भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

समीक्षा भाग ३७ ही नही मानती । यह बधन उनके लिए भगवान् का दिया हुआ है, अर्थात् उनके भाग्य मे ही इस प्रकार बदिनी होना लिखा था, यही सोचकर गोपियाँ चुप रह जाती हैं, अपनी वदिनी-दशा के प्रति संतोष कर लेती है । उनकी दशा तो उन मधु-मक्खियों जैसी हो गई है जो अपने ही बनाये हुए शहद मे लिपट- कर असहाय-सी बन जाती है । गोपियाँ इस वधन से छुटकारा पाने मे स्वयं को असहाय और असमर्थ समझती है । इसी प्रसग के अन्तर्गत रसखान ने जलक्रीडा का वर्णन किया है । एक दिन सभी ब्रज-गोपियां यमुना मे स्नान करने के लिए जाती है, पर वहाँ पर कृष्ण को पहले से ही खडा देखकर वे ठिठक जाती हैं और दोनों ओर से दृग्-बाण चलने लगते है । गोपियाँ कृष्ण के प्रेम के बंधन मे इतनी अधिक बँध जाती हैं कि उन्हे लोक-लाज का भय नही रहता । वे तो इस बात के लिए कटिबद्ध हो गई हैं कि एक न एक दिन इस प्रेम का भडाफोड होगा, क्योकि चन्द्रमा को हाथ से छुपाया नही जा सकता, फिर डरने से अथवा लज्जित होने से कोई लाभ भी तो नही है । कृष्ण गोपियो के हृदय मे जिस बीज का वपन कर देते है, वह पूर्णतया अंकुरित होकर गोपियो को व्यथित कर देता है । रात-दिन आँखों से आँखे लडती है, प्रेम-व्यापार चलते है, पर कही भी न तो भय का प्रदर्शन होता है और न लज्जा का । जब सभी गोपियाँ पूर्णरूपेण कृष्ण के आधीन हो गई है तो फिर डर और लज्जा की बात ही क्या रह जाती है । कहने का भाव यह है कि इस प्रसग के अन्तर्गत रसखान ने गोपियो के विविध हावो तथा भावो का कुशलता से वर्णन किया है । १६. प्रेम-वेदना—‘प्रेम करि काहू सुख न लह्यौ’ फिर गोपियाँ किस प्रकार सुखी रह सकती थी । उनके हृदय मे रसखान बस गया और उसके कारण उन्हे जो पीडा हुई उसका अनुभव वे स्वय ही कर सकती थी, क्योकि घायल की गति को घायल ही जानता है । कृष्ण की मुस्कान और तान पर अपने प्राणो को न्यौछावर करनेवाली गोपियाँ समाज मे भी विमुख हुईं और कृष्ण का मनचाहा प्यार भी उन्हे न मिल सका । यही उनकी विवशता थी और यही समाज मे ख्वारी होने का कारण था । वे कृष्ण को भूलने का जितना प्रयत्न करती, वह उतना ही अधिक याद आकर पीडा को बढावा देना । फलतः किंकर्त्तव्यविमूढा होना स्वाभाविक ही था । वे क्या करे, क्या न करें, इसका