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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 368 में से

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समीक्षा भाग ३५ मन की सहज स्वाभाविकता वर्णित है। इसी प्रकार एक अन्य गोपी कृष्ण के नटखट व्यवहार की शिकायत अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण एक से बढ़कर एक शरारतियो को अपने साथ लेकर वन मे घूमता रहता है। वह जितनी शरारते करता है, उनका वर्णन नही किया जा सकता । वह न तो किसी की अनुनय-विनय पर ध्यान देता है और न किसी प्रकार की मान-मर्यादा की ही लज्जा करता है। आती-जाती गोपियो की दधि-मटकियाँ फोडकर उन्हे कृष्ण ने जिस प्रकार तग किया है, उस सबका वर्णन इस शीर्षक के अंतर्गत संकलित छन्दो मे मिलता है। १४. मुरली-प्रभाव - वैष्णव सम्प्रदाय के अन्दर मुरली को भगवान् की वशीकरण शक्ति माना गया है। कृष्ण जब भी मुरली बजाते है, तब जड और चेतन स्थिर बन जाते है। ब्रज की गोपियो की दशा तो विलक्षण ही हो जाती है। मुरली की ध्वनि सुनते ही गोपियाँ अपना काम करना छोड़ देती है, अतः दुहा हुआ दूध ठंडा पड जाता है, जामन दिया हुआ दूध रखा-रखा ही खटा जाता है। सभी के हाथ-पैर अपना-अपना काम करना छोड़ देते है। यह दशा नारियो की ही नही, बल्कि पुरुषो की भी हुई । कहने का भाव यह है कि सारा ब्रज ही व्याकुल हो गया । उसकी समस्त व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। इसी प्रकार एक अन्य गोपी मुरली-प्रभाव का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखवाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर मैं संज्ञाशून्य हो गई और कुल की मर्यादा छोड़ बैठी । इसीलिए गोपियाँ चाहती हैं कि कोई व्यक्ति कृष्ण के हाथ से बाँसुरी छीनकर उसे जला डाले, तभी वे उससे छुटकारा पा सकती है। कृष्ण अपनी बाँसुरी से इतना अधिक प्रेम करते है कि वे हर समय उसे अपने अधरो से लगाये रहते हैं। इससे गोपियो के मन मे बाँसुरी के प्रति ईर्ष्या-भाव उत्पन्न हो गया है। वे तो यह चुनौती भी दे देती हैं कि ब्रज मे या तो हम रहेगी या यह कृष्ण-प्रिया बाँसुरी ही रहेगी। इस प्रकार काफी विस्तार के साथ रसखान ने मुरली-प्रभाव का वर्णन किया है। १५. कालियदमन - कृष्ण की अन्य प्रमुख लीलाओ के अन्तर्गत कालिय- दमन लीला भी प्रमुख है। सूरदास ने इस लीला का विस्तार से वर्णन किया

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