रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याख्या भाग १६५ बाल-लीला का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि । शिव जिसको आराध्य मानकर ध्यान करते हैं, सारा संसार जिसकी पूजा करता है, जिससे महान् और दूसरा देव मैने कोई नही देखा । वही कृष्ण साकार बनकर अवतरित हुआ है जिसका रूप-रंग मुझे कुछ-कुछ अद्भुत सा लगा है । हे सखि ! क्या कहूँ, मुझसे तो उसकी उस अवस्था का वर्णन ही नही हो पा रहा है । बस यह जान लो कि नंद जी के आँगन मे मैने एक तमाशा देखा है । जो कृष्ण संसार की रचना करने वाला है, महापुरुष है, विराट रूप धारण करने वाला है, किसी भी प्रकार के प्रभावो से परे है-प्रभावातीत है, केवल एक हैं; अर्थात् वही एक केवल सत्ताव्रत है, और सारा संसार तो उसी की सत्ता की माया है, उसे मैने मिट्टी खाते हुए देखा है । विशेष-१. इस कविता का भावपक्ष निर्बल और दार्शनिकता सबल है । २. श्री विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित 'रसखान-ग्रन्थावली' मे यह कवित्त नही है । तुलना-'शृणु सखि कौतुकमेकं नंद निकेतांगणे मया दृष्टम् । गोधूलि धूसरांगो नृत्यति वेदान्त सिद्धातः ॥' कवित्त वेई ब्रह्म ब्रह्मा जाहि सेवत हैं रैन-दिन, सदासिव सदा ही धरत ध्यान गाढे है । वेई विष्णु जाके काज मानी मूढ राजा रंक, जोगी जती ह्वै कै सीत सह्यो अग डाढे है । वेई ब्रजचंद रसखानि प्रान प्रानन के, जाके अभिलाख लाख-लाख भाँति बाढे है । जसुधा के आगे बसुधा के मान-मोचन मे, तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है ॥ १५ ॥ शब्दार्थ-वेई = वही कृष्ण । सदासिव = सदा भक्त वत्सल शिव । गाढ़े = गंभीर । जाके काज = जिसके लिए ! मानी = अहंकारी । मूढ = मूर्ख । रंक = निर्धन । ब्रजचंद = कृष्ण । रसखानि = आनंद के भंडार । जसुधा = यशोदा । वसुधा = पृथ्वी, पृथ्वी पर रहने वाले लोग । मान-मोचन = अहंकार को नष्ट करने वाले । तामरस-लोचन = कमलनयन । खरोचन = खुरचनी ।