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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ३३ इस प्रकार गिने-चुने छन्दो मे रसखान ने कृष्ण की मुसकान का अत्यन्त प्रभावशाली वर्णन किया है। १० कृष्ण-सौन्दर्य--प्रत्येक कृष्णभक्त-कवि ने कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन किया है, पर यह वर्णन इतना अधिक परम्पराबद्ध हो गया है और सूर ने इसका इतने अधिक विस्तार से वर्णन कर दिया है कि आगे के कवियो को नवीनता के लिए गुंजायश ही नही रह गई। कृष्ण-सौन्दर्य के उपकरण प्राय: रूढिबद्ध हो गये है—मोर-मुकुट, वैजन्तीमाला, कु डल, पीताम्बर, वक्रदृष्टि, मधुर मुस्कान आदि । रसखान भी इस परम्परा से बाहर नही निकल पाये है। इन्होने कृष्ण-सौन्दर्य का विवरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है . कृष्ण के सिर पर मोरपखो का मुकुट और कानो मे कुंडल सुशोभित है । उनके केशो की शोभा उनके कपोलो पर बिखरी हुई है । वह दुख का हरण करनेवाली तथा मन को मोहनेवाली है। उनकी वक्रदृष्टि आनद देनेवाली और विशाल है। उनका श्याम शरीर नवीन विशाल बादल के समान है जिस पर पीले वस्त्र की शोभा बहुत ही प्रभावशाली है । जिस प्रकार कृष्ण के अग और आभरण रूढिबद्ध हो गये है, उसी प्रकार उनकी क्रियाएँ परम्परा से बँध गई है गौओ का चराना, गोधन गाना, बाँसुरी बजाना, वक्र दृष्टि से देखना, मुस्कुराकर चलना आदि । इन सौन्दर्यवर्द्धक क्रियाओ के अन्तर्गत भी रसखान अधिकाशत. परम्परावादी ही रहे है । ११ रूप-प्रभाव—कृष्ण के अमित अग-सौन्दर्य को तथा उनकी क्रियाओ के माधुर्य को देखकर कोई भी ब्रजवासी ऐसा नही है जो उनसे अप्रभावित रह सकता है, विशेषत. गोपियाँ तो एकदम अपनी सुधि-बुधि भूल जाती है। कृष्ण के रूप-प्रभाव का उपयोग सयोग और वियोग दोनो ही स्थितियो मे किया गया है । सयोग मे गोपियाँ उनके रूप को देखते ही किकर्त्तव्यविमूढ बन जाती है और अपने होश-हवाश गँवा बैठती है । अपनी प्रेमदशा का वर्णन करती हुई कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! कृष्ण का यौवन कामदेव की शोभा से भरा हुआ है । उनकी मनोहर मूर्ति सदैव आँखो मे समाई रहती है। उन्होने मुझसे जो प्रेमभरी बाते की थी, वे मन की मन मे ही रह गई है, अर्थात् मैं उन्हे किसी से कह नही पाती । प्रेम की घाते हृदय के बीच मे अडी हुई है । कृष्ण के वियोग मे मेरी आँखो मे सारी रात आँसुओ की लड़ी रहती है, अर्थात् मै

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