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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग २३ कसीर (अधिक, प्रचुर) पहिना करते थे । किसी ने पूछा कि दो माला ही काफी (पर्याप्त) है, इस कदर (अत्यधिक) कसरत (बाहुल्य, प्रचुरता) की क्या जरूरत (आवश्यकता) है ? जवाब दिया कि माला असखास मिस्ले संग को (पत्थर जैसे व्यक्तियो को) ससार समंदर (सागर) से पार उतार देती है । सो जो शख्स (व्यक्ति) मिस्ल (समन) छोटे पत्थर के है, उसको तो एक- दो माला काफी (पर्याप्त) है, और मै मिस्ल संग कला (बडे पत्थर के समान) हूं, मुझको बहुत माला रखना वाजिब (उचित) है । इस कथा मे कोई ऐतिहासिक तथ्य नही, केवल रसखान से सम्बद्ध अनु- श्रुतियो को दोहरा दिया गया है और वह भी श्रद्धा के साथ । भारतेन्दु जी ने अपने भक्तमाल उत्तरार्द्ध मे रसखान के साथ अन्य मुसल- मान हिन्दी कवियो की ओर दृष्टिपात किया है और उनकी हिन्दी-सेवा से भाव-विभोर होकर कह उठे है— 'इन मुसलमान हरिजनन पै, कोटिनि हिन्दू वारिए ।' राधाचरण गोस्वामी ने अपने 'नवभक्तमाल' मे रसखान से सम्बन्धित एक छप्पय लिखा है, जो इस प्रकार है— 'दिल्ली नगर निवास, बादसा बंश विभाकर । चित्र देखि मन हरो, भरो मन प्रेम-सुधाकर । श्री गोबरधन आइ, जबै, दरसन नहि पाए । टेढे मेढे बचन रचन निरभय ह्वै गाए । तब आप आइ सु मनाइ, करि सुस्रूषा मेहमान की । कवि कौन मिताई कहि सकै, श्रीनाथ साथ रसखान की ॥' गोस्वामी जी का यह विवरण नाभादासकृत 'भक्तमाल' पर ही आधारित है । उपर्युक्त वार्ता-साहित्य से रसखान के किसी ऐतिहासिक विवरण पर ऐतिहासिक दृष्टि से प्रकाश नही पडता, वरन् इनमे लेखको की कृष्णभक्त-कवि रसखान के प्रति श्रद्धाजलियाँ भी उपलब्ध होती हैं । इसका तात्पर्य यह नही है कि इनमे वर्णित तथ्य अथवा घटनाएँ निरी काल्पनिक है । इनसे रस- खान के विषय मे जो निष्कर्ष निकलता है, वह यही है कि इनका प्रारंभिक

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