँधेरी रात मे चुपचाप लेकर महावन (मथुरा) की ओर चल दिए । जिस कृष्ण को चारो कालो का कोई भी योगी अपनी समाधि की जागृतावस्था मे भी प्राप्त नही कर सका है, उसी कृष्ण को यशोदा ने रात को अपने पास सोते हुए पाया । विशेष १. समाधि अलकार । २. यह सवैया श्री विश्वनाथ मिश्र द्वारा सापादित 'रसखान ग्रंथावली' मे नही है । तुलना १. 'गावत वेद विरंच न पायौ सो गोधन गावत गोपन पायौ । —केशव २ 'जग जाकी गोद मे सो जसुदा की गोद मे ।' —ब्रजेश कवित्त संभु धरै ध्यान जाको जपत जहान सब, ताते न महान् और दूसर अवरेख्यौ मैं । कहै रसखान वही बालक सरुप धरै, जाको कछु रूप रंग अद्भुत अवलेख्यौ मैं । कहा कहूँ आली कछु कहती बनै न दसा, नन्द जी के अँगना मे कौतुक एक देख्यो मैं । जगत को ठाटी महापुरुष विराटी जो, निरंजन निराटी ताहि माटी खात देख्यौ मैं ॥१४॥ शब्दार्थ—अवरेख्यौ मै = मैने देखा। अवलेख्यौ मै = मैने देखा। कौतुक = तमाशा । जगत को ठाटी = ससार की रचना करने वाला, सृष्टि-स्रष्टा । विराटी = विराट रूप धारण करने वाला । निरंजन = विमल, प्रभावातीत । निराटी = अकेला, एकमेव । अर्थ—कोई गोपी अपनी सखी से कृष्ण की अलौकिकता और उनकी