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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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: २ : रसखान का जीवन-वृत्त रीतीकालीन स्वच्छन्द काव्यधारा के विशिष्ट कवि रसखान का न तो जीवन- वृत्त ही निर्विवाद है और न इनकी रचनाएँ । इनके जीवन-वृत्त को जानने की जो सामग्री उपलब्ध है, उसे दो भागो मे विभाजित किया जा सकता है—अन्तः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य । अन्त.साक्ष्य मे वे तथ्य होते है जो सम्बद्ध कवि की रचना अथवा रचनाओ मे मिलते है । बाह्य साक्ष्य मे अन्य विद्वानो द्वारा अन्वे- षित तथ्यो का विवेचन होता है । इन्ही दो आधारो पर हम यहाँ पर रसखान का जीवन-वृत्त प्रस्तुत कर रहे है । अन्तःसाक्ष्य—जहाँ तक अंत साक्ष्य का सम्बन्ध है, अन्य भक्त-कवियो की भाँति रसखान भी अपने विषय मे प्रायः मौन रहे, चाहे शालीनतावश अथवा राजनीतिक कारणो से । प्रेम-वाटिका मे अपने विषय मे इन्होने निम्नलिखित केवल चार दोहे लिखे है — १. देखि गदर हित-साहिबी, दिल्ली नगर मसान । छिनहिं बादसा-बस की, ठसक छोरि रसखान ॥ २ प्रेम-निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोवर्धन-धाम । लह्यौ सरन चित माहिंकै, जुगल-सरूप ललाम ॥ ३. तोरि मानिनी ते हियो, फोरि मोहिनी मान । प्रेमदेव की छविहि लखि, भए मियाँ रसखान ॥ ४. बिधु सागर रस इन्दु सुभ, बरस सरस रसखान । प्रेमवाटिका रचि रुचिर, चिर हिम हरषि वखान ॥ इन दोहो से यह ज्ञात होता है कि जब दिल्ली में शासन-लिप्सा के कारण गदर हुआ और दिल्ली नगर श्मशान की भाँति कुरूप एवं भयानक हो गया तो रसखान शाही वंश का तुरंत गर्व छोड़कर, तथा अपनी मानिनी प्रिया मान की चिन्ता न करते हुए ब्रज मे आए, जहाँ इन्होने संवत् १६७१ मे प्रेमवाटिका की रचना की ।