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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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१६६ रसखान-ग्रन्थावली अर्थ—प्रस्तुत कवित्त मे रसखान कृष्ण के अलौकिकत्व एवं बाल-लीला की ओर संकेत करते है कि वही कृष्ण ब्रह्म जिनकी पूजा ब्रह्मा जी रात-दिन किया करते हैं, भक्त-वत्सल शिव जिनका सदा गभीर ध्यान करते हैं; वही कृष्ण-विष्णु जिनके लिए अहकारी, मूर्ख, राजा, निर्धन, सभी प्रकार के लोग भोगी बनकर गीतादि के द्वारा अपने अगो को शिथिल बनाते हैं, वही आनन्द के भडार कृष्ण जो प्राणो के प्राण हैं और जिन्हें देखने के लिए लाखो अभिलाषायें लाखो प्रकार से बढती है, जो पृथ्वी पर रहने वाले लोगों का अहकार मिटाने वाले हैं कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाले हैं, यशोदा के सामने खुरचनी लेने के लिए खडे हुए हैं। विशेष—१ इस कवित्त मे कृष्ण के ब्रह्म-रूप की ओर सकेत है। २ जसुधा के आगे वसुधा के मान-मोचन मे और तामरस-लोचन खरोचन कौ ठाढे है। मे यमक अलकार है। ३ कृष्ण का अनेक रूपो मे वर्णन होने से उल्लेख अलकार हैं। तुलना—आगे नंदरानी के तनक गम पीने काज, तीन लोक ठाकुर सो सुनुकत ठाढो है। —पद्माकर अनन्य भाव सवैया सेप सुरेस दिनेस गनेस अजैस धनेस महेस मनावौ। कोऊ भवानी भजौ मन की सब आस सबै विधि जाइ पुरावौ। कोऊ रमा भजि लेहु महा धन कोऊ कहूँ मन वांछित पावैौ। पै रसखानि वही मेरो साधन और त्रिलोक रहौ कि नसावौ ॥ १६ ॥ शब्दार्थ—सेप = शेषनाग। सुरेस = इन्द्र । दिनेस = सूर्य । अजैस = ब्रह्मा। धनेस = कुवेर। महेस = शिव। भवानी = पार्वती । पुरावौ = पूर्ण करे। रमा = लक्ष्मी। नसावौ = नष्ट हो जाये। अर्थ—अनन्य भाव की भक्ति की अभिव्यक्ति करते हुए रसखान कहते हैं कि चाहे कोई शेषनाग, इन्द्र, सूर्य, गणेश, ब्रह्मा, कुबेर और शिव की भक्ति करे। चाहे कोई पार्वती की भक्ति करके अपने मन की सभी अभिलाषाओ को सभी प्रकार पूर्ण कर ले। चाहे कोई लक्ष्मी की पूजा करके भारी धन