रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ रसखान-ग्रन्थावली
रातभर कृष्ण का स्मरण करके रोती रहती हैं। किसी-किसी गोपी पर कृष्ण के रूप का प्रभाव इतना पड़ा है कि वह बिना मोल ही कृष्ण के हाथों बिक गई है। उसके लिए नंदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं, उनकी वक्रदृष्टि प्रेम के पाश मे बाँधनेवाली है, उनके मुख की सुन्दरता से करोड़ों चन्द्रमा पराजित हो गये हैं। इसीलिए कोई गोपी तो अपनी सखी के सामने अपनी आँखें इसलिए नही खोलती कि उनमें कृष्ण की छवि बसी हुई है। अतः जब भी गोपियाँ कृष्ण को देखती हैं, उनके नेत्र बरबस उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं, ठीक बिहारी की नायिका के उन नेत्रों के समान जो लाज- लगाम का शासन नहीं मानते। यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि कतिपय छंदों मे ही रसखान ने रूप-प्रभाव का जो वर्णन कर दिया है, वह हृदय को प्रभावित करने के लिए काफी है। १२ कुंज लीला—कुंजलीला का वर्णन भी परम्परागत है। कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज प्रातःकाल जब मैं कुंजगली मे निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। कृष्ण के मुख की मुस्कान मे मेरा मन इतना डूब गया कि उसकी छवि पर से हटाने से भी नही हटा। उस मुस्कान ने मेरे नयनों को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फंदा डाल दिया। इस प्रकार के वर्णन मे कोई नवीनता तथा मौलिकता नहीं है। १३ नटखट कृष्ण—इस शीर्षक के अन्तर्गत संकलित छंदों मे कृष्ण के नटखटपन का वर्णन है। यह वर्णन कही गोपियों की सहज स्वाभाविकता से परिपूर्ण है और कहीं तीक्ष्ण व्यंग्य से। कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम और किसी जगह से नही आये हो। तुम्हारा जन्म हमारे इसी गाँव मे हुआ है। बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिलाकर माँ-बाप की तरह पाला है। उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो। तुम बचपन मे द्वार-द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखें नचा रहे हो। तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी उतारी। हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस बिखर जाने का और न वस्त्रों के फट जाने का। हमे दुःख तो इस बात का है कि तुम हमारे होकर ही हमे इतना तंग करते हो। इन वाक्यो मे गोपियों के