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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ३१

पर गोरज, वाणी मे माधुर्य आदि । कृष्ण की शोभा को बढ़ाने वाली प्रायः उन्ही क्रियाओ का वर्णन किया गया है, जो कृष्ण-काव्य मे परम्परागत रूप से वर्णित होती आई है। कुंजो से निकलना, अन्य गोपियो के साथ छेड़खानी करना, कदम्ब वृक्ष पर चढकर बॉसरी बजाना, कटाक्ष करना, मुस्कराना, आदि क्रियाएँ कृष्ण-काव्य की चिर-परिचित क्रियाएँ है । रसखान का यह वणन सश्लिष्ट है, अर्थात् इन्होने कृष्ण-सौन्दर्य का वर्णन प्रत्येक अग अथवा क्रिया को अलग-अलग लेकर नही किया है, वरन् सबका एक साथ वर्णन किया है। ७. प्रेम-लीला—प्रेम-लीला के अन्तर्गत वस्तुत कृष्ण के सौन्दर्य के द्वारा आकृष्ट गोपियो की प्रेमानुभूति का वर्णन है। प्रत्येक गोपी अपनी सखी से उसी सौन्दर्यजन्य प्रभाव का वर्णन करती है। यदि कोई गोपी अधीर होकर कदम्ब और करील के वृक्षो से पूछती है कि तुम्हारे साथ रहने वाला कृष्ण कहाँ गया तो एक गोपी अपनी सखी से अपनी प्रेम-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि कृष्ण की भौहे भरी हुई थी, पलके सुन्दर थीं, अधर लाल थे । उसके कानो मे कु डल थे जो हिल-डुलकर कृष्ण के कपोलो की शोभा को द्विगु- णित कर रहे थे। वह मुस्कराता हुआ कुंजो मे से निकला और उसे देखते ही गोपियाँ मूच्छित हो गईं अर्थात् अपनी सुधि-बुधि भूल गई । दही का मटका सिर से गिरकर फूट गया। कही अवसर पाकर कृष्ण गोपियों को घेर लेते है । उनका मटके फोड देते है और अपनी मधुर वाणी तथा आकर्षक क्रियाओ से उन्हे मुग्ध करके अपने वश मे कर लेते है । कृष्ण के इस अपार सौन्दर्य का प्रभाव गोपियों पर इतना अधिक पडता है कि वे उसे देखकर लोक और कुल की मर्यादा को तिलाजलि दे देती है और जब भी कृष्ण को देखती है, वे उसकी ओर इस प्रकार दौडती है जैसे नदी निर्बाध गति से सागर की ओर भागती है। उसके रूप-सौन्दर्य का ध्यान आने से ही वे स्वयं को भूल जाती है। सास के त्रासो की, ननद के तीक्ष्ण व्यग्यो की उन्हे कोई चिन्ता नही रह जाती । कहने का भाव यह है कि वे पूर्णतया कृष्ण के हाथो बिक जाती है। ८. बंक-विलोचन—प्रेम-व्यापार मे वक्र दृष्टि का महत्त्वपूर्ण स्थान है, इसीलिए साहित्य मे इस प्रकार की दृष्टि का और इसके-द्वारा उत्पन्न प्रभाव