रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ रसखान-ग्रन्थावली
की स्थापना करते समय ये भूल गये है कि गोस्वामी विट्ठलनाथ रसखान के दीक्षा-गुरु थे । हिन्दी के कुछ अन्य विद्वानो की भांति आचार्य चन्द्रवली पाडेय ने भी जहाँगीर (सलीम) के पुत्र खुसरू (जन्म संवत् १६४२, मरणकाल संवत् १६७६) द्वारा राज्य हड़पने की संवत् १६६२-६३ वाली विफल घटना को रसखान द्वारा उल्लिखित "दिल्ली का गदर' स्वीकार किया है । कुछ अन्य विद्वानो ने अकबर की काबुल-विजय को ही दिल्ली का गदर मान लिया है । डॉ० भवानीशंकर याज्ञिक ने इन सभी मान्यताओ को अमान्य ठहराते हुए उस विषय पर विस्तार से, इतिहास के परिवेश मे, विचार किया है । ये इस घटना को अकबरकालीन मानते हैं— 'ठीक इसी समय सं० १६४२ (२३ जनवरी, १५५६ ई०) मे अपने पुस्त- कालय की सीढ़ी से गिर पड़ने से हुमायूँ की अचानक मृत्यु हो गई और अक- बर संवत् १६१२ (१४ फरवरी, १५५६ ई०) को गद्दी पर बैठा । उसने पठानो को खदेड-खदेड़ कर अशक्त कर दिया । और थोडे समय मे सबका दमन कर सूरवंश का नाम मिटा दिया । सिकन्दरशाह सूर अकबर से प्राणो की भिक्षा पाकर शेष जीवन बंगाल मे व्यतीत करने लगा और तीन वर्ष बाद मर गया । महमूदशाह आदिल को, जो चुनारगढ मे था, महमूदखाँ के पुत्र खिजिरखाँ ने अपने पिता के वध का बदला लेने के लिए बिहार मे सूरजगढ मे परास्त कर स० १६१७ मे मरवा डाला । इब्राहीमखाँ जो सभल भाग गया था, हेमु से वार-वार पराजित होकर बुन्देलखंड और फिर उडीसा भाग गया और कुछ वर्षों बाद मारा गया । हुमायूँ की मृत्यु का समाचार मिलते ही हेमू मुग़ल-सेना से लडने गया और सितम्बर १५५६ ई० मे दिल्ली पर अधिकार कर लिया, किन्तु ५ नवम्बर, सन् १५५६ ई० को युद्ध मे तीर की चोट से ऊँचा होने पर वन्दी हुआ और बैरमखाँ द्वारा मारा गया । उपरोक्त इतिहास-प्रसिद्ध गृहकलह को ही रसखान ने गदर का नाम दिया है । इसी गृहकलह ने दिल्ली को श्मशानवत् कर दिया था । यह राज्यलिप्सा- जन्य परस्पर का कलह रसखान के निकट सम्बन्धियो के बीच ही हुआ था । वे स्वयं बादशाह-वंश के पठान थे और सम्बन्धियो मे मारकाट मची देखकर व्याकुल हो गये थे । संवत् १६०२ मे इस कलह का वीजारोपण सलीमगाह द्वारा बड़े भाई का राज्य हड़पने के कारण हुआ और संवत् १६११-१२ मे