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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

३४ रसखान-ग्रन्थावली

रातभर कृष्ण का स्मरण करके रोती रहती हैं। किसी-किसी गोपी पर कृष्ण के रूप का प्रभाव इतना पड़ा है कि वह बिना मोल ही कृष्ण के हाथों बिक गई है। उसके लिए नंदपुत्र कृष्ण कामदेव से भी अधिक मनोहर हैं, उनकी वक्रदृष्टि प्रेम के पाश मे बाँधनेवाली है, उनके मुख की सुन्दरता से करोड़ों चन्द्रमा पराजित हो गये हैं। इसीलिए कोई गोपी तो अपनी सखी के सामने अपनी आँखें इसलिए नही खोलती कि उनमें कृष्ण की छवि बसी हुई है। अतः जब भी गोपियाँ कृष्ण को देखती हैं, उनके नेत्र बरबस उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं, ठीक बिहारी की नायिका के उन नेत्रों के समान जो लाज- लगाम का शासन नहीं मानते। यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि कतिपय छंदों मे ही रसखान ने रूप-प्रभाव का जो वर्णन कर दिया है, वह हृदय को प्रभावित करने के लिए काफी है। १२ कुंज लीला—कुंजलीला का वर्णन भी परम्परागत है। कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखि ! आज प्रातःकाल जब मैं कुंजगली मे निकली तो अचानक कृष्ण से भेंट हो गई। कृष्ण के मुख की मुस्कान मे मेरा मन इतना डूब गया कि उसकी छवि पर से हटाने से भी नही हटा। उस मुस्कान ने मेरे नयनों को बाँध लिया, चित्त को चुरा लिया और प्रेम का गहरा फंदा डाल दिया। इस प्रकार के वर्णन मे कोई नवीनता तथा मौलिकता नहीं है। १३ नटखट कृष्ण—इस शीर्षक के अन्तर्गत संकलित छंदों मे कृष्ण के नटखटपन का वर्णन है। यह वर्णन कही गोपियों की सहज स्वाभाविकता से परिपूर्ण है और कहीं तीक्ष्ण व्यंग्य से। कोई गोपी कृष्ण की भर्त्सना करती हुई कहती है कि हे कृष्ण ! तुम और किसी जगह से नही आये हो। तुम्हारा जन्म हमारे इसी गाँव मे हुआ है। बचपन मे हमने तुम्हे दूध पिला-पिलाकर माँ-बाप की तरह पाला है। उसी पहिचान और मर्यादा को तुम छोड़ना चाहते हो। तुम बचपन मे द्वार-द्वार पर नाचा करते थे और अब हमारे सामने अपनी आँखें नचा रहे हो। तुम्हे तुम्हारी माँ की सौगन्ध है, यदि तुमने हमारी मटकी उतारी। हमे न तो अपनी इस मटकी के उतर जाने का सोच है, न गोरस बिखर जाने का और न वस्त्रों के फट जाने का। हमे दुःख तो इस बात का है कि तुम हमारे होकर ही हमे इतना तंग करते हो। इन वाक्यो मे गोपियों के

समीक्षा भाग ३५ मन की सहज स्वाभाविकता वर्णित है। इसी प्रकार एक अन्य गोपी कृष्ण के नटखट व्यवहार की शिकायत अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण एक से बढ़कर एक शरारतियो को अपने साथ लेकर वन मे घूमता रहता है। वह जितनी शरारते करता है, उनका वर्णन नही किया जा सकता । वह न तो किसी की अनुनय-विनय पर ध्यान देता है और न किसी प्रकार की मान-मर्यादा की ही लज्जा करता है। आती-जाती गोपियो की दधि-मटकियाँ फोडकर उन्हे कृष्ण ने जिस प्रकार तग किया है, उस सबका वर्णन इस शीर्षक के अंतर्गत संकलित छन्दो मे मिलता है। १४. मुरली-प्रभाव - वैष्णव सम्प्रदाय के अन्दर मुरली को भगवान् की वशीकरण शक्ति माना गया है। कृष्ण जब भी मुरली बजाते है, तब जड और चेतन स्थिर बन जाते है। ब्रज की गोपियो की दशा तो विलक्षण ही हो जाती है। मुरली की ध्वनि सुनते ही गोपियाँ अपना काम करना छोड़ देती है, अतः दुहा हुआ दूध ठंडा पड जाता है, जामन दिया हुआ दूध रखा-रखा ही खटा जाता है। सभी के हाथ-पैर अपना-अपना काम करना छोड़ देते है। यह दशा नारियो की ही नही, बल्कि पुरुषो की भी हुई । कहने का भाव यह है कि सारा ब्रज ही व्याकुल हो गया । उसकी समस्त व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। इसी प्रकार एक अन्य गोपी मुरली-प्रभाव का वर्णन अपनी सखी से करती हुई कहती है कि चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखवाले, कामदेव के समान सुन्दर कृष्ण के मधुर वचनो ने मेरा मन मोह लिया है। उसकी बाँकी चितवन को देखकर मैं संज्ञाशून्य हो गई और कुल की मर्यादा छोड़ बैठी । इसीलिए गोपियाँ चाहती हैं कि कोई व्यक्ति कृष्ण के हाथ से बाँसुरी छीनकर उसे जला डाले, तभी वे उससे छुटकारा पा सकती है। कृष्ण अपनी बाँसुरी से इतना अधिक प्रेम करते है कि वे हर समय उसे अपने अधरो से लगाये रहते हैं। इससे गोपियो के मन मे बाँसुरी के प्रति ईर्ष्या-भाव उत्पन्न हो गया है। वे तो यह चुनौती भी दे देती हैं कि ब्रज मे या तो हम रहेगी या यह कृष्ण-प्रिया बाँसुरी ही रहेगी। इस प्रकार काफी विस्तार के साथ रसखान ने मुरली-प्रभाव का वर्णन किया है। १५. कालियदमन - कृष्ण की अन्य प्रमुख लीलाओ के अन्तर्गत कालिय- दमन लीला भी प्रमुख है। सूरदास ने इस लीला का विस्तार से वर्णन किया

३६ रसखान-ग्रन्थावली है, पर रसखान के इस विषय में केवल दो छंद ही प्राप्त हैं। एक छंद में यशोदा जी का विलाप है और दूसरे छंद में कृष्ण द्वारा नाग पर विजय कर लेने के कारण ब्रज-वासियों की प्रसन्नता को व्यक्त किया गया है । १६. चीरहरण — चीरहरण-लीला के अन्तर्गत रसखान का केवल एक छंद प्राप्त है । १७. प्रेमासक्ति — इस लीला के अन्तर्गत रसखान के ११ छंद उपलब्ध हैं । इन छंदों में कृष्ण के सौन्दर्य ने, उनकी क्रियाओं ने और उनकी मुरली की वशी- करण ध्वनि ने गोपियों को इतना आकृष्ट कर लिया है कि वे बिना कृष्ण के जल-रहित मीन की भांति छटपटाती रहती हैं। अपनी प्रेमावस्था का वर्णन एक गोपी अपनी सखी से करती हुई कहती है कि कृष्ण जब गाये चरा- कर सांझ को घर लौटते हैं तो उनकी मधुर वाणी, तीक्ष्ण कटाक्ष आदि मेरे हृदय पर इतना अधिक प्रभाव डालते हैं कि मैं यह सोचने लगती हूँ कि कितना अच्छा होता, यदि मेरा हृदय पृथ्वी का वह टुकड़ा होता जहां काछनी पहनकर कृष्ण क्रीड़ाएं किया करते हैं। इसी प्रकार एक अन्य गोपी कहती है कि जब से मैंने कृष्ण के मुकुट, मुरली, वनमाला को देखा है, तब से मैं उनमें इतनी आसक्त हो गई हूँ कि कुल तथा लोक की लाज का भी ध्यान नहीं करती । मैं ही क्या, ब्रज की समस्त गोपियों की यही दशा है। प्रेम का यह बंधन इतना दृढ़ हो गया है कि अब चाहे कोई लाख प्रयत्न करे, पर यह टूट नहीं सकता। वस्तुस्थिति तो यह है कि मैं कृष्ण के रंग में ऐसी रंग गई हूँ कि अब मेरे लिए अन्य कोई रंग ही शेष नहीं रह गया है । अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि रसखान ने प्रेमासक्ति का जिस प्रकार वर्णन किया है वह अत्यन्त स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक एवं परम्परागत है । १८. प्रेम-बंधन प्रेमासक्ति में आकृष्ट होने की भावना अधिक होती है। जब यह आकर्षण दृढ़ रूप धारण कर लेता है और हृदय पर अपना अधि- पत्य जमा लेता है तो बंधन का रूप बन जाता है। कहने का भाव यह है कि प्रेमासक्ति से अगला सोपान प्रेम-बंधन का है। जो गोपियां कृष्ण की ओर आकृष्ट हुई थीं, कालान्तर में वे ही उनके प्रेम में बंदिनी बन गईं । गोपियों की इस दशा का वर्णन रसखान ने बड़े ही कौशल के साथ किया है। गोपियां इस बंधन में इतनी जकड़ गई हैं कि वे प्रीति की रीति में लाज का कोई स्थान

समीक्षा भाग ३७ ही नही मानती । यह बधन उनके लिए भगवान् का दिया हुआ है, अर्थात् उनके भाग्य मे ही इस प्रकार बदिनी होना लिखा था, यही सोचकर गोपियाँ चुप रह जाती हैं, अपनी वदिनी-दशा के प्रति संतोष कर लेती है । उनकी दशा तो उन मधु-मक्खियों जैसी हो गई है जो अपने ही बनाये हुए शहद मे लिपट- कर असहाय-सी बन जाती है । गोपियाँ इस वधन से छुटकारा पाने मे स्वयं को असहाय और असमर्थ समझती है । इसी प्रसग के अन्तर्गत रसखान ने जलक्रीडा का वर्णन किया है । एक दिन सभी ब्रज-गोपियां यमुना मे स्नान करने के लिए जाती है, पर वहाँ पर कृष्ण को पहले से ही खडा देखकर वे ठिठक जाती हैं और दोनों ओर से दृग्-बाण चलने लगते है । गोपियाँ कृष्ण के प्रेम के बंधन मे इतनी अधिक बँध जाती हैं कि उन्हे लोक-लाज का भय नही रहता । वे तो इस बात के लिए कटिबद्ध हो गई हैं कि एक न एक दिन इस प्रेम का भडाफोड होगा, क्योकि चन्द्रमा को हाथ से छुपाया नही जा सकता, फिर डरने से अथवा लज्जित होने से कोई लाभ भी तो नही है । कृष्ण गोपियो के हृदय मे जिस बीज का वपन कर देते है, वह पूर्णतया अंकुरित होकर गोपियो को व्यथित कर देता है । रात-दिन आँखों से आँखे लडती है, प्रेम-व्यापार चलते है, पर कही भी न तो भय का प्रदर्शन होता है और न लज्जा का । जब सभी गोपियाँ पूर्णरूपेण कृष्ण के आधीन हो गई है तो फिर डर और लज्जा की बात ही क्या रह जाती है । कहने का भाव यह है कि इस प्रसग के अन्तर्गत रसखान ने गोपियो के विविध हावो तथा भावो का कुशलता से वर्णन किया है । १६. प्रेम-वेदना—‘प्रेम करि काहू सुख न लह्यौ’ फिर गोपियाँ किस प्रकार सुखी रह सकती थी । उनके हृदय मे रसखान बस गया और उसके कारण उन्हे जो पीडा हुई उसका अनुभव वे स्वय ही कर सकती थी, क्योकि घायल की गति को घायल ही जानता है । कृष्ण की मुस्कान और तान पर अपने प्राणो को न्यौछावर करनेवाली गोपियाँ समाज मे भी विमुख हुईं और कृष्ण का मनचाहा प्यार भी उन्हे न मिल सका । यही उनकी विवशता थी और यही समाज मे ख्वारी होने का कारण था । वे कृष्ण को भूलने का जितना प्रयत्न करती, वह उतना ही अधिक याद आकर पीडा को बढावा देना । फलतः किंकर्त्तव्यविमूढा होना स्वाभाविक ही था । वे क्या करे, क्या न करें, इसका

३८ रसखान-ग्रन्थावली उन्हें ज्ञान ही नही रहा। उन्हे ज्ञान रहा केवल कृष्ण की क्रीड़ाओं का । इसी दशा का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि आनंद-सागर कृष्ण का कुंज-कुंज मे घूमना, वंशी बजाना, गौओं को चराना, गोचारण के गीत गाना, प्रेम से दही मांगना और मुसकराकर देखना किस प्रकार भूला जा सकता है। इस प्रकार रसखान ने प्रेम-वेदना का मार्मिक और स्वाभाविक वर्णन किया है। २०. रासलीला-रसखान ने रासलीला का भी वर्णन किया है। इस विषय के इनके सात छंद उपलब्ध है। इस रासलीला का उद्देश्य भी गोपियों को अपने प्रेम के बंधन मे बाँधना है। फलतः जो भी गोपी रासलीला को देखती है, वह कृष्ण की ही होकर रह जाती है। सास चाहे जितना त्रास दे, ननद चाहे जितने व्यंग्य कसे, पर रासलीला की दिवानी गोपी तो उसमें सम्मिलित होकर ही रहती है। रासलीला के द्वारा कृष्ण ब्रज मे नवीन जीवन का संचार करते हैं। इसीलिए प्रत्येक गोपी अपनी सखी से आग्रह करती है कि वह रास- लीला मे अवश्य सम्मिलित हो और कृष्ण के सौन्दर्य को देखकर अपनी आँखो को लाभान्वित करे। वैसे, गोपियाँ स्वयं भी नही रुक पाती, चाहे उन्हे रोकने की जितनी चेष्टा की जाये, क्योकि कौवे की काँव-काँव से गारदागमन कभी नही रुका करता । २१ फागलीला-कृष्ण की लीलाओ के अन्तर्गत फागलीला का भी महत्व है। सभी भक्त-कवियो ने फागलीला का वर्णन किया है। इस विषय से सम्बद्ध रसखान के आठ छंद उपलब्ध हैं जिनमे विस्तार से इस लीला का हृदय- स्पर्शी वर्णन है। कृष्ण जब फाग खेलते है तो उस समय उनकी जो शोभा होती है, वह अवर्णनीय है। कृष्ण और गोपियाँ परस्पर पिचकारी चलाते है, एक दूसरे पर रंग डालते है, पर प्रेम की आग और अधिक प्रज्वलित हो जाती है उनकी तृप्ति होती ही नही। फागलीला के कारण ही ब्रज मे धूम मच जाती है। इससे कोई नही बच पाता, न तो नवेली गोपियां ही और न सलज्ज वनि ताएँ ही। सम्मान किसी का भी सुरक्षित नही रहता, अर्थात् सभी गोपिकाएँ लोक-लाज को तिलाजलि देकर फागलीला मे मस्त रहती है। २२. राधा-सौन्दर्य - प्रेम की परिपूर्णता के लिए यह आवश्यक माना गया है कि नायक की भाँति नायिका भी रूपवती तथा सुन्दर हो । इसीलिए रसखान ने

ग्यारह छंदो मे राधा के सौन्दर्य का वर्णन किया है। राधा रूप राशि है, उसके सौन्दर्य के कारण बरसाने मे सदैव आनंद की लहरियाँ तरंगित होती रहती है। घर-घर मे अपार कौतुक ओर रग का विस्तार रहता है। राधा-सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए कवि ने प्राय उपमा, उत्प्रेक्षा और सदेह अलकारो का प्रयोग किया है। यह प्रयोग परम्परागत है। राधा के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई एक गोपी राधा से कहती है कि तुम्हारा मुख इतना सुन्दर है जैसे अमृत-सार को सजोकर स्वयं चन्द्रमा उपस्थित हो गया हो। तुम्हारे शरीर का गठन ऐसा है जैसे सोने मे मणि-मुक्ताओ को जडने के लिए कुशल जडिया यौवन ने सुन्दर घर (रत्न जडने का गहरा चिन्ह) बना लिया हो। तुम्हारे अधरो की लाली काम-कामना जैसी सुशोभित है। तुम्हारी नासिका का छिद्र उस भौंरे के समान है जिसमे ज्ञान की नौका का गर्व नष्ट हो जाता है। कहने का भाव यह है कि राधा के सौन्दर्य का वर्णन नही किया जा सकता। नक्षत्रो की अनुपम प्रभा राधा-सौन्दर्य का कुछ-कुछ बोध करा सकती है। २३. मानवती राधा—प्रेम की परिपुष्टता के लिए आचार्यो ने मान को आवश्यक साधन माना है। जिस प्रकार रंग मे पुट लगाने से रंग का रग गहरा और पक्का हो जाता है, उसी प्रकार प्रेम मे मान करने से प्रेम मे दृढता आती है। रसखान ने भी उसका पालन किया है। मानवती का मान भग करने का उत्तरादायित्व उसकी सखियो पर होता है। वे अनेक प्रकार के साधनो का अवलम्बन लेकर अपने कार्य मे प्रवृत्त होती है। मानवती राधा को उसकी एक सखी समझाती हुई कहती है कि हे राधा ! जिस कृष्ण पर चारो ओर के राजाओ की स्त्रियाँ अपने प्राणो को न्यौछावर करती हुई नही थकती और भूमडल की सभी स्त्रियाँ जिसे प्राप्त करने के लिए सदैव आकुल रहती है, उसके प्रति तुम्हारा मान धारण करना उचित नही है। इसी प्रकार एक अन्य सखी राधा से कहती है कि यदि आनंद-सागर कृष्ण तेरे मान के कारण डर जाये तो तुझे अपना मान छोड देना चाहिए। यदि तुम मान नही छोड सकती तो कृष्ण से प्रेम करना छोड दो और यदि तुम प्रेम करना नही छोड सकती तो मान छोड़ दो। कृष्ण तुम्हारे मान से बहुत दु खी है और बेचारे हाथ मल रहे हैं। इसी प्रकार के अन्य वाक्य कहकर गोपियाँ राधा से मान छोडने के लिए आग्रह करती है। यह रीति परम्परागत है।

४० रसखान-ग्रन्थावली

२४. सखी-शिक्षा- साहित्यिक परम्परा के अंतर्गत सखी-शिक्षा का विषय भी सन्निहित है । जो सखी प्रौढ होती है, जिसे प्रेम-संसार के समस्त अनुभव होते हैं, वह अपनो मुग्धा सखी को-जिसने अभी-अभी प्रेम-जगत् मे प्रवेश किया है और जो प्रेम-रहस्यो से अपरिचित है-शिक्षा दिया करती है । इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य उन साधनो को बताना होता है जिससे प्रियतम वश मे किया जा सकता है । रसखान ने भी इस परम्परा का पालन किया है । कोई सखी अपनी सखी को कृष्ण से मिलने के लिए प्रेरित करती हुई कहती है कि हे सखि ! वह वही कृष्ण है, जो रासलीला मे तनिक नाचकर सबको नचाया करता है । वह ही आनन्द सागर कृष्ण है जो अनेक मनुहारे करने पर भी पलभर के लिए भी धीगा नही देखता । न जाने तुझमे वह कौनसे मनोहर भाव देखकर तेरी ओर आकृष्ट हुआ है , अत इस अवसर को हाथ से न जाने दे और तुरन्त उससे मिल । कही-कही सखी अपनी सखी को सुरक्षा के उपाय बनाती है । एक गोपी अपनी सखी से कृष्ण के प्रति सचेत रहने के लिए कहती है कि हे सखी ! मेरी बात को ध्यान से सुनो । जिम गली मे कृष्ण अपनी बाँसुरी बजाता हुआ गाता है, उस गली बिल्कुल मत जाओ क्योकि देखते ही वह प्राणो को हर लेता है और फिर गोपियाँ बेचारी प्रेम की विपत्ति लेकर ही अपने घरो को लौटती है उसने अपनी बाँसुरी की तानो का ब्रज मे तान तान रखा है। अत मैं तुमसे ज्ञान की बात कहती हूँ कि बहुत सोच-समझकर पैर रखो, क्योकि वह कृष्ण युवती को अपने जाल मे इस प्रकार फंसाता है जिस प्रकार चारा देकर मछली को फँसाया जाता है इसी प्रकार की अनेक शिक्षाएँ सखियो द्वारा अपनी- अपनी सखियो को दी गई है। २५ संयोग वर्णन - सयोग-वर्णन के अर्न्तगत राधा और कृष्ण के मिलन का विशेष रूप से वर्णन किया गया है । यह वर्णन पर्याप्त विस्तृत है मिलन- सुख के अनेक चित्र रसखान ने प्रस्तुत किये हैं, यहाँ तक कि सुरतात चित्रो को भी चित्रित करने मे इन्होने हिचक नही दिखाई है । हिचक का कोई कारण भी नही है, क्योकि भक्तिरस के अन्तर्गत चित्रित किया हुआ शृंगार रस अलौकिक होता है, लौकिक नही । हिचक लौकिक शृंगार मे होती है । फिर ऐसे चित्रो मे रसखान ने काफी सयम से काम लिया है। सुरतात का वर्णन करती हुई एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि चतुर बाला अत्यन्त प्रसन्नता

समीक्षा भाग ४१ के साथ अपने प्रियतम को छाती से लगा सोई हुई थी । उसके खुले हुए केश बाहर निकल कर हिल रहे थे । उसकी शोभा को देखकर कामदेव तिरस्कृत हो रहा था । प्रिय के साथ आनंद मे डूबी रहकर रातभर जागने की वात का पता उसकी आँखो से चल रहा था । उसका अलसाया हुआ मुख, लाल आँखो के सफेद कोए और रातभर जागने के कारण जम्भाई के कारण निकले हुए आँसू ऐसे प्रतीत होते थे मानो चन्द्रमा पर विम्ब, विम्ब पर कुमुद और कुमुदय पर मोती हो । यह वर्णन काफी संयत है । इसमे विद्यापति और सूरदास जैसी असंयमता नही है । २६. वियोग वर्णन—संयोग के पश्चात् वियोग अवश्यम्भावी है । रसखान का वियोग-वर्णन काफी मार्मिक और स्वाभाविक है । वियोग-वर्णन मे प्रकृति का उद्दीपन रूप मे चित्रण करने भी जो परिपाटी चली जा रही है, रसखान ने भी उसका अनुसरण किया है । विरहिणी गोपी अपनी सखी से कहती है कि सारे बागो मे फूल खिल गये है । बसन्त के आगमन के कारण भौरे उन पर गूँज रहे है । कोयल की कू-कू सुनकर सबके प्रियतम विदेश से वापिस लौट रहे है । लेकिन मेरे आनन्द-सागर कृष्ण इतने निष्ठुर है कि मेरी विरह-वेदना की तनिक भी चिन्ता नही करते । जब कोयल बोलती है तो उसकी कूक हृदय मे वरछी के समान लगती है । इसी प्रकार का आगतपतिका का चित्रण है—वह गोपी अपने प्रियतम के वियोग से इतनी दुखी थी कि उसके शरीर की शोभा भी मद पड गई थी । उसका कमल जैसा मुख भी मुरझा गया था । उसके हृदय की साँसे लपट बनकर जलने लगी थी । इसी बीच उसने अपने प्रियतम के आगमन की खबर सुनी । वह इतनी प्रसन्न हुई कि उसकी कंचुकी की दृढ डोर भी कस- मसाने लगी । उसका शरीर इस प्रकार शोभायुक्त हो उठा, मानो दीपक की बत्ती को उसका दिया गया हो । लेकिन सर्वत्र ऐसी स्वाभाविकता एव मार्मिकता रसखान के वर्णन मे नही मिलती ! कही-कही ऊहात्मक चित्र भी आ गए है। यथा—कोई गोपी अपनी सखी से अन्य विरहिणी गोपी की विरह-दशा का वर्णन करती हुई कहती है कि जब उसके शरीर मे वियोग की आग बहुत अधिक बढ गई तो वह उसे शान्त करने के लिए यमुना जल मे कूद पडी । विरह की आग के कारण यमुना का जल सूख गया और मछलियाँ जल के

४२ रसखान-ग्रन्थावली अभाव के कारण यमुना के तल मे बैठ गई । उस आग के कारण जब यमुना का पानी खौलने लगा तो उसकी गर्मी से पाताल-लोक मे स्थित शेषनाग भी जलने लगा । पर ऐसे वर्णन परम्परागत ही समझने चाहिए । २७. सपत्नी भाव—इस प्रसग की अवतारणा नारियो के मन की स्वाभा- विकता को चित्रित करने के लिए की गई है । नारी यह सहन नही कर सकती कि उसके प्रिय को,अन्य कोई नारी भी प्रेम करे । यदि ऐसा होता है तो उसके मन मे जलन होती है । इसी जलन को सपत्नी-भाव कहते है । कृष्ण-काव्य मे कुब्जा को लेकर ही इस भाव की अभिव्यक्ति की गई है । रसखान ने भी इस परम्परा का अनुसरण किया है । इनकी गोपियाँ उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! उस आनन्द सागर कृष्ण के गुणो को सुनकर हमारा हृदय सौ-सौ टुकड़े होकर फट गया है । हम नही जानती कि कौनसा मंत्र पढकर कुब्जा ने कृष्ण पर चला दिया है । हम अपने मन मे विचार कर यह बात सत्य कहती है और जानती है कि कृष्ण ने इस प्रकार से कितना यश प्राप्त किया है ? अर्थात् वे बहुत बदनाम हो गये है, क्योकि ब्रज के सब नर-नारी यह कहते है कि कृष्ण कुब्जा के दाम बन गए है । कही-कही यह सपत्नी-भाव आक्रोश के रूप मे फूट पडा है । एक गोपी कहती है कि वह कुब्जा यहाँ पर होती तो उसे लात घूँसे मारती और उसका शरीर चोट लेती । अपने हृदय का सारा गुस्सा निकाल लेती और उमकी नाक को छेदकर उसमे कौडी पहना देती । उस रांड को मै ऐसा नाच नचाती कि उसे कृष्ण को रिझाने का फल मिल जाता । २८ कुवलयापीड-वध—सभी कृष्ण भक्त-कवियो ने कृष्ण के अलौकिकत्व का प्रतिपादन करने के लिए इस कथा का वर्णन किया है । रसखान ने इस परम्परा का निर्वाह केवल एक छंद से ही कर दिया है । २६ उद्धव उपदेश—इस शीर्षक के अन्तर्गत रसखान के चार सवैये उपलब्ध है । कथा परम्पागत है । उद्धव गोपियो को निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने के लिए आते है और गोपियाँ उनकी परिहासपूर्ण भर्त्सना करती है । ३० ब्रज-प्रेम—इस विषय के दो छंद रसखान के मिले है । कृष्ण को द्वारिका मे रहकर ब्रज की याद आती है और वे अपनी वेदना की अभिव्यक्ति अपनी रानी रुक्मणी से करते है ।

समीक्षा भाग ४३

३१. गंगा महिमा—इस विषय के रसखान के दो छंद हैं जिनमें गंगा की महिमा का वर्णन किया गया है। ३२. शिव-महिमा—इस विषय का केवल एक छंद प्राप्त है जिसमें शिव की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। यही सुजान रसखान का प्रतिपाद्य है। इस प्रतिपाद्य पर दृष्टि डालने से यह अनायास ही सिद्ध हो जाता है कि अपने काव्य के उपलब्ध लघु कलेवर में भी रसखान ने उन सभी विषयों को समाविष्ट करने का प्रयास किया जो कृष्ण- काव्य के लिए महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है। इस प्रतिपाद्य को देखते हुए यह अनुमान लगाना असंगत नहीं कि रसखान के अभी बहुत सारे छंद ऐसे हैं जो प्राप्त नहीं हुए, क्योंकि रसखान जैसा भक्त और भावुक कवि कृष्ण-विषयक किसी-किसी लीला का एक-दो छंदों में ही वर्णन करके रह जाये, यह बात मान्य नहीं है। 'भक्तमाल-प्रदीपन' में रसखान के सहस्रों कवित्तों का उल्लेख है। इसका तात्पर्य यह है कि उस समय रसखान के निश्चय ही हजार के लगभग (हजार से कुछ थोड़े अथवा कुछ अधिक) छंद अवश्य प्रचलित रहे होंगे। जो कवि केवल प्रेम को लेकर ही एक पुस्तक की रचना कर सकता है, उसने निश्चय ही कृष्ण-लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया होगा। रसखान के भक्तिकाल की लम्बी अवधि भी इस अनुमान की पुष्टि करती है। अतः जब तक रसखान के अन्य छंद प्राप्त नहीं हो जाते, तब तक उपलब्ध छंदों पर ही परितोष करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। प्रेम-वाटिका— रसखान की दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति प्रेम-वाटिका है जिसमें ५३ दोहों में प्रेम के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस स्वरूप का उल्लेख करने से पूर्व प्रेम-वाटिका की प्रामाणिकता पर विचार कर लेना आवश्यक है। अनेक विद्वानों की यह धारणा है कि प्रेम-वाटिका रसखान द्वारा रचित नहीं है और इस धारणा का मुख्य आधार प्रेम-वाटिका की किसी हस्तलिखित प्रति का प्राप्त न होना है। श्री बटेकृष्ण ने अनेक उक्तियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह कृति किशोरीलाल गोस्वामी (प्रेम-वाटिका के सर्व प्रथम सम्पादक) की है। श्री बटेकृष्ण के तर्क ये हैं—

४४ रसखान-ग्रन्थावली

१ प्रेम-वाटिका का एक दोहा यह है— 'कमल तन्तु सो छीन अरु, कठिन खडग की धार । अति सूधो टेढो बहुरि, प्रेम-पंथ अनिवार ॥' इसी भाव से मिलता-जुलता बोधा कवि का यह सवैया है— 'अति खीन मृनाल के तारहु ते, तिहि ऊपर पाँव दै आवनो है । सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीत को टाडो लदावनो है । कवि बोधा अनी घनी तेजहुँ ते, चढि तापै न चित्त डिगावनो है । यह प्रेम को पथ करार महा, तरवार की धार पै धावनो है ॥' इस तुलनात्मक अध्ययन से श्री वटेकृष्ण का यह अनुमान है कि प्रेम- वाटिका की रचना बोधा के पश्चात् हुई है। शिवसिंहसरोजकार के अनुसार बोधा का जन्म-काल संवत् १८०४ है। आचार्य शुक्ल ने इनका कविता-काल संवत् १८३० से १८६० तक माना है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रेम-वाटिका की रचना संवत् १८६० के पश्चात् हुई । २ अपनी इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए श्री वटेकृष्ण ने प्रेम-वाटिका के इस दोहे की ओर संकेत किया है— 'बिधु सागर रस इन्द्र सुभ, वरस सरस रसखान । प्रेम-वाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखान ॥' और इसमे 'रस' शब्द को ६ अंक का संकेत मानकर प्रेम-वाटिका का रचनाकाल संवत् १६७१ निर्धारित किया है । श्री वटेकृष्ण की यह मान्यता संगत नही है। जहाँ तक पहले आक्षेप का सम्बंध है, उसके प्रत्युत्तर मे दो बाते कही जा सकती हैं। पहली बात तो यह है कि रसखान ने बोधा के सवैया से भाव-ग्रहण किया है, बोधा ने रसखान के दोहे से नही, इस बात का क्या प्रमाण है ? दूसरी बात यह कि स्वच्छन्द धारा के कवियो ने प्रेम को 'टेढा', 'सोधा', 'खडग की धार' आदि बताया है। उदा- हरण के लिए घनानन्द का यह सवैया देखिए— 'अति सूधो सनेह को मारग है, जहा नेकु सयानप बाँक नही । तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपौ, झझकैं कपटी जे निसॉक नही ।

समीक्षा भाग ४५ घनानन्द प्यारे सुजान सुनो, इत एक ते दूसरो आँख नही । तुम कौन धौ पाटी पढे हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नही ।' कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम-वाटिका मे बोधा के भावो को ग्रहण नही किया गया । प्रेम-वाटिका मे प्रेम का दार्शनिक निरूपण है, बोधा मे इस दृष्टि का अभाव है । अत. इस दृष्टि से भो बोधा का काव्य प्रेम-वाटिकाकार का उपजीव्य-काव्य नही हो सकता । डॉ० याज्ञिक के शब्दो मे - 'प्रेम-वाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे ही हुई' इस तथ्य पर संदेह करना असगत है । जो पुस्तक पहली बार सवत् १६४८ के आस-पास और दूसरी बार संवत् १६६३-६४ मे प्रकाशित हुई, उसकी रचना सवत् १६७१ मे कैसे मानी जा सकती है ? जिस पुस्तक की खडित प्रति भारतेन्दु के पास थी और जिसके आधार पर सवत् १६३० मे 'प्रेम-सरोवर' की रचना हुई । उसकी रचना संवत् १६२२ मे जन्म लेने वाले गोस्वामी जी कैसे कर सकते थे ? सार की बात यह है कि प्रेमवाटिका की रचना रसखान द्वारा सवत् १६७१ मे हुई थी । इस ग्रन्थ के ५३ दोहो मे से लगभग १० मे रसखान छाप की श्लिष्ट अथवा स्पष्ट कवि नाम रूप मे है । प्रेमवाटिका की प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई कारण हमे दिखाई नही पडता ।' प्रेमवाटिका का प्रतिपाद्य प्रेम है । इसे रूपकत्व प्रदान करने के लिए राधा और कृष्ण को मालिन-माली का जोडा माना गया है । इसमे रसखान जी ने प्रेम के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया है । इनका मत है कि सच्चा प्रेम अकारण होता है, उसमे किसी आकर्षक साधन की आवश्यकता नही । इसीलिए माता, पिता, पुत्र, स्त्री आदि के प्रति जो प्रेम किया जाता है वह विशुद्ध नही है । विशुद्ध प्रेम के स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है कि यह अनुपम, अमित और सागर के समान होता है । जो व्यक्ति एक बार इस प्रेम को प्राप्त कर लेता है, वह फिर इसे नही छोड़ पाता । श्रुति, पुराण, आगम- स्मृति आदि सभी प्रेम के मार है । प्रेम ही साधना का आधार है, क्योकि हृदय, कम और उपासना ये सब अहकार के मूल है । जब तक हृदय मे प्रेम का अंकुर अंकुरिन नही होता, तब तक ज्ञान आदि व्यर्थ है और ये साधना मे किसी प्रकार भी सहायक नही हो सकते । प्रेम ही भगवान् का स्वरूप है । जिस प्रकार भगवान् के स्वरूप का वर्णन नही किया जा सकता, उसी प्रकार

४६ रसखान-ग्रन्थावली प्रेम भी अवर्णनीय है। जो व्यक्ति प्रेम-पाश मे बँधकर मर जाता है, वह अमर हो जाता है। प्रेम के विविध रूप हैं। इसीलिए कोई इसे फाँसी कहता है, कोई तलवार, कोई नेजा, कोई भाला, कोई तीर और कोई प्राणरक्षक अनोखी ढाल। इसीलिए प्रेम को सब प्रकार की युक्तियो मे श्रेष्ठ माना गया है। इसी प्रेम के नियमो से ही ससार का चक्र चल रहा है। प्रेम मे इतनी शक्ति होती है कि स्वयं भगवान् भी इसके आधीन रहते है। रसखान ने गोपियो के प्रेम को आदर्श प्रेम माना है। कहने का भाव यह है कि प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट सत्ता है और यही जड-चेतन समस्त पृथ्वी का नियामक है। दानलीला दानलीला के ११ छंद प्राप्त है। डॉ० याज्ञिक इसे संदिग्ध रचना मानते है। अपनी मान्यता का आधार वे इन शब्दो मे प्रस्तुत करते हैं— १. स्व-रचित छंदो मे अपना कवि-नाम देने की प्रवृत्ति रसखान मे विशेष रूप से पाई जाती है। रसखान के छाप-रहित सवैया संख्या मे नगण्य ही है, किन्तु दानलीला के ११ छंदो मे केवल एक ही छंद मे 'रसखान' शब्द आया है। 'प्रेमवाटिका' के ५३ दोहो मे भी १० वार श्लिष्ट अथवा स्पष्ट नाम मे कवि की छाप मिलती है। २. इस छंद मे 'रसखानि' शब्द का प्रयोग कृष्ण की उक्ति में राधा को संबोधन करते हुए किया है। रसखान कवि ने अपने मुक्तको मे 'रसखानि' शब्द का श्लिष्ट प्रयोग जहाँ कही किया है, कृष्ण के अर्थ मे किया है, राधा के लिए नही। ३. रसखान कवि मुख्यतः सवैयाकार है। घनाक्षरी का उपयोग तो बहुत थोडा किया गया है। यह प्रवृत्ति दानलीला मे नही देखी जाती, उसमे घना- क्षरी का उपयोग तो सवैया से भी अधिक हुआ है। ४ रसखान के मुक्तक छंदो मे कृष्ण ने राधा अथवा अन्य गोपियो को सम्बो धित करते हुए एक शब्द भी नही कहा है। रसखान की गोपियो के प्रति कृष्ण सदैव मौन ही रहे है, परन्तु दानलीला के कृष्ण मुखर है। यह बात रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही है। ५. रसखान के मुक्तको मे दानलीला-सम्बन्धी कुछ उत्कृष्ट और लोकप्रिय छंद मिलते हैं। ये छंद राधा अथवा गोपियो की कृष्ण के प्रति उक्तियां है जो

समीक्षा भाग ४७ संवादात्मक कथोपकथन के रूप मे है। यदि दानलीला वास्तव मे रसखान रचित है तो ये छंद उसमे क्यों नही स्थान पा सके ? जिस दानलीला मे रस- खान के तद्विषयक लोकप्रिय उत्कृष्ट छंदो मे से एक भी न हो, उसे रसखान रचित मानने मे संकोच होना स्वाभाविक है। इस प्रकार के छंदो के प्रतीक निम्नलिखित है— (१) दानी भये नये माँगत दान सुनै जु तै कस तो बाँधे न जैहौ। रोकत हो बन मे रसखान पसारत हाथ महा दुख पैहौ। टूटै घरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै धरि दैहौ। जै है अभूषन काहु सखी को तो मोल छला के लला न बिकैहौ ॥ (२) छीर जो चाहत चीर गहे ए जु लेहु न केतिक छीर अँचैहौ। चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ। जानति हौ जिय की रसखान सु काहे को एतिक बात बढ़ैहौ। गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्ह जु नेकु न पैहौ ॥ (३) नागर छैल है गोकुल मे पग सेकत सग सखा ठिग तै हैं। जाहि न ताहि दिखावत आँख सुकैन गई अब तोसो करै है। हाँसी मे हार हर्यो रसखान जु जो कहूँ नेकु तगा टुटि जै है एक ही मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहिं हाट बिकै है ॥ ६ म्युनिसिपल म्यूजियम, प्रयाग की प्रति मे 'दानलीला' के वास्तविक रचियता विषयक कोई सकेत नही है। सभा की खोज के विवरणकार ने इसे रसखान रचित माना है, किन्तु यह मान्यता निराकार जान पडती है। सार यह है कि जब तक कोई पुष्ट प्रमाण प्राप्त न हो, इस दानलीला को रसखान-रचित मानना ठीक नही कहा जा सकता। डॉ० याज्ञिक के ये तर्क काफी सबल है। प्रस्तुत दानलीला की भाषा को देखते हुए भी ऐसा ही लगता है कि ये छंद रसखान द्वारा रचित नही हो सकते। 'पर यहाँ पर एक समस्या और उत्पन्न हो जाती है। सुजान-रसखान मे अब तक

४८ रसखान-ग्रन्थावली जितने छंदो का सग्रह किया गया है, वे छंद इस बात के साक्षी हे कि रसखान कृष्ण भक्ति-विषयक धारा के पूर्णतया अनुसरणकर्ता है। दानलीला इस धारा का प्रमुख प्रतिपाद्य है । सूरदास ने इस लीला का वर्णन बहुत ही विस्तार से किया है। उसके कुछ पद यहाँ उद्धृत करना आवश्यक जान पड़ता है— ग्वालिनि यह भली नहिं करति । दूध दधि घृत [नितहिं बेचति, दान देत डरति । प्रात ही लै जाति गोरस, बेचि आवति राति । कहौ कैसे जानियै तुम, दान मारे जाति । कालिंदी-तट स्याम बैठे, हमहि दियो पठाइ । यह कह्यौ हरि दान मागहु, जाति नितहि चुराइ । तुम सुता ब्रजभानु की, वै बडे नंद-कुमार । सूर प्रभु को नाहिं जानति, दान हाट वाजार । × × × यह सुनि हँसी सकल ब्रजनारि । आइ सुनी री बात नई इक, सिखए हैं महतारि । दधि माखन खैबे कौं चाहत, मागि लेहु हम पास । सूधै बात कहौ सुख पावै, बांधन कहत प्रकास । अब समझी हम बात तुम्हारी, पढे एक चटसार । सुनहु सूर यह बात कहौ जानि, जानती नंदकुमार ॥ × × × दान दिये बिनु जान न पैहौ । जब दैहौ ढराइ सब गोरस, तबहिं दान तुम दैहौ । तुमसो बहुत लेन है मोंकौं, पहिलै ताति सुनाऊँ । चोरी आवति बेचि जाति हौ, पुनि गोरस कहँ पाऊँ । मांगति छाय कहा दिखराऊँ, को दही हमकौं जानत । सूर स्याम तब कयौ ग्वालि सा, तुम मोकौं नहिं मानत ॥ × × ×

समीक्षा भाग ४६ कहा हमहिं रिस करत कन्हाई । यह रिस जाइ करौ मथुरा पर, जहँ है कंस कन्हाई । ‘ अब हम कहां जाइ गुहरावैं, बसति तिहारै गाउँ । ऐसे हाल करत लोगनि के, कौन रहै इहि ठाउँ । अपने घर के तुम राजा हो, सब का राजा कंस । सूर स्याम हम देखत बाढे, अब सीखे ये गंस । ✕ ✕ ✕ मौसौ बात सुनहु ब्रज-नारी । इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसो कहौ उघारी । कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी । जोइ मन करै सोइ करि डारै, मूँड़ चढ़त है भारी । बात कहत अठिलाति जाति सब, हँसति देत कर तारी । सूर कहा ये हमकौ जानै, छाँछहि बेचनहारी ॥ ✕ ✕ ✕ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । धेनु दुहत तुमकौ हम देखति, जबहिं जाति खरिकहि उत । चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर घर ढूँढत भाँडे । मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छांड़े । और सुनो जसुमति जब बाँधे, तब हम कियौ सहाइ । सूरदासप्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥ कृष्ण-भक्तो की भाँति स्वच्छंद काव्यधारा के कवियो ने भी इस लीला का वर्णन किया है। घनानद ने ‘दानघटा’ शीर्षक के अर्न्तगत इस विषय के १६ छंद लिखे हैं। ‘दानघटा’ और रसखान की ‘दानलीला’ मे बहुत अधिक साम्य है, अतः यहाँ ‘दानघटा’ के समस्त छंदो को उद्धृत करना आवश्यक प्रतीत होता है। ये छंद इस प्रकार हैं— सवैया गोपी— छैल नए नित रोकत गैल सु फैलत कापै अरैल भए हो । लै लकुटी हँसि नैन नचावत चैन रचावत मैन-तए हो ।

५० रसखान-ग्रन्थावली लाज अँचे बिन काज खगो तिनही सी पगो जिन रग रए हौ । ऐंड सबै निकसैगी अबै घनआनंद आनि कहा उनए हौ ॥ १ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — है उनए सु नए न कछू उघटै कित ऐंड घमंड अयानी । बैन बड़े बड़े नैनन के बल बोलति है क्यों इती इतरानी । दान दिये बिन जान न पाइ है आइ है जो भलि खोरि विरानी । आगे अछूती गई सो गई घनआनंद आज भई मनमानी ॥ २ ॥ सवैया गोपी — जाइ करो उहि माय पै लाड़ बढ़ाय बढ़ाय किये इतने जिन । भीत की दौरनि खोरनि है मठता हठ ओरनि सो समझे बिन । दान न कान सुन्यो कवहूँ कहूँ काहे को कौनै दयौ सु लयो किन । तौड़िक लै घनआनंद डाटत काटत क्यो नही दीनता सो दिन ॥ ३ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — देहिगी दान जो ऐहै इतै नही पैहै अबै सु किये को सबै फल । बावा दुहाई सुहाई करो जिय जानि कै मानि छुटै न कियें छल । एक ही ओल दै जाहु चली झगरो सगरो मिटि बात परैं सल । नांव पर्यो अबला घनआनद ऐंठति ण्ठति माँहु किते बल ॥ ४ ॥ सवैया गोपी— जीभ सम्हा रे न बोलति हो मुँह चाहत क्यों अब खायां थपेरे । ज्यों उगी करी कछु कानि-कनौड त्यों मूढ चढे बढे आवत नेरै । खाय कहा फल माय जने जिम देखी विचारि पिता-तन हेरै । कज-कनेरहि फेर बडो घनआनद न्यारे [रहो कतौ टेरै ॥ ५ ॥ सवैया श्रीकृष्ण— लेहु भया गहि सीसन ते दधि की मटुकी अब करनि करो कित । जैसे सो तैसे भए ही बनै घनआनद घाम घरो जित की तित ।

समीक्षा भाग ५१ एकहि एक बराबरि जाहु करौ अपने अपने चित को हित । फोरि कै क्यौ दुहूँ हाथ सकेदियै जौ बिधना घर बैठे दयो बित ॥ ६ ॥ सवैया गोपी— गोद भरै बित घाम कै जाय घरौ गहि गोद सो माय के आगै । पेट परे को लखै फल ज्यौं निपजै हौ सपूत सु भागनि जागै । बाँटिहै बोलि वधाई कमाई की जाति मैं जाते महा पति पागै । वास दिये को यहै गुन है घनआनंद जो छिन दोप न लागै ॥ ७ ॥ सवैथा मधुमंगल— नंद लला रससागर सों ललिता रिस की सलिला न बढैयै । नागरि आगरि हौ सबु भाँति तुम्हें अब कौन सी बात पढैयै । चोखन तोष नहि उपजै घनआनद क्यौ गुन दोष कहैयै । नेकु ढरे सुधरै सब काज अकाज इतो अपलोक चढ़ैयै ॥ ८ ॥ सवैया ललिता— सुनि रे मधुमंगल । दान-कथा सु जथारुचि होत वृथा हठ है । कर ओड़ि दिखाय दया मृदु है चलियै बहु भाँति बिनै करि नै । घनआनंद ऐंठ अमैठ किये कहा पैयत है रिझवारन पै । गुन गाय रिझयावहु देहि अबै बृषभानलली की निछावर कै ॥ ६ ॥ सवैया सखा— स्याम सुजान सबै गुनखानि बजावत बैन महा सुर साँचनि । अंग त्रिभंग अनंग-भरे दृग भौह नचाय नचावत नाँचनि । कीरतिदा कुलमंडन जौ निरखै भरि नैन बढै सुख-माँचनि । दान हँसे चुकि है घनआनंद रीझ नही सकि है हित-आँचनि ॥ १० ॥ सवैया सखी— आयो सखी चलि कुंज मै बैठि लखै घनआनद की सुघराई ।

५२ रसखान-ग्रन्थावली पाठन देहिं न एक सखै अकिले इन्हें छेकि करै मनभाई । भावती टेक रही बहु भाँति किये न बनै अति ही कठिनाई । लेता हौं राधे बलाय कठ्यौ करि आज मनौ इतनी हम पाई ॥ ११ ॥ राजदुलार भरी इकसार सुभाय मथे मन डारति पी को । कु ज चली सुखपुंज अली सग भाल विराजत लाज को टीको । लोचनि-कोरनि घोरनि छुवै मुसिकानि मैं व्हैं दरसै हित ही को । बोलनि बापुरी डारियै वारि लखै घनआनंद रूप लली को ॥ १२ ॥ रंग रह्यौ सुन जात कह्यौ उनह्वौ सुखसागर कुंज मैं आएँ । फैलि पर्यो रस को फगरो अति ही अगरो निबटै न चुकाएँ । काहूँ संभार रही न पटू तन कौ तन मै घनआनंद छाएँ । प्रेम-पगे रिझवारन की तहँ रीझ कै रीझ ही लेत बलाएँ ॥ दोहा दानघटा मिलि छवि-छटा, रसधारनि सरसाय । जियत पियत और न छियत, रसिक-पपीहा पाय ॥ १४ ॥ दानघटा-रसपान के, चातक रसिक सुजान । चखनि लखत चसके चखत, रखत तृषित ही कान ॥ १५ ॥ दानघटा सीचत सदा, मधुर केलि नव वेलि । आलवाल पचि रचि सुमन, लेत रसिक रस केलि ॥ १६ ॥ इन उद्धरणो को उद्धृत करने से हमारा तात्पर्य केवल यह दिखाना है कि कृष्ण-काव्य के रचयिताओ मे दानलीला का वर्णन करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परम्परा थी । रसखान ने भी इस परम्परा का निश्चय ही पालन किया होगा । इनके नाम से जो दानलीला मिलती है, यद्यपि कुछ बातो को देखते हुए वह रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही जान पडती, तथापि यह कहने मे सकोच नही होता कि अनेक बातो मे यह परम्परा की प्रवृत्तियो का अनुसरण करती है, जैसा कि उपर्युक्त सूरदास और घनानन्द के छंदो से प्रकट होता है । इसे रसखान द्वारा विरचित न मानने के दो ही कारण प्रबल है— १ इसकी भाषा रसखान की भाषा से मेल नही खाती । २. सुजान-रसखान मे अनेक पद ऐसे है जो दानलीला से सम्बधित है और उनका इसमे समावेश नही किया गया ।

समीक्षा भाग ५३

इन कारणों का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है— १. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, किसी भी लोकप्रिय कार्य की भाषा का वही रूप नही मिलता, जो उसने अपनाया है। उनकी भाषा को उनके प्रशंसकों ने अपने अनुसार मोड दे दिये है। उदाहरण के लिए मीरा को लिया जा सकता है। मीरा की भाषा तो अपने मूल स्वरूप को ही छोड़ गई है। उदा- हरण के लिए ये पद देखिए— 'म्हाँ गिरधर रग राती, सैया म्हाँ ।। टेक ।। पचरग चोला पहर्या सखी म्हाँ, झिरमिट खेलण जाती। याँ झिरमिट माँ मिल्यो साँवरो, देख्यां लग मण राती। जिणरो पिया परदेश बस्याँरी, लिख-लिख भेज्याँ पाती। म्हारा पियां म्हारे हीयडे बसताँ, णा आवाँ णा जाती। मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, मग जोवाँ दिण राती ॥ × × × × 'मैं गिरधर रंगराती, सैयाँ मैं ।। टेक ।। पचरंग चोला पहर सखी मैं झिरमिट खेलन जाती। ओह झिरमिट माँ मिल्यो सांवरो खोल मिली तन गाती। जिनका पिया परदेश बसत है, लिख-लिख भेजे पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, का कहूँ आती जाती ॥' एक ही पद की इन दोनों भाषाओ मे आकाश-पाताल का अन्तर है। इसी प्रकार रसखान की भाषा के विषय मे भी कहा जा सकता है कि दानलीला के पदो की भाषा और प्रवृत्ति मे इतना परिवर्तन होना असभव नही है। श्रुति-पथ से चलनेवाली भाषा का एक रूप रहता भी नही है। २ जहाँ तक दूसरे कारण का सम्बन्ध है, इसके विषय में यह कहा जा सकता है कि रसखान ने स्वयं किसी संकलन की योजना नही की। इनके भक्तो ने ही इनके छंदो का सकलन किया है। पहले दानलीला से सम्बन्धित कुछ ही पद मिले होगे जिन्हे सुजान-रसखान मे संग्रहीत कर दिया गया होगा और बाद मे मिलने वाले और पदो को 'दानलीला' शीर्षक के अन्तर्गत रख दिया गया होगा।